बहुत मुश्किल होता है जब चाहने वाले किसी निर्देशक की हर फिल्म देखते हों और वह निर्देशक स्टारडम की दौड़ में उलझकर बुलेट राजा और साहब, बीवी, गैंगस्टर 3 जैसी फिल्मों से अपना स्टाइल खो दे। मिलन टॉकीज निर्देशक तिगमांशु धूलिया का हिंदी सिनेमा में पुनर्जन्म है। वह अपना वह खास अंदाज फिर से पा चुके हैं जिसकी वजह से पानसिंह तोमर और हासिल जैसी फिल्मों ने उनके करोड़ों चाहने वाले बनाए। खुशी खुशी कहा जा सकता है कि लौट के तिगमांशु इलाहाबाद को आए।
मिलन टॉकीज इलाहाबाद के दो युवा प्रेमियों की कहानी है। फिल्मी मसाले से भरपूर। हिंदी पट्टी में सिनेमा समाज का हिस्सा बन चुका है और, इसी फिल्मी चकल्लस का भरपूर मजा है मिलन टॉकीज। हीरोगिरी का नशा पाले लड़के को इश्क हो जाता है, जिससे इश्क हो जाता है उसको पाने के तरीके भी फिल्मी हैं और, तो और दोनों के बाप भी सत्तर के दशक के फिल्मी किरदारों से कम नहीं हैं।
कहानी सिंगल स्क्रीन थिएटर के प्रोजेक्टर की घिर्री की तरह घूमती है। ये कभी पुराने सिनेमाघरों में कार्बन बचाने की कोशिश में धुंधली होती फिल्म की तरह दिखती है तो कभी एक दम से 70 एमएम सिनेमास्कोप हो जाती है। साइकिल स्टैंड में फंसे हैंडिलों के इसमें एहसास है। इंटरवल में हॉल के भीतर बिकते रहे पापड़ों से करारे संवाद हैं और, टोटल यूपी टाइप फसाद हैं। मने कि मामला बिल्कुल वैसे ही सेट है जैसे कि तिशू की फिल्म का होना चाहिए।
हर फिल्ममेकर जानता है कि 90 फीसदी फिल्म तो कागज ही पर बन जाती है बशर्ते फिल्म की कहानी और इसकी पटकथा पढ़ते समय फिल्म दिखने लगे। तिगमांशु के लिए अली फजल और श्रद्धा श्रीनाथ ने वही किया है जो कहानी कहती है। कमल पांडे के साथ मिलकर तिशू ने पहले कहानी जमाई, फिर नए चेहरे लिए और फिल्म वैसी बना ली, जैसी वह पिछले छह साल से चाहते रहे हैं। पानसिंह तोमर के वक्त देखा गया तिशू का सपना सिनेमा बन चुका है।
शादी करते समय गलत दामाद चुन लेने से दुखी आशुतोष राणा तो खैर पुराने चावल हैं ही, सिकंदर खेर के करियर में भी तिगमांशु धूलिया जैसे पारस पत्थर की कमी न जाने कब से थी। अली फजल मिर्जापुर के बाद इंडिया के बी और सी टाउन के वैसे ही स्टार बन चुके हैं जैसे कभी गन मास्टर जी 9 मिथुन चक्रवर्ती हुआ करते थे। श्रद्धा श्रीनाथ का हिंदी फिल्म का ये पहला तजुर्बा है फिर भी यूपी की अदाएं पकड़ने में वह कमाल का करतब दिखा ले गई हैं।
गाना-बजाना सिनेमा को थोड़ा और फन्नेखां होता तो मिलन टॉकीज देखने का मजा दोगुना हो सकता था, लेकिन, संजय मिश्रा की अदाकारी भी सधे सुर जैसी ही है। वह होते हैं तो बाकी कुछ साधना कम ही पड़ता है। तिगमांशु धूलिया अपनी पुरानी रौ में लौटे, यही इस फिल्म का उनवान है। अमर उजाला डॉट कॉम के मूवी रिव्यू में फिल्म मिलन टॉकीज को मिलते हैं साढ़े तीन स्टार।