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All India Rank Movie Review: वरुण की बीते दौर की अलसाई सी राम कहानी, ये पिक्चर देखने कौन सिनेमाघर आएगा..!

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ऑल इंडिया रैंक - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
ऑल इंडिया रैंक
कलाकार
बोधिसत्व शर्मा , समता सुधीक्षा , शशि भूषण , गीता अग्रवाल और शीबा चड्ढा आदि
लेखक
वरुण ग्रोवर
निर्देशक
वरुण ग्रोवर
निर्माता
संजय राउतरे और सरिता पाटिल
रिलीज:
23 फरवरी 2023
रेटिंग
2/5

किसी विचार का फिल्म बनकर जेहन में अटक जाना किसी भी लेखक के लिए साधारण खगोलीय घटना सा है। वैसी ही जैसे आसमान में किसी पुच्छल तारे का टूटकर धरती की तरफ बढ़ना और धरती पर पहुंचने से पहले ही राख हो जाना। इस टूटते पुच्छल तारे की फोटो क्या 20 साल बाद भी इसे खींचने वाले फोटोग्राफर को उतना ही उत्साहित करेगी, जितना पहले दिन इसने किया था? यह सवाल लेखक, गीतकार, और अब फिल्म निर्देशक भी, वरुण ग्रोवर को खुद से जरूर पूछना चाहिए। वरुण ग्रोवर की सिनेमाई परवरिश हिंदी सिनेमा की अनुराग कश्यप पाठशाला में हुई है। तभी तो वह किरदारों के सूक्ष्मतम चरित्र चित्रण में दीवार पर लगी स्टेफी ग्राफ की तस्वीर और मैगजीन देखकर एक ऐसे बालक को हस्तमैथुन में रत दिखाते हैं जिसकी मूंछ की रेख भी अभी नहीं निकली है। इस दृश्य में फिल्म ‘ऑल इंडिया रैंक’ का पूरा मनोविज्ञान झलकता है, हालांकि वरुण ने फिल्म शायद उस मनोविज्ञान पर सोची होगी, जिसमें कोई ताजा ताजा 12वीं पास कर निकला बालक अपने माता-पिता की डॉक्टर या इंजीनियर बनने की दुनाली के सामने कुछ दशकों पहले तक हुआ करता था।

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ऑल इंडिया रैंक - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

वरुण ग्रोवर की अपनी राम कहानी!
बीएचयू आईआईटी से इंजीनियरिंग करने वाले वरुण ग्रोवर की फिल्म ‘ऑल इंडिया रैंक’ उनकी अपनी किशोरावस्था की कहानी जैसी है। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चे को इंजीनियरिंग का कंपटीशन निकालना उसके अपने भविष्य से ज्यादा उसके पिता की सामाजिक स्थिति को उच्चीकृत करने के लिए जरूरी हो जाता है। समय उस वक्त का है जब कोटा वाकई में फैक्ट्रियों का शहर था और फैक्ट्रियां उजड़ीं तो इन में काम करने वाले कुछ विज्ञान पढ़े कर्मचारियों ने वहां कोचिंग शुरू कर दी। लखनऊ के रहने वाले एक बालक का कोटा में जाकर अकेले रहना, अजीबोगरीब किस्म के दोस्तों से उसका पाला पड़ना और साथ पढ़ने वाली एक किशोरी पर मोहित हो जाना, ये किसी भी कालखंड की घटनाएं हो सकती हैं। पढ़ाई का दबाव न झेल पाने पर किशोर अपने जीवन से कैसे खिलवाड़ कर बैठते हैं, ये दर्शक ‘थ्री ईडियट्स’ में देख चुके हैं। पढ़ते पढ़ते लव हो जाए का कमाल हाल ही में ‘12वीं’ फेल में दिख चुका है। कहानी बहुत देसी है, बस इसे एक कमाल की फिल्म बनाने के चक्कर में जो अतिरिक्त मेहनत वरुण ग्रोवर ने कर दी हैं, उसके चलते एक कमाल की हो सकने वाली फिल्म साधारण से भी कमतर फिल्म बनकर रह गई है।

