बॉलीवुड में जब भी बेहतरीन कॉमेडियन और डायलॉग राइटर की बात होती है, तो कादर खान का नाम जरूर आता है। कभी अपनी कॉमेडी से दर्शकों को हंसाने वाले तो कभी विलेन बनकर डराने वाले कादर खान ने हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई थी। हालांकि, पर्दे पर लोगों को हंसाने वाले कादर खान की असल जिंदगी काफी मुश्किलों से भरी रही।
बचपन में गरीबी देखी, परिवार के लिए संघर्ष किया और फिर अपनी मेहनत के दम पर बॉलीवुड में बड़ा मुकाम हासिल किया। 22 अक्टूबर 1937 को अफगानिस्तान के काबुल में जन्मे कादर खान की 22 अक्टूबर 2026 को 89वीं बर्थ एनिवर्सरी है। इस मौके पर जानते हैं उनके बचपन, परिवार, फिल्मी करियर और जिंदगी से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से।
कादर खान
- फोटो : सोशल मीडिया
क्यों परिवार ने छोड़ा था अफगानिस्तान?
कादर खान का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता अब्दुल रहमान खान अरबी और इस्लामी साहित्य के विद्वान थे, जबकि मां का नाम इकबाल बेगम था। कादर खान के जन्म से पहले उनके तीन भाइयों की कम उम्र में मौत हो गई थी। इससे उनकी मां काफी परेशान रहने लगी थीं। एक इंटरव्यू में कादर खान ने बताया था कि उनके भाइयों की मौत के बाद मां को लगने लगा था कि काबुल का माहौल उनके बच्चों के लिए ठीक नहीं है।
इसी वजह से परिवार ने अफगानिस्तान छोड़ने का फैसला किया और मुंबई आ गए। मुंबई पहुंचने के बाद परिवार कमाठीपुरा इलाके में रहने लगा। यहां एक छोटी-सी चॉल में उनका बचपन बीता। परिवार की आर्थिक हालत इतनी खराब थी कि कई बार खाने तक के पैसे नहीं होते थे।
कादर खान
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इंजीनियरिंग में प्रोफेसर भी रहे कादर खान
अभिनेता कादर खान उन शख्सियतों में से एक थे, जो बेहद साधारण होते हुए भी उनकी जिंदगी एक दिलचस्प किताब की तरह रही। कादर खान ने अभिनय में तो अपना दमखम दिखाया ही था, लेकिन बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ होंगे कि वह पढ़ाई में भी पीछे नहीं थे। दरअसल कादर खान ने इंजीनियरिंग की थी और अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वो सिद्दिकी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में प्रोफेसर भी रहे।
कादर खान-असरानी
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कब्रिस्तान में डायलॉग बोलकर करते थे प्रैक्टिस
कादर खान की जिंदगी का एक दिलचस्प किस्सा उनके एक्टिंग के शुरुआती दिनों से जुड़ा है। उन्हें बचपन से ही नाटक करने और डायलॉग बोलने का शौक था। ऐसे में वह साउथ मुंबई के एक कब्रिस्तान में जाकर अकेले डायलॉग बोलने की प्रैक्टिस किया करते थे। वहां उन्हें कोई परेशान नहीं करता था और वे खुलकर अपनी एक्टिंग का अभ्यास कर पाते थे।
इसी दौरान एक दिन अभिनेता की नजर उन पर पड़ी। उन्होंने कादर खान की प्रतिभा को पहचाना और वह अभिनेता कोई और नहीं अशरफ खान थे। उन्होंने कादर खान को नाटक में काम करने के बारे में पूछा। फिर यहीं से कादर खान का नाटक में काम करने का सफर शुरू हुआ और उन्होंने थिएटर की दुनिया में अपनी पहचान बनाई।
जॉनी लीवर, कादर खान
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लेखक के तौर पर मिली शुरुआती पहचान
कादर खान कॉलेज के दिनों में नाटकों में काफी सक्रिय थे। उनकी एक्टिंग और डायलॉग बोलने के अंदाज ने कई लोगों को प्रभावित किया। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार ने भी कॉलेज में उनका नाटक देखा था और उनकी प्रतिभा से प्रभावित हुए थे।
हालांकि, कादर खान को फिल्मी दुनिया में शुरुआती पहचान एक लेखक के तौर पर मिली। उन्होंने 1972 में रिलीज हुई फिल्म 'जवानी दीवानी' के डायलॉग लिखे। इसके बाद 1973 में यश चोपड़ा की फिल्म 'दाग' से उन्होंने बतौर अभिनेता बॉलीवुड में डेब्यू किया। राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर और राखी स्टारर इस फिल्म में उन्होंने वकील का किरदार निभाया था।
कादर खान
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पहली फिल्म के डायलॉग लिखने के मिले थे 1500 रुपए
कादर खान ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें 'जवानी दीवानी' के डायलॉग लिखने के लिए 1500 रुपए मिले थे। इसके बाद अगली फिल्म के लिए उन्हें 21 हजार रुपए दिए गए। उस समय बतौर शिक्षक उनकी सैलरी महज 400 रुपए थी।
ऐसे में फिल्मों से मिलने वाली रकम उनके लिए बहुत बड़ी थी। उनके करियर में बड़ा बदलाव तब आया, जब फिल्ममेकर मनमोहन देसाई ने उन्हें फिल्म 'रोटी' के डायलॉग लिखने का मौका दिया। इस काम के लिए उन्हें 1 लाख 21 हजार रुपए फीस मिली थी।
अमिताभ बच्चन की कई हिट फिल्मों के डायलॉग लिखे
कादर खान सिर्फ अच्छे अभिनेता नहीं, बल्कि शानदार लेखक भी थे। उन्होंने 'अमर अकबर एंथनी', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'लावारिस', 'शराबी', 'कुली' और 'अग्निपथ' जैसी फिल्मों के लिए डायलॉग लिखे।
उनकी खासियत थी कि वे गंभीर से गंभीर बात को भी आसान और असरदार शब्दों में लिखते थे। अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन वाले दौर में उनके लिखे डायलॉग काफी लोकप्रिय हुए। कादर खान ने अपने करियर में 300 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया था।
दिवंगत अभिनेता कादर खान, गोविंदा
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गोविंदा के साथ बनी सुपरहिट जोड़ी
1990 के दशक में कादर खान की पहचान कॉमेडी फिल्मों से और मजबूत हुई। गोविंदा के साथ उनकी जोड़ी दर्शकों को खूब पसंद आई। 'कुली नंबर 1', 'हीरो नंबर 1', 'दूल्हे राजा', 'आंखें' और 'साजन चले ससुराल' जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने लोगों का दिल जीता।
निधन के बाद मिला पद्मश्री सम्मान
कादर खान अपने आखिरी वर्षों में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझ रहे थे। वे इलाज के लिए कनाडा में रह रहे थे। 31 दिसंबर, 2018 को 81 साल की उम्र में टोरंटो में उनका निधन हो गया। सिनेमा में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने 2019 में उन्हें मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित किया।
उन्हें 'बाप नंबरी बेटा दस नंबरी' के लिए सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला था। इसके अलावा 'मेरी आवाज सुनो' और 'अंगार' के लिए डायलॉग लेखन के फिल्मफेयर पुरस्कार मिले।