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Bhakshak Review: थैंक यू फॉर एक्टिंग!, एकता कपूर, देखो, शाहरुख की सोहबत में भूमि पेडनेकर क्या कर सकती हैं...

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भक्षक रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
भक्षक
कलाकार
भूमि पेडनेकर , आदित्य श्रीवास्तव , संजय मिश्रा और साई तम्हणकर और सत्यकाम आनंद
लेखक
पुलकित और ज्योत्सना नाथ
निर्देशक
पुलकित
निर्माता
गौरी खान और गौरव वर्मा
ओटीटी
नेटफ्लिक्स
रिलीज
9 फरवरी 2024
रेटिंग
3/5

छह साल हो गए वैशाली सिंह की शादी को। मां नहीं बनी अब तक। समझ सकते हैं कि परिवार और समाज का दबाव कितना है उस पर अपनी गोद हरी करने का। काम भी वह ऐसा करती है जो छोटे शहरों की बेटियों के लिए ‘अजूबा’ माना जाता है। पति नौकरीपेशा है। बीवी रात में देर से घर आती है तो कहता है कि भूख से मरे जा रहे हैं। और, यहीं पहली बार वैशाली सिंह अपने पति को वे सारी बातें सुनाती है जो हर भारतीय नारी को सुननी, समझनी और देखनी चाहिए। नारी सशक्तिकरण की वैशाली सिंह एक ऐसी मिसाल है, जिसे बनाने के लिए खुद शाहरुख खान ने दिलचस्पी ली। उनकी कंपनी रेड चिलीज ने पिछली फिल्में ‘जवान’ और ‘डंकी’ बनाई हैं। दोनों नोट छापने वाली फिल्में लेकिन फिल्म ‘भक्षक’ शाहरुख खान के लिए वोट कमाने वाली फिल्म है। कहते हैं कि जब शाहरुख ने पहली बार बिहार के मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कांड पर लिखी ये फिल्म सुनी तो वह तिलमिला गए थे, फिल्म के लेखक-निर्देशक को इसके बाद फिल्म के लिए हरी झंडी मिलने में देर नहीं लगी।

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भक्षक रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
भूमि पेडनेकर की असली जमीन
हां, फिल्म ‘भक्षक’ को दर्शकों के सामने आने में काफी देर लगी है। जब तक फिल्म का ट्रेलर सामने नहीं आया था, अधिकतर हिंदी दर्शकों को पता भी नहीं था कि ऐसी कोई फिल्म बनी भी है। और, ये तब जब फिल्म की शूटिंग पूरे हुए कोई साल भर हो चुका है। फिल्म की हीरोइन भूमि पेडनेकर हैं। फिल्म ‘पति, पत्नी और वो’ के बाद से उनका कमाल न सिनेमाघरों में दिखा और न ही ओटीटी पर। गलती उन्हीं की है। दर्शक उनको दमदार कलाकार के रूप में पसंद करते हैं, वह न जाने क्यों स्टार बनने के पीछे भागती रहीं। फिल्म ‘भक्षक’ भूमि के लिए अपनी जमीन पर घर वापसी की तरह की फिल्म है। वह जमीन जो उनको सिनेमा में पालने, पोसने वाली कंपनी यशराज फिल्म्स ने ‘दम लगा के हइशा’ में उनके लिए तैयार की थी। महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री सतीश पेडनेकर की इस बिटिया ने अपने पिता के देहांत के बाद पारिवारिक, सामाजिक और व्यवसायिक जीवन में काफी संघर्ष देखा है। संघर्ष उनके सामने अपनी कद, काठी और रूप, रंग के हिसाब से फिल्में चुनने का भी रहा है। फिल्म ‘भक्षक’ देखकर लगता है कि उनका ये संघर्ष अब उनके लिए सही सबक बन चुका है और ये भी लगता है कि जैसे ये फिल्म उन्हीं के लिए लिखी गई है।