ऑल इंडिया रैंक - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मैचबॉक्स की लगातार तीसरी फ्लॉप
मैचबॉक्स फिल्म कंपनी का हिंदी सिनेमा में बड़ा नाम है। ‘अंधाधुन’, ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ और ‘स्कूप’ ने इसका एक ब्रांड बनाया। लेकिन, इसकी बीती तीन फिल्में ‘थ्री ऑफ अस’, ‘मेरी क्रिसमस’ और ‘ऑल इंडिया रैंक’ मौजूदा दौर के दर्शकों ने सिनेमाघरों में नकार दीं। इन तीनों में ‘थ्री ऑफ अस’ सबसे कमाल फिल्म है। और, ‘ऑल इंडिया रैंक’ सबसे खराब फिल्म। फिल्म की कहानी कोई 20 साल पहले वरुण ने लिखी। ‘चक दे इंडिया’ लिखने वाले जयदीप साहनी को कहानी पसंद आई और उन्होंने ये कहानी निर्देशक श्रीराम राघवन को दे दी। श्रीराम ने इसे आगे बढ़ाया तो मैचबॉक्स ने इस पर दांव लगा दिया। यहां ध्यान ये रखना है कि जयदीप साहनी ने ‘जंगल’, ‘आजा नचले’, ‘रॉकेट सिंह’ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’ भी लिखी हैं और श्रीराम के सिनेमा में ‘एजेंट विनोद’ भी है। कहानी और पटकथा के स्तर पर पूरी तरह निराश करती फिल्म ‘ऑल इंडिया रैंक’ अपने दोहराव से भी मार खाती है।

ऑल इंडिया रैंक - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अनुराग कश्यप स्कूल का स्कोरकार्ड
बतौर निर्देशक वरुण ग्रोवर अपने साथ अनुराग कश्यप स्कूल के जो सबक साथ लेकर चले, वे ‘मसान’ जैसी फिल्म में तो काम कर सकते हैं लेकिन ‘संदीप और पिंकी फरार’ और ‘किस’ जैसी फिल्में इस दौर के हिंदी फिल्म दर्शक नहीं देखने वाले। हर निर्देशक अपनी पहली फिल्म अपनी सहूलियत के हिसाब से बनाना चाहता है। वहां शूट करना चाहता है जहां से उसे सबसे ज्यादा लगाव रहा हो। ‘ऑल इंडिया रैंक’ भी लखनऊ में शूट हुई लेकिन इस फिल्म में इसकी पृष्ठभूमि और इसके वातावरण का असर सिरे से गायब है। फिल्म की गति भी इसके विषय के हिसाब से तेज है। फिल्म जहां ठहराव मांगती है, वहां भागती नजर आती है। और, जो दृश्य भगाए जा सकते हैं, उन्हें रचने में वरुण अतिरिक्त समय लेते हैं। पीसीओ पर अनजान महिलाओं को फोन कर अश्लील बातें करने वाला पूरा प्रसंग फिल्म की कहानी के लिए अनावश्यक है। फिल्म के नायक को अपनी मां की डायरी में लिखा ‘सेक्स’ शब्द पढ़ाने के लिए रचा गया ये पूरा स्वांग फिल्म को स्तर भी गिराता है।
 
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ऑल इंडिया रैंक - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
शीबा, समता और गीता ने संभाली फिल्म
फिल्म के कलाकारों में समता सुधीक्षा के चेहरे पर भविष्य की चमक साफ पढ़ी जा सकती है। नेटफ्लिक्स पर रिलीज फिल्म ‘भक्षक’ में भी उन्होंने अच्छा काम किया था। बोधिसत्व के चेहरे के भाव स्थायी जैसे हैं, अंतरा उनसे लगता नहीं है। कोचिंग गुरु के रूप में शीबा चड्ढा का ये किरदार लोग बरसों तक याद करेंगे। इस किरदार का क्लासरूम के अलावा भी अगर कहानी के किरदारों से कोई साम्य बन पाता तो ये फिल्म की एक अलग ही अंतर्कथा बन सकती थी। हिंदी सिनेमा में इन दिनों एक बहुत ही शानदार कलाकार अगली ‘निरूपा रॉय’ बनने की ओर अग्रसर है और वह हैं अभिनेत्री गीता अग्रवाल। फिल्म ‘फाइटर’ के बस एक सीन में अपना असर छोड़ जाने वाली गीता ने यहां भी मिठाई के पीछे पागल एक मधुमेह रोगी मां के चरित्र में अपनी अदाकारी की नई लकीर खींची है। बच्चे के पिता के रूप में शांति भूषण ने भी किरदार का ग्राफ बनाए रखा है। मैचबॉक्स की फिल्म होने के नाते इस फिल्म से उम्मीदें बहुत रहीं, लेकिन हर बार तीर निशाने पर लग ही जाए, कहां होता है!
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