अ वेडिंग स्टोरी रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘अ वेडिंग स्टोरी’ की कहानी वही है जो फिल्म के पांच मिनट लंबे ट्रेलर में फिल्म के निर्माता, निर्देशक दिखा चुके हैं लेकिन जो कुछ आपने इस ट्रेलर में देखा वो दरअसर फिल्म के ही शुरू के पांच मिनट हैं। तो फिर, उसके बाद क्या? उसके बाद ये कि हॉरर फिल्म होने के नाते ज्यादा कुछ तो इसके बारे में कहना फिल्म देखने का मजा किरकिरा कर सकता है। मजा अक्सर इस बात से भी किरकिरा हो जाता है कि किसी हॉरर फिल्म का क्लाइमेक्स ही रिव्यू में खोल दिया जाए। लेकिन, कहानी का सूत्र मैं आपको बताता चलता हूं। फिल्म ‘अ वेडिंग स्टोरी’ के मूल में वह पंचक काल है जिसमें कुछ खास नक्षत्रों के किसी खास स्थिति में होने से दिवंगत आत्मा को शांति न मिलने की कहानी पुराणों मे लिखी है। पंडितजी बताते हैं कि इस दोष निवारण के लिए पांच पुतलों मे प्राण प्रतिष्ठा करके उन्हें शव के साथ जलाना होगा। प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है और फिर आधुनिक विचारधारा पारंपरिक विश्वासों से टकराती है और पुतले बजाय चिता में जाने के वहां पहुंच जाते हैं, जहां कुछ ही दिनों में शहनाई बजने वाली है।
अ वेडिंग स्टोरी रिव्यू
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फिल्म ‘अ वेडिंग स्टोरी’ का सबसे मजबूत पहलू ये है कि यहां एक हॉरर फिल्म बनाने के लिए डरावनी फिल्मों का तय खाके का इस्तेमाल नहीं किया गया है। चाहते तो फिल्म बनाने वाले किसी भुतहा बंगले में भी इसकी कहानी को आगे बढ़ा सकते थे लेकिन यहां डर अपने साथ काला साया लेकर आता है। रंग-बिरंगा सा दिखने वाला आकर्षक बंगला भी सिर्फ प्रकाश और छाया का संयोजन बदलकर भुतहा बंगला बन सकता है, इसे दिखाने में फिल्म के सिनेमैटोग्राफर सुप्रतिम भोल ने अपनी लाइटिंग टीम के साथ मिलकर कमाल का वातावरण रचा है। वातावरण फिल्म ‘अ वेडिंग स्टोरी’ का एक अलग किरदार है और इसे निखारने में फिल्म के निर्देशक अभिनव पारीक ने प्रभावित करने वाला काम किया है।
अ वेडिंग स्टोरी रिव्यू
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कहानी, सिनेमैटोग्राफी और निर्देशन फिल्म ‘अ वेडिंग स्टोरी’ के मजबूत पहलू हैं। फिल्म के कलाकारों का चयन हालांकि उतना सटीक नहीं है जितना कि ऐसी किसी हिंदी फिल्म के लिए होना चाहिए लेकिन जो कलाकार फिल्म में काम कर रहे हैं, उन सबने मेहनत खूब की है। वैभव तत्वावादी मराठी सिनेमा के परिचित नाम हैं। हिंदी सिनेमा में भी वह धीरे धीरे जगह बना रहे हैं, लेकिन उनका नाम इतना बड़ा नहीं है कि एक प्रयोगात्मक हॉरर फिल्म के लिए वह दर्शक खींचकर सिनेमाघरों तक ला सकें। मुक्ति मोहन भी परदे पर बहुत खूबसूरत लगी हैं। उनका अभिनय दर्शक ‘थार’ और अभी हाल ही में रिलीज हुई सीरीज ‘लाइफ हिल गई’ में भी पसंद कर चुके हैं। वह अभिनय अच्छा करती हैं।
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वैभव और मुक्ति जैसी कुशलता हालांकि लक्षवीर सिंह सरन और मोनिका चौधरी के अभिनय में नही दिखती। दोनों का अभिनय जोशीला है लेकिन उनकी ऊर्जा का आवेग फिल्म की कहानी को समुचित संवेग देने में विफल रहता है। अक्षय आनंद वरिष्ठ कलाकार हैं और अरसे बाद उन्हें बड़े परदे पर देखना आनंददायक भी रहा। फिल्म का संगीत पक्ष बेहतर हो सकता था। किसी हॉरर फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक ही फिल्म की जान होता है, यहां संगीत लहरियां तो बनाता है लेकिन सरगम में आकर दर्शकों के मन में दृश्य के अनुसार वांछित भाव नहीं बना पाता। एक हॉन्टिंग सॉन्ग की कमी पूरी फिल्म में काफी खली।