अभिषेक को खुद को परखने की जरूरत
अभिषेक बच्चन ने अपनी पिछली फिल्म ‘आई वॉन्ट टू टॉक’ में तमाम समीक्षकों को हिला दिया था। फिल्म में अभिषेक ने खूब तारीफें बटोरीं, लेकिन मनोरंजन के पैमाने पर फिसड्डी रही। ऐसी फिल्मों को वैधानिक चेतावनी के साथ रिलीज किया जाना बेहतर होता है। अब वैसी ही एक गलती अभिषेक फिर दोहरा रहे हैं अपनी नई फिल्म ‘बी हैपी’ में। हिंदी फिल्मों के अंग्रेजी नाम रखने से अच्छा ये होता कि ये दोनों फिल्में अंग्रेजी में ही बनाई जातीं क्योंकि ये दोनों फिल्में हिंदी के आम दर्शक की संवेदनाओं को समझने की कतई कोशिश नहीं करती हैं। रेमो डिसूजा कोरियाग्राफर थे, हैं और शायद आगे भी रहेंगे लेकिन बतौर फिल्म निर्देशक परदे पर पांच साल बाद वापसी करके भी वह वहीं खड़े हैं जहां पांच साल पहले फिल्म ‘स्ट्रीट डांसर 3 डी’ के समय थे।
पिता-पुत्री के रिश्ते पढ़ना, समझना जरूरी
फिल्म ‘बी हैपी’ होने को पिता और पुत्री के रिश्तों की एक बेहतरीन फिल्म हो सकती थी। इन रिश्तों पर ‘पीकू’ जैसी फिल्में भारत में और बननी चाहिए। रिश्तों को दायरों में न बांधकर, दो पीढ़ियों के बीच होने वाली बातचीत को परंपरागत रूढ़ियों से बाहर लाकर ही एक ऐसे नए पढ़े लिखे समाज की संरचना हो सकती है, जहां होली जैसे त्योहारों पर किसी धार्मिक स्थल को तिरपाल से न ढकना पड़े। याद है अमिताभ बच्चन और दीपिका पादुकोण के बीच के वे संवाद जहां पिता अपनी बेटी के कौमार्य के बारे में एक अनजान शख्स से बेटी के सामने ही बोले जा रहा है। या जहां बेटी ऐसे किसी रिश्ते को बस ‘इट इज ए नीड’ कहकर आगे बढ़ जा रही है। अभिषेक बच्चन को पिता के रूप में देखना ही अपने आप में कौतूहल जगाता है, लेकिन पिता होने का कौतूहल क्या है, ये अभिषेक को अभी रिश्तों के इस पानी में और गहरे उतरकर नापना बाकी है।
बोरिंग सी कहानी, ढीली सी फिल्म
अभिषेक और इनायत वर्मा बाप-बेटी के रूप में कमाल के लगते हैं। दोनों के बीच की सहजता दर्शक फिल्म ‘लूडो’ में ही देख चुके हैं। नए बाल कलाकारों में इनायत वर्मा अव्वल नंबर की कलाकार हैं। शूटिंग न चल रही हो तो अभिषेक को भैया कहकर ही बुलाती हैं। ‘ब्लैक’की आयशा कपूर की तरह अमिताभ को अमित कहकर नहीं! लेकिन ‘ब्लैक’ और ‘बी हैपी’ की अड़चन एक जैसी है। किरदारों की पृष्ठभूमि से इनके लेखक बचने की कोशिश करते रहे और इसी के चलते इन किरदारों का तारतम्य दर्शकों से बनता नहीं है। शिव अपनी बेटी की डांस करने की इच्छा के प्रतिकूल है। एक डांस टीचर उसका हौसला बढ़ाती है। बात डांस रियलिटी शोज तक पहुंचती है। जय भानुशाली, पुनीत पाठक, सलमान युसूफ खान, एलि एवरम और सोनाली बेंद्रे जैसे रियलिटी शोज के नियमित चेहरों की फिल्म में एंट्री होती है, लेकिन फिल्म एक रियलिटी शो से भी ज्यादा बोरिंग होती जाती है।
रेमो और उनकी लेखक मंडली पूरी तरह फेल
फिल्म ‘बी हैपी’ को देखना ‘नादानियां’ जैसी ही चुनौती है। फिल्म को शुरू से आखिर तक एक ही बार में न देख पाने की सहूलियत हालांकि ओटीटी देता है लेकिन पैसा तो यहां भी जा रहा है। एमएक्स प्लेयर पर ये फिल्म होती तो ठीक था, लेकिन अमेजन प्राइम की ब्रांडिंग को इस तरह की फिल्में नुकसान पहुंचाती हैं। एमजीएम स्टूडियोज खरीद चुकी कंपनी अमेजन के लिए ‘बी हैप्पी’ जैसी फिल्मों में निवेश करना भुनी मूंगफली के साथ मिलने वाले मुफ्त के धनिया वाले नमक जैसा है। सोचना अभिषेक बच्चन को है कि वह ये धनिया वाला नमक बने रहना चाहते हैं, या आंच में उबलती बालू में भुनकर करारे दाने का स्वाद अपने प्रशंसकों को देना चाहते हैं। स्वाद लाने के लिए भुनना किसी भी अच्छी रेसिपी की पहली शर्त है। रेमो डिसूजा और उनकी लेखक मंडली दोनों ने अभिषेक को यहां फेल किया है। इनायत और अभिषेक मिलकर फिर भी तंबू ताने रखने की कोशिश करते हैं और इसमें नोरा फतेही, हरलीन सेठी, नासर और जॉनी लीवर जैसे कलाकारों की कोशिशें भी खूब नजर आती हैं। कहते तो हैं कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती, लेकिन कोशिशें ईमानदार भी होनी बहुत जरूरी हैं।