वायरल वीडियो बूमरैंग हुआ तो...
फिल्म ‘अफवाह’ मोबाइल के खतरनाक इस्तेमाल पर केंद्रित फिल्म है। कैसे दूसरों को परेशानी में अपना सुख ढूंढने वाला समाज का एक बड़ा हिस्सा वायरल वीडियो के भ्रमजाल में पथभ्रमित हो चुका है, यही फिल्म ‘अफवाह’ का आधार है और इसका उपसंहार है कि ये वायरल वीडियो या कहें कि ‘अफवाह’ अगर पलट कर इसे बनाने वालों को ही अपना शिकार बना ले तो? फिल्म ‘अफवाह’ शुरू होती सियासी भंवरजाल में अफवाहों के मायाजाल से। धर्म केंद्रित राजनीति में एक उभरते नेता का करीबी चप्पू एक कसाई को उसकी दुकान में घुसकर मार देता है। मामला बिगड़ता है तो यही नेता उसे ठिकाने लगाने की पुलिस की बात भी मान लेता है लेकिन वह बच जाता है। नेता की सगाई हो चुकी है। शादी बस होने ही वाली है। ये शादी एक तरह का सियासी गठबंधन है जिसे उसकी मंगेतर मानने से इंकार कर देती है। वह घर से भागती है। रास्ते में नेता के लोग उसे वापस लाने के लिए उसके साथ जबर्दस्ती करते हैं और उसी रास्ते से गुजरते अमेरिका रिटर्न से ये बर्दाश्त नहीं होता। पहले मंगेतर अकेले भाग रही थी। अब दोनों साथ भाग रहे हैं।
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इस रात की सुबह नहीं पार्ट 2
सुधीर मिश्रा की कालजयी फिल्म ‘इस रात की सुबह नहीं’ की ही तरह फिल्म ‘अफवाह’ की कहानी भी अधिकतर एक रात में ही घटती दिखती है। कहानी का मूल आधार भी कुछ कुछ वैसा ही है कि कॉरपोरेट दुनिया का एक शख्स अनजाने में हुई एक हरकत के चलते अपराध की दुनिया के लोगों के निशाने पर आ जाता है। उसके बाद दोनों फिल्मों का एक जैसा प्रवाह है। हीरो पलटकर वार नहीं करता है, वह बस जान बचाने के लिए भागता रहता है। सुधीर मिश्रा की शख्सीयत ऐसी रही है कि वह हर बात डंके की चोट पर कहना चाहते हैं। बस, उनकी ये बात कैमरे के जरिये जब बड़े परदे पर आने को मचलती है तो उसे वह बदलते दौर के स्वाद के हिसाब से परोसने में वह चूक जाते हैं। ‘ये साली जिंदगी’ के बाद से वह इसी उधेड़बुन में रहे हैं कि कैसे अपने दौर की फिल्ममेकिंग का वह नए दौर की कहानियों के साथ साम्य बिठा सकें। अनावश्यक बयानबाजी से बचकर वह अगर अपने हुनर को रीबूट कर सकें तो उनके भीतर सिनेमा के जरिये अब भी बहुत कुछ कहने को बाकी है।
भूमि के तयशुदा भाव, एकरस अदाकारी
फिल्म ‘अफवाह’ की कहानी के केंद्र में एक बड़े नेता की बेटी है। यह किरदार भूमि पेडनेकर ने निभाया है। यशराज फिल्म्स की सहायक कंपनी यशराज टैलेंट्स की वह कलाकार हैं। फिल्में भी उनको सिनेमा में उनके कद के हिसाब से कहीं बड़ी मिल रही हैं, बस भूमि खुद को तराशने में मेहनत नहीं कर रही हैं। सच को सच कहने वाले उनके किरदारों का एक जैसा खाका उनकी फिल्मों में बनने लगा है। फिल्म ‘पति पत्नी और वो’ के बाद से उनका करियर ठहरा हुआ है। ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’, ‘भूत’, ‘डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे’, ‘दुर्गामती’, ‘बधाई दो’, ‘रक्षा बंधन’ से होते हुए पिछली फिल्मों ‘गोविंदा नाम मेरा’ और ‘भीड़’ तक उनका अभिनय एक जैसा है। भूमि को ऐसे निर्देशकों की जरूरत है जो उनको अब तक सीखे गए अभिनय के सारे नुस्खे भुलाने में मदद कर सके और उनकी नैसर्गिक अभिनय क्षमता को एक नया स्वरूप प्रदान कर सके। झुंझलाती, हाथापाई करती और अपनी बात को ठोस तरीके से रखने की बजाय उसे लेकर उत्तेजना की हद तक जाता उनका एकरस अभिनय ही उनकी इस यात्रा का बड़ा स्पीडब्रेकर है। इसके पार वह जाएंगी तो फिल्म ‘अफवाह’ जैसे किरदारों में भी कुछ बेहतर की उम्मीद उनसे की जा सकती है।
जहां हैं बस वहीं नहीं है नवाजुद्दीन
फिल्म के हीरो नवाजुद्दीन सिद्दीकी हैं। उनका किरदार एक मनगढंत कहानी अपनी मंचीय प्रस्तुतियों में सुनाता रहता है। श्रोताओं से नाता जोड़ने के लिए वह उनके बीच घूमता है। मंच की सीढ़ियों पर भी बैठता है। ब्रांडेड कपड़े पहनता है। स्टाइलिश चश्मा लगाता है। कार भी उसकी आटोमैटिक है। लेकिन, यह किरदार असल में क्या है, उसकी बातों में सच्चाई कितनी है और भीतर से वह कितना मजबूत है, ये सब जो निर्देशक सुधीर मिश्रा फिल्म के आधे हिस्से में गढ़ने की कोशिश करते हैं, फिल्म के बाकी हिस्से में उसे ही वह पुर्जा पुर्जा उड़ा देते हैं। किरदार की शख्सीयत का ये गड़बड़झाला नवाजुद्दीन के किरदार के साथ दर्शकों का साम्य आखिर तक नहीं बनने देता है। उनसे बेहतर किरदार फिल्म में सुमित व्यास का है। सोशल मीडिया के सहारे राष्ट्रीय राजनीति में चमकने की कोशिश करते एक युवा नेता का जब जब जमीनी हकीकत से सामने होता है, उसकी उड़ान औंधे मुंह गिरती है। उधर, शारिब हाशमी को पहली बार परदे पर देखते ही समझ आ जाता है कि वह आगे क्या करने वाले हैं।
टी जे भानु की चौंकाने वाली अदाकारी
फिल्म ‘अफवाह’ में गौर किए जाने लायक काम अभिनेत्री टी जे भानु ने किया है। ‘द फॉरगॉटेन आर्मी’ में अपनी चमक दिखाने वाली इस अभिनेत्री ने फिल्म में ऐसी पुलिस हवलदार का काम किया है जिसे उसकी मां ही अपने सीनियर के साथ जिस्मानी रिश्ते बनाने के लिए उकसाती रहती है। फिल्म की ये क्षेपक कथा चौंकाती है। सामाजिक दस्तूरों के खिलाफ एक मां का किरदार और दो पाटों के बीच बंटी इस बेटी के नजरिये से ही अगर ये पूरी फिल्म लिखी और बनाई जा सकती तो इसके बॉक्स ऑफिस नतीजे कुछ और ही हो सकते थे। तकनीकी रूप से फिल्म बहुत कमाल की नहीं है। मॉरीसियो विदल ने राजस्थान जैसे बेहतरीन लोकेशन वाले राज्य को बहुत ही औसत तरीके से परदे पर पेश कर दिया है। रात के अंधेरे में दृश्यों के फिल्मांकन के समय उनकी लाइटिंग टीम भी उनकी बहुत मददगार नहीं दिखती। अतानु मुखर्जी का संपादन फिल्म की गति बनाए रखने की कोशिश में काफी हद तक कामयाब है। लेकिन, समीर टंडन और डॉ. सागर ने मिलकर फिल्म में जो कुछ मर्मस्पर्शी रचने की कोशिश की है उसका असर उभरकर सामने नहीं आता है।