फिल्म ‘बेबी जॉन’ में एक आईपीएस अफसर अपनी डॉक्टर प्रेमिका से शादी के लिए अपने होने वाले ससुर से बातें कर रहा है। “मैं आपको टाइम्स पढ़कर सुनाया करूंगा और आप मुझे…, कौन सा अखबार पढ़ते हैं आप?” जवाब मिलता है, “ट्विटर..!” डीसीपी सत्या वर्मा का अगला डायलॉग है, “हां, वैसे भी अखबार कौन पढ़ता है इन दिनों?” ये साल 2024 में मुंबई में तैनात पुलिस उपायुक्त है। आईपीएस कैसे बना, भगवान ही जानें। देश में अखबारों की प्रसार संख्या में कोरोना संक्रमण काल के बाद से बढ़ोत्तरी देखी जा रही है और देश ही नहीं दुनिया का एक बड़ा तबका भी डिजिटल से प्रिंट की तरफ कदम बढ़ा चुका है। समय इन दिनों डिजिटल थकान का है और ऐसे में लोगों को कॉमेडी फिल्मों के साथ एक्शन भी खूब पसंद आ रहा है। इस एक्शन फिल्म में सबसे बढ़िया संवाद मिला है अभिनेता राजपाल यादव को, “कॉमेडी इज ए सीरियस बिजनेस”। बाकी, सुमित अरोड़ा ने ऐसा कुछ इस फिल्म में लिखा नहीं है कि वरुण धवन को उसके लिए तालियां मिल पाएं। सुमति अरोड़ा याद हैं ना आपको? शाहरुख खान की फिल्म ‘जवान’ के संवाद लिखने वाले लेखक।
बेबी जॉन
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पुष्प राज वर्सेज बेबी जॉन
हिंदी फिल्म ‘बेबी जॉन’ ऐसे समय में रिलीज हुई है, जब सिनेमाघरों में एक तेलुगु फिल्म ‘पुष्पा 2’ महीने के शुरू से गर्दा काटे हुए हैं। इतनी बड़ी हिट बनाने के लिए कितने लोग सिनेमा में आने चाहिए? इस सवाल के जवाब में इसे बनाने वाले बताते हैं कि फिल्म ‘पुष्पा 2’ के करीब दो करोड़ टिकट बिके हैं। ये एक रिकॉर्ड है। लेकिन, अभिनेता विजय जोसेफ की जिस तमिल फिल्म ‘थेरी’ पर वरुण धवन की ‘बेबी जॉन’ बनी है, उसके हिंदी डब संस्करण को यूट्यूब पर ही करीब 10 करोड़ के आसपास व्यूज मिल चुके हैं। इसके अलावा ये फिल्म टीवी चैनलों पर दर्जनों बार हिंदी में डब होकर प्रसारित हो चुकी है। तो पहली चुनौती इसे रिलीज करने वाले जियो स्टूडियोज के सामने ये है कि क्या जो लोग फिल्म ‘थेरी’ को हिंदी में देख चुके हैं, वे फिल्म ‘बेबी जॉन’ देखने सिनेमाघरों तक आएंगे? और, वह भी तब जबकि फिल्म के हीरो वरुण धवन की अपनी लोकप्रियता बीते कुछ साल से संकट में हैं। वह गोविंदा टाइप के एक्टर हैं, सिनेमा वह शाहरुख खान जैसा बनाने की कोशिश में धर लिए गए हैं।
बेबी जॉन
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कहानी मुंबई के खतरनाक डीसीपी की
अगर आपने ‘थेरी’ देख ली है तो कहानी आपको पता ही होगी, लेकिन जिन लोगों ने नहीं देखी है, उनके लिए बिना ज्यादा स्पॉयलर दिए इतना तो कहा ही जा सकता है कि ये एक युवा डीएसपी की कहानी है, जिसका होने वाला ससुर पुलिस से नफरत करता है। डीएसपी को अपनी मां से बेहद प्यार है। मां चाहती है कि बेटे का घर बस जाए और बेटा चाहता है कि उसे बीवी ऐसी मिले जिसे देखते ही उसके दिमाग को दिल से एक ‘ओके’ सिगनल मिल जाए। शादी होती है उसकी, एक डॉक्टर से। फिल्म के शुरू में मिलता है वह एक टीचर से, जो उसकी बेटी को केरल के एक स्कूल में पढ़ाती है। मुंबई का डीएसपी, केरल में बेकरी वाला बनकर क्यों रह रहा है? बस इसी एक सवाल के जवाब पर बनी है फिल्म ‘बेबी जॉन’। फिल्म के शुरू में ही लुंगी उठाए जॉन अपना अतीत याद करने के लिए या दर्शकों को हिंट देने के लिए बोल देता है, ‘गणपति बप्पा मोरया!’ और, केरल की भौगोलिक पृष्ठभूमि में लगे इस मराठी नारे से फिल्म की ऋद्धियां और सिद्धियां उसी पल रूठ लेती हैं।
बेबी जॉन
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फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसकी पटकथा
