चिट्ठियों के जमाने में प्यार के बयान का एक अंदाज हुआ करता था, थोड़ा लिखा है ज्यादा समझना। निर्देशक नूपुर अस्थाना की फिल्म ‘बेवकूफियां’ की हर बात कुछ इसी अंदाज में बयान हुई है। मंदी के दिनों में प्यार की एक कहानी में सब कुछ थोड़ा-थोड़ा दिखाया गया है।
ग्लोबल मंदी का थोड़ा असर, हीरो-हीरोइन का थोड़ा प्यार, उनकी तकरार थोड़ी और लड़की के खलनायकनुमा बाप की खलनायकी थोड़ी। लेकिन विश्वास कीजिए कि इसे देखने का पैसा पूरा लगेगा। फिल्म जब तक रफ्तार पकड़ती है और भावनाओं के उफान तक आती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।
आपको इसे अच्छा बताने के लिए दिल को खूब समझाना पड़ता है। कंप्रोमाइज...! मनोरंजन के डोज में अगर आप ऐसा कर सकें तो फिल्म जरूर देख सकते हैं।
फिल्म में अगर कुछ पूरा है तो वह है ऋषि कपूर का बेहतरीन अभिनय। वह शुरू से अंत तक छाए हैं। मंजा हुआ कलाकार कैसे अपनी मौजूदगी से पर्दे के उबाऊ और उदास माहौल का रंग बदल देता है, यह फिल्म में उन्हें देख कर समझा जा सकता है।
कहने को यहां हीरो-हीरोइन आयुष्मान और सोनम हैं, लेकिन फिल्म में तब-तब जान पड़ती है जब-जब ऋषि कपूर पर्दे पर आते हैं। आयुष्मान और सोनम न तो व्यक्तिगत रूप से ऐसा कुछ कर सके हैं कि देखने वाले प्रभावित हों और न ही उनकी जोड़ी में वह बात नजर आती है, जिसे देखने पर कुछ कुछ महसूस हो।
फिल्म में सोनम को लेकर केवल यह बात उल्लेखनीय है वह पहली बार बड़े पर्दे पर बिकनी में नजर आई हैं। लेकिन उन्हें देख कर न लोग आह भरते हैं और न सीटियां बजती हैं।
फिल्म की कहानी मंदी के दिनों की है, जब एयरकनेक्ट एयरलाइंस कर्मचारियों की छंटनी हो जाती है। सीनियर एक्जिक्यूटिव मोहित चड्ढा (आयुष्मान) भी छंटनी का शिकार हो जाता है। लेकिन उसकी हाईप्राइल प्रेमिका मायरा सहगल (सोनम कपूर) कठिन घड़ी में उसके साथ खड़ी है।
यही नहीं, वह आईएएस पिता वीके सहगल (ऋषि कपूर) से मोहित से शादी की बात भी चलाती है। वीके से मोहित की नौकरी छूट जाने की बात छुपाई जाती है। एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ बोले जाते हैं। 120 मिनट के इस छुपा-छुपी, झूठ, मंदी, उधारी और खर्च के खेल में कुछ कॉमिक पल पैदा होते हैं।
इस कॉमेडी में कोई नयापन नहीं है, जिसमें प्रेमी अपने होने वाले ससुर को पटाने की कोशिश करता है। शुरू से आप जानते हैं कि ट्रेजडी से कैसी भी कॉमेडी पैदा हो, होगा तो हैप्पी एंडिंग ही।