भक्षक रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सटीक कास्टिंग का करिश्मा
यूं तो फिल्म ‘भक्षक’ की रीढ़ मजबूत करने में इसके सहायक कलाकारों संजय मिश्रा, आदित्य श्रीवास्तव, सत्य काम आनंद, मुरारी कुमार, दुर्गेश कुमार, साई तम्हणकर, समता सुधीक्षा का भी बड़ा हाथ है, लेकिन बात पहले फिल्म की नायक भूमि पेडनेकर की। भूमि नेटफ्लिक्स की इस नई फिल्म में वैशाली सिंह के किरदार में हैं। ठेठ बिहारी लहजा पकड़ने में हालांकि उन्हें मेहनत काफी हुई है लेकिन मैं की जगह हम के इस्तेमाल को ही जिस हिंदी सिनेमा ने भोजपुरी का असली पंच मान लिया हो, उसके दायरे में भी भूमि ने बढ़िया खेल खेला है। अपनी पिता के उम्र के कैमरामैन के साथ वह एक यूट्यूब चैनल चलाती है। इस चैनल के वीडियोज के व्यूज सौ तक भी पहुंच जाएं तो दोनों का जीवन सफल हो जाए। लेकिन, वैशाली जीवन की सफलता इस बात में मानती है कि जब समाज में अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई न बोल रहा हो तो हमें चुप नहीं रहना चाहिए। फिल्म के क्लाइमेक्स में वह इस पर एक लंबा भाषण भी देती है और इस भाषण को फिल्म का जरूरत से ज्यादा लंबा संदेश मानकर माफ कर दिया जाए तो पूरी फिल्म में भूमि पेडनेकर ने 10 में 10 नंबर पाने लायक काम किया है।
Bhakshak Trailer: पत्रकार बनीं भूमि पेडनेकर ने नोचा समाज के ‘भक्षक’ का नकाब, बोलीं, ‘संजय मिश्रा का नाम ही..’
 

भक्षक - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कहानी यूट्यूब चैनल वाली मैडम की
बिहार के मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कांड की कहानी से प्रेरित फिल्म ‘भक्षक’ में ये जगह मुनव्वरपुर है। छोटे से यूट्यूब चैनल की एक महिला पत्रकार को एक रात एक शख्स वह ऑडिट रिपोर्ट थमा जाता है, जिस पर राज्य सरकार बीते तीन महीने से कोई कार्रवाई नहीं कर पाई है। रिपोर्ट इस बात की है कि मुनव्वरपुर शेल्टर होम में रह रहीं बच्चियों के साथ दुष्कर्म किया जा रहा है। सामने ये बात भी आती है कि जो भी बच्ची इस बलात्कार का विरोध करती है, उसका नामो निशान ही मिटा दिया जाता है। वैशाली इस धर्मयुद्ध में उतर पड़ती है। अधेड़ उम्र के कैमरामैन भास्कर ही उनके इकलौते सारथी हैं। पति को ये पसंद नहीं। धमकी आने के बाद तो वह और भड़क जाता है। दीदी, जीजाजी वगैरह भी साथ नहीं देते। खोजते, तलाशते वह उस युवती के पास पहुंच जाती है जिसने कभी इस शेल्टर होम में खानसामा की नौकरी की थी। मामला कभी बनता दिखता है, कभी उलझता दिखता है और कभी यूं लगता है कि वैशाली ये जंग हार जाएगी। कहानी में एक ट्विस्ट एक महिला आईपीएस अफसर का है जो सूबे की सियासत की कठपुतली बन चुकी व्यवस्था की डोर से बंधी है। जो कुछ करना है, वह खुद वैशाली सिंह को ही करना है।
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भक्षक रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सही पड़े पुलकित के अधिकतर पांसे
और, जो कुछ वैशाली सिंह बनी भूमि पेडनेकर इस फिल्म में करती है, वह शुरुआती सुस्ती के बाद जब फिल्म की कहानी के साथ रवानी में आता है तो फिल्म को बिना पूरा देखे उठने का मन नहीं होता। निर्देशक पुलकित ने ज्योत्सना नाथ के साथ मिलकर फिल्म की पटकथा शुरुआती सद्दी की उड़ान के बाद गजब के मांझे से कसी है। छोटे छोटे किरदार इसकी बुनावट का फूल फुनरा बनकर इसे चमकाते रहते हैं। संजय मिश्रा चैनल के कैमरामैन के रूप में अपनी जगह जमे रहते हैं। सोनू के किरदार में सत्य काम आनंद इस कहानी का असल तड़का हैं। वेब सीरीज ‘पंचायत’ वाले दुर्गेश कुमार का प्रपंच भी रंग जमाने में मदद करता है। समता सुधीक्षा का किरदार एक उत्प्रेरक का है जो महिला खानसामा को शेल्टर होम से भागने में मदद करता है। साई तम्हणकर का किरदार कमजोर है। शायद बिहार की बलिहारी है जिसने लिखने वालों को उन्हें लेडी सिंघम होने से बचाए रखा। आदित्य श्रीवास्तव फिल्म के खलनायक बने हैं और उनका हाव भाव बताता है कि बड़े परदे में दिखने वाली खलनायकों की भारी कमी में वह अब भी उम्मीद की किरण बन सकते हैं। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी बढ़िया है। एडिटिंग कमजोर। बैकग्राउंड म्यूजिक और इसका गीत संगीत थोड़ा बेहतर होता और बिहार के लोकवाद्यों की संगत में रचा जाता तो ये सुहागा, सोने को और चमका सकता था।
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