निर्माताः इरॉस इंटरनेशनल-कर्मा पिक्चर्स
निर्देशकः हंसल मेहता
सितारेः मनोज वाजपेयी, राजकुमार राव, आशीष विद्यार्थी
रेटिंग ***1/2
किसी के एकांत में झांकने की क्या समाज को इजाजत होनी चाहिए? निर्देशक हंसल मेहता की फिल्म अलीगढ़ का मूल सवाल यही है। हर हाथ में कैमरे के इस दौर में कुछ भी निजी बचा रहना कठिन हो गया है। दीवारों के अब कान नहीं आंखें होती हैं। दौर ऐसा है कि अपने आपको थोड़ा भी छुपाने की कोशिश करना संदिग्ध हो जाना है। व्यक्तिगत पहचान की बात जितनी कम करें, आप उतने सामाजिक हैं। इंसान नंबरों में बदल रहे हैं। इंसानीयत का मूल्य रुपये-नोटों के लायक भी नहीं रह गया है। ऐसे समय में खबर अब वही है जो खोज कर निकाली जाए।
हंसल की फिल्म व्यक्तिगत निजता की वकालत करती है। इसमें चूंकि बात एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के समलैंगिक संबंधों के इर्द-गिर्द घूमती है इसलिए मामला कुछ लोगों को नाराज करता है और कुछ को चटपटा भी लगता है।
भारतीय साहित्य, संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों में गुरु का स्थान ईश्वर के तुल्य है। जबकि अलीगढ़ एक प्राध्यापक के साइकल रिक्शेवाले के साथ समलैंगिक संबंध उजागर होने के बाद के घटनाक्रम को केंद्र में रखे है। अतः यह हर तरह से विवादास्पद है।
हत्या या आत्महत्या का सवाल करती है फिल्म
फिल्म कुछ बरस पहले की एक सच्ची घटना फिल्म का आधार है, जिसमें प्राध्यापक ने विश्वविद्यालय के विरुद्ध निजता की लड़ाई लड़ने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया और अपनी बेदखली के खिलाफ फैसला पाने में कामयाब रहे। फैसला आने के अगले ही दिन प्राध्यापक अपने कमरे में मृत पाए गए। यह आत्महत्या थी या हत्या?
फिल्म प्रोफेसर की आत्महत्या या हत्या का सवाल आपके जेहन में पैदा करने के साथ खत्म हो जाती है। अलीगढ़ में कथानक विस्तृत नहीं है लेकिन निर्देशक ने जो प्रश्न उठाए और एक व्यक्ति को थोपे गए अकेलेपन के साथ जिस तरह घुट-घुट कर जीते दिखाया, वह महत्वपूर्ण है। फिल्म समाजिक विमर्श के साथ व्यक्तिगत विचारमंथन के लिए भी है, अगर आप अभी तक किसी नंबर में तब्दील नहीं हो गए हैं।
मनोज वाजपेयी कमाल के अभिनेता हैं। किसी चमक को ढूंढती उनकी बुझी हुई आंखें, उतरे हुए कंधे, रौनकहीन चेहरा कहानी के समानांतर बहुत कुछ कहते हैं। जिसके पार्श्व में आप लता मंगेशकर की आवाज सुनते हैं। फिल्म में दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहली यह कि तीन अक्षरों का एक शब्द कैसे किसी की भावनाओं को संवेदना और पूर्णता के साथ व्यक्त कर सकता है? दूसरी यह कि प्रेम एक बेहद नाजुक और खूबसूरत शब्द है जिसे हमने एक गंदे अर्थ के साथ जोड़ कर देखना शुरू कर दिया है। क्या हम यह भूल सुधार करेंगे?
मनोज और राजकुमार राव ने साथ में कमाल किया है
युवा और उत्साही पत्रकार दीपू सेबेस्टियन के रूप में राजकुमार राव ने भी अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप काम किया है। हाल के वर्षों की तमाम फिल्मों में कई कलाकारों ने पत्रकारों की भूमिकाएं निभाई हैं लेकिन राजकुमार ने उनकी बॉडी लैंग्वेज और हावभाव को संभवतः सबसे बेहतर पकड़ा और प्रस्तुत किया है। मनोज और राजकुमार जब-जब पर्दे पर साथ आए, उनके दृश्य आकर्षक बने और हां, ये समलैंगिक संबंधों वाले दृश्य नहीं हैं।
हंसल ने एक लंबी कविता की तरह इस फिल्म को रचा है। जिसमें गहरी उदासी ज्यादा उभरती है और आक्रोश कम। शाहिद और सिटी लाइट्स के बाद उनकी यह एक और महत्वपूर्ण फिल्म है। सिनेमा को समाज में किस तरह से रचनात्मक हस्तक्षेप करना चाहिए, अलीगढ़ उसकी नजीर है।
अगर आप कविताएं पढ़ते हैं, अपने एकांत से प्यार करते हैं, नंबर में तब्दील कर देने वाली व्यवस्था से असहमत हैं तो अलीगढ़ आपके लिए है।