धर्मंद्र, बॉबी देओल, सनी देओल और ईशा देओल
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मेरे बच्चे सिर्फ वारिस नहीं, मेरी रूह के हिस्से हैं
बच्चों की बात पर धर्मेंद्र भावुक हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि मैं अपने बच्चों से बहुत कुछ कहे बिना भी जुड़ा रहता हूं। जानता हूं कि वे समझदार हैं, मेहनती हैं और अपने रास्ते खुद बना रहे हैं। मैं बस चुपचाप उनके लिए दुआ करता हूं।
जब उन्हें पर्दे पर देखता हूं या उनकी कोई बात सुनता हूं, तो ऐसा लगता है कि मेरी जिंदगी का सफर अभी भी चल रहा है, उनके कदमों में, उनके फैसलों में। जो सपना कभी मैंने देखा था, अब वो मेरी अगली पीढ़ी जी रही है। यही सबसे बड़ी तसल्ली है। हम सिर्फ पिता-पुत्र या पिता-पुत्री नहीं हैं, हम एक-दूसरे के हमसफर हैं।
89 की उम्र में भी मैं जिंदगी को उसी जोश से जीता हूं
89 साल की उम्र में भी धर्मेंद्र की ताजगी और सादगी देखने लायक है। वह आज भी काफी एक्टिव रहते हैं और जिंदगी को पूरे जोश के साथ जीते हैं। जब उनसे पूछा गया कि इस उम्र में भी वो इतने फिट और एनर्जेटिक कैसे हैं, तो वह मुस्कराकर बोले, 'मैं एक किसान का बेटा हूं। खेत की मिट्टी सिर्फ हाथों पर नहीं, दिल पर भी असर करती है। उसी मिट्टी से मुझे जड़ें मिली हैं, सादगी मिली है। आज भी जब मैं फार्महाउस पर होता हूं, तो गायों से बातें करता हूं, उनके नजदीक बैठता हूं, पेड़ों की छांव में कुछ पल गुजारता हूं। वहां मुझे चैन मिलता है।'
रोज आलाप, योग ही मेरी असली दवा है
धर्मेंद्र आगे बताते हैं कि मैं रोज 'आलाप' की प्रैक्टिस करता हूं ताकि मेरी आवाज की पकड़ बनी रहे, वो भी एक तरह की साधना है। योग करता हूं, हल्की-फुल्की कसरत भी करता हूं और सबसे जरूरी बात, मैं खुद को हमेशा खुश रखने की कोशिश करता हूं। मन और तन दोनों को शांत और सक्रिय रखना मेरी जिंदगी की आदत बन चुकी है। यही मेरी असली दवा है, जो मुझे हर दिन जिंदा और तरोताजा बनाए रखती है।
अब सोचता हूं दिल की बातों को एक किताब या वीडियो में कहूं
धर्मेंद्र की शायरी और सोशल मीडिया पोस्ट लोगों को बहुत छू जाती हैं। इस पर वह मुस्कराकर कहते हैं, 'जो बातें दिल में रह जाती हैं, वो ही अल्फाज बनकर बाहर आती हैं। कभी कोई याद, कभी अधूरी ख्वाहिश या बस कोई एहसास। अब सोचता हूं कि इन्हें एक किताब का रूप दूं, या वीडियो में बोलकर लोगों से बाटूं। शायद जब ये शब्द बाहर आएंगे, तो दिल हल्का हो जाएगा।'
धर्मेंद्र, शोले का दृष्य
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'शोले’ की वो शूटिंग आज भी दिल में जिंदा है
पुरानी फिल्मों की बात आते ही धर्मेंद्र थोड़ी देर के लिए जैसे किसी और समय में लौट जाते हैं। ‘शोले’ को याद करते हुए उनकी आवाज में एक खास अपनापन आ जाता है। वो मुस्कराकर कहते हैं कि एक सीन था जिसमें भगवान की मूर्ति के पीछे माइक छिपाकर डायलॉग बोलना पड़ा। उस जमाने में साधन बहुत सीमित थे, लेकिन दिल में जुनून और ईमानदारी भरपूर थी। शायद यही वजह है कि वो फिल्म आज भी लोगों के दिलों में उसी शिद्दत से जिंदा है, जैसे पहले दिन थी।
धर्मेंद्र ने बताए अपनी जिंदगी के खूबसूरत पल
अगर उनकी जिंदगी पर कोई फिल्म बने, तो उसमें कौन-से लम्हे जरूरी होंगे? इस पर धर्मेंद्र साफ दिल से कहते हैं, 'जब मैं बंबई आया था, जेब में कुछ नहीं था लेकिन आंखों में सपने थे। फिर वो दिन, जब मैंने पहली बार खुद को बड़े परदे पर देखा। सबसे खूबसूरत पल तब आया जब मेरे बच्चों ने अपने रास्ते चुने और मैंने उन्हें कलाकार बनते देखा। मेरी पूरी जिंदगी इन्हीं पलों में बसती है। मेरी जिंदगी ही एक फिल्म समान है।'
मेरे फैंस सिर्फ ऑडियंस नहीं, परिवार हैं
अपने चाहने वालों की बात करते हुए धर्मेंद्र की आवाज में बेहद अपनापन आ जाता है। उन्होंने एक याद साझा की। उन्होंने कहा कि मैं बहुत खुशकिस्मत हूं कि मुझे ऐसे लोग मिले, जो मुझे सिर्फ एक्टर नहीं, अपना मानते हैं। एक फैन ने हाल ही में मुझे अपने पास संभालकर रखे टिकट दिखाए - 'शोले' के, गंगा थिएटर के, 3.30 रुपये, 2.20 रुपये, 1.65 रुपये वाले क्लास के। वो बोला, सर, ये मेरी दौलत है। जिस दिन आपकी फिल्म रिलीज हुई थी, मैं हर साल उसी दिन उसका पोस्टर लगाता हूं। इस 15 अगस्त को फिर 'शोले' का पोस्टर लगाऊंगा। ऐसे लोग सिर्फ ऑडियंस नहीं, मेरे परिवार जैसे हैं। जो मोहब्बत मैंने परदे पर निभाई, वो मुझे असल जिंदगी में अपने चाहने वालों से मिली है।