फिल्म 'लाहौर' के लिए नेशनल अवॉर्ड जीत चुके निर्देशक संजय पूरन सिंह को फिल्म '72 हूरों' के लिए भी नेशनल अवॉर्ड मिल चुका है। पांच साल पहले इसका प्रीमियर गोवा फिल्म फेस्टिवल में हो चुका है। यह फिल्म अर्से से कट्टरता और आतंकवाद का शिकार हो रहे नवयुवकों पर आधारित है कि कैसे उनका ब्रेन वाश करके आतंकवादी बनाया जाता है? किस तरह से एक मौलाना धर्म के नाम पर लोगों को बरगलाता है और उन्हें लालच देता है कि जिहाद के बाद जन्नत में उनका स्वागत होगा और 72 हूरें उनको वहां मिलेंगी। उनके अंदर 40 मर्दों की ताकत आ जाएगी और उन्हें वहां अय्याशी करने का मौका मिलेगा।
फिल्म की कहानी की शुरुआत मौलाना के इन्हीं ब्रेन वाश करने वाली बातों से होती है। मौलाना की बातों में आकर हाकिम और बिलाल नाम के दो युवक मुंबई के गेट वे ऑफ इंडिया पर आत्मघाती हमला करने के लिए तैयार हो जाते हैं। और, मरने के बाद वह इंतजार करते हैं कि कब उनके स्वागत में जन्नत की 72 हूरें खड़ी मिलेगी। बिलाल की आत्मा मुंबई की स्टैच्यू ऑफ प्रोग्रेस के ऊपर बैठी है और अपने साथी हकीम से बात करती है कि कब जन्नत की 72 हूरें उसे मिलेगी। इन दोनो किरदार के बातचीत के ईद -गिर्द पूरी फिल्म की कहानी आधारित है।
धर्म के नाम पर लोगों को बरगलाना और लोगों की धार्मिक भावनाओं को उकसा कर उनका ब्रेन वाश करके फायदा उठाना इन दिनों आम है। फिल्म की कहानी जैसे -जैसे आगे बढ़ती है, हामिद और बिलाल की आत्मा को इस बात का अहसास होने लगता है कि किसी बेगुनाह को मार कर न तो जन्नत मितली है और न ही 72 हूरें उनके स्वागत के लिए खड़ी मिलती हैं। मौलाना ने उन्हें जो बात बताई थी, वह झूठी है।
दुनिया के कई देशों की तरह भारत भी एक अर्से से कट्टरता और आतंकवाद का शिकार रहा है। लोगों को आतंकवादी कैसे बनाया जाता है? कैसे उनकी ब्रेनवाशिंग की जाती है? कैसे धर्म के नाम पर युवाओं को बरगला कर उन्हें खून -खराबा करने के लिए उकसाया जाता है? और, मरने के बाद उनका क्या होता है, इस सब बातों का इस फिल्म में प्रकाश डाला गया है। हामिद और बिलाल को उम्मीद है कि जन्नत की 72 हूरें उनके स्वागत में खड़ी मिलेंगी। बस किसी तरह उनके मृत शरीर को दफना दिया जाए तभी उनके लिए जन्नत के दरवाजे खुलेंगे। लेकिन उनके शवों को नमाज तक नसीब नहीं होती।
फिल्म के निर्देशक संजय पूरन सिंह चौहान ने इस कहानी के जरिए एक ऐसी कड़वी सच्चाई को पेश करने की कोशिश की है,जिसके बारे में जानते हुए भी लोग अनजान बने रहते हैं। फिल्म में किसी जाति और धर्म के बारे में बात करने के बजाय संजय पूरन सिंह ने संवेदनाओं का पूरा ख्याल रखा है। फिल्म कहीं न कहीं डाक्यूमेंट्री जैसी जरूर लगती हैं और इसे ब्लैक एंड व्हाइट में पेश किया गया है। बीच बीच में कुछ कलर शॉट भी आते हैं, मसलन एक होर्डिंग के पास बैठे एक्टर्स के बीच से लाल रंग के प्लेन का गुजरना, छत्रपति शिवाजी टर्निमल के शॉट्स, गेटवे ऑफ इंडिया का ड्रोन शॉट्स स्क्रीन पर खूबसूरत लगता है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक भी ठीक ही है।
फिल्म में पवन मल्होत्रा और आमिर बशीर ने अपने किरदार सौ फीसदी निभाने की पूरी कोशिश की है। पवन मल्होत्रा के लाहौरी पंजाबी भाषा में बोले गये संवाद दर्शकों को आकर्षित तो करते हैं लेकिन इसके चलते फिल्म दर्शकों से रिश्ता नहीं जोड़ पाती है। हां, क्लाइमेक्स में पवन मल्होत्रा का फिल्म का मोनोलॉग सुनकर रोंगटे ज़रूर खड़े हो जाते हैं।
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