मामला चूंकि दो घंटे चालीस मिनट लंबा है और इतनी लंबी फिल्म को देखने के लिए कहानी के साथ साथ पटकथा भी जरूरी है लेकिन यहां फिल्म की पटकथा ही इसकी सबसे कमजोर कड़ी है। शुरू में रोचक दिखने वाली फिल्म कहानी में जैसे ही इस फिल्म से हिंदी में अपना डेब्यू कर रहीं कीर्ति सुरेश की एंट्री होती है, फिल्म लड़खड़ाने लगती है। हीरो-हीरोइन को नैन मटक्का भी करना है। डीएसपी स्तर के पुलिस वाले इतने बढ़िया डांसर भी होते हैं, अगर ‘जंजीर’ में विजय को पता चल जाता तो वह भी अपने डीएसपी से दो चार ठुमके बढ़िया वाले तो ‘यारी है ईमान मेरा’ गाने में लगाने के लिए सीख ही लेता। लेकिन, स्लो मोशन में चलने के आदी मुंबई के इस डीएसपी का कार्यक्षेत्र इतना विशाल है कि बेचारा पूरे प्रदेश में नाचता रहता पुलिस कार्यप्रणाली पर बनने वाली फिल्मों के लेखकों को पुलिस अफसरों के अधिकारों के बारे में और उनकी हदों के बारे में सीखना बहुत जरूरी है, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की एक-एक कॉपी तो उनको खरीद ही लेनी चाहिए।
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वामिका और जारा जियाना में अटकी जान
अपने ही किरदारों से बोझिल होती चलती फिल्म 'बेबी जॉन' की कहानी का नजरबट्टू बनती चलती हैं इसकी दूसरी हीरोइन वामिका गब्बी और डीसीपी की बेटी के किरदार में जारा जियाना। दोनों जब भी स्क्रीन पर साथ होते हैं, कमाल लगने की कोशिश करते हैं। वामिका गब्बी ने ओटीटी पर अपना दमखम साबित किया है। पहले ‘जुबली’ और फिर ‘खुफिया’ में उनके चेहरे की मासूमियत ने लाखों दिल लूटे हैं। किरदार उनका यहां छोटा है पर धमाकेदार है। जारा जियाना भी लुभाती हैं। उनका डॉयलॉग कोच जो भी रहा हो, उसने कोशिश अच्छी की है, लेकिन उनकी संवाद अदायगी बेहतर की जा सकती थी। जैकी श्रॉफ फिल्म ‘सिंघम अगेन’ के बाद फिर से विलेन हैं। इस बार निर्देशक कालीस ने उनके कपड़े उतारकर उनका वीभत्स रूप दिखाने की कोशिश की है। लेकिन, जैकी का लुक बहुत खराब है। हर सीन में उनकी उम्र का असर दिखता है और कहीं भी उनकी संवाद अदायगी असरदार नहीं हो पाती है।
बेबी जॉन
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वरुण धवन ने गंवा दिया अच्छा मौका
फिल्म के हीरो वरुण धवन से फिल्म ‘बेबी जॉन’ में सबसे ज्यादा उम्मीदें रही हैं। उनका किरदार भी अच्छा है। लेकिन, देखा सुना सा है। एक्शन में वरुण के लिए ये फिल्म भविष्य का रास्ता खोलती है। अगर वह अपनी चिर परिचित मुस्कान छोड़कर गंभीर मुद्राओं वाली एक्शन फिल्म आगे करेंगे तो अच्छा कर सकते हैं, उनकी आयु वर्ग में हिंदी सिनेमा में ज्यादा अभिनेता वैसे भी हैं नहीं सो अगर वह अपनी लीक छोड़कर कुछ नया करने का जोखिम लेते रहे तो उनका करियर लंबा चलेगा। बस एक बात उनको सीखनी होगी और वह ये कि परदे पर किरदार बिकता है, अभिनेता को इसके लिए अपना अहं कुर्बान करना पहली शर्त है। हां, राजपाल यादव और शीबा चड्ढा ने फिल्म को अच्छा सपोर्ट दिया है। शीबा बड़े परदे की नई रीमा लागू बनने की पूरी तैयारी में हैं। राजपाल यादव ने क्रू कट वाले लुक में प्रभावित किया है। ओंकार दास मानिकपुरी का किरदार फिल्म का असली ट्विस्ट है और लापता बेटी के रोल में दिखीं सोनाली शर्मिष्ठा का अभिनय फिल्म के तमाम नामी सहायक कलाकारों पर भारी है।
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साउथ का इतना मसाला भी नहीं चाहिए
साउथ सिनेमा के निर्देशक जब भी कोई हिंदी फिल्म बनाते हैं तो वह साउथ सिनेमा की शैली में ही बनाते हैं। ‘जवान’ में ये स्टाइल लोग देख चुके हैं। ‘एनिमल’ भी वैसे ही स्वाद वाली फिल्म है, लेकिन हिंदी सिनेमा के दर्शक बार बार बदलाव चाहते हैं। सुबह वाली सब्जी उत्तर भारत के लोग शाम को ही नहीं खाते हैं, अगले दिन की तो बात ही जाने दो। तकनीकी रूप से साउथ की सारी फिल्में अब एक जैसी हो चली हैं, बिल्कुल मुंबई के होटलों पर मिलने वाले खाने की तरह। हर डिश की ग्रैवी का एक जैसा स्वाद। यहां हर फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक, गाने, शॉट टेकिंग भी एक जैसी दिखने लगी है। एस थमन से उम्मीदें बहुत थी, लेकिन उन्होंने निराश किया। किरण कौशिक की सिनेमैटोग्राफी औसत है। एडीटर रूबेन ने अपने हिसाब से एडिटिंग की होती तो फिल्म कम से कम 40 मिनट छांटी जा सकती है। फिल्म में देर तक सेंटर फ्रेश और एस्ट्रल इतनी प्रमुखता से दिखाया गया है कि लगने लगता है कि हम इन दोनों ब्रांड्स के विज्ञापन ही देख रहे हैं, 'थेरी' की हिंदी कहानी तो बस साथ में पांच परसेंट से लेकर 18 परसेंट वाले पॉपकॉर्न की तरह है।