भारतीय सिनेप्रेमियों के दिल में अब भी एक कसक बाकी रह गई है, 'किसी हिन्दुस्तानी फिल्म को ऑस्कर कब मिलेगा'। लेकिन बीते कुछ वर्षों में भारत की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि अब वह दिन दूर नहीं है।
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आगामी 28 फरवरी की रात 88वें ऑस्कर सम्मान समारोह में आपको इसकी एक दमदार बानगी देखने को मिलेगी, जब एक भारतीय अभिनेत्री के हाथों से ऑस्कर विजेताओं को ऑस्कर प्रतिमा दिलवाई जाएगी। ऑस्कर संचालकों ने खुद अपनी ओर इसके लिए अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के नाम की घोषणा की है।
Big #Oscars news! Thirteen more presenters announced! https://t.co/ACwuPaPCPP pic.twitter.com/pUCmgjUhXR— The Academy (@TheAcademy) February 1, 2016
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उल्लेखनीय है कि बॉलीवुड अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने पिछले साल ही हॉलीवुड का रुख किया था। उन्होंने प्रतिष्ठित अमेरिकी टीवी चैनल 'एबीसी' के टीवी शो 'क्वांटिको' में मुख्य भूमिका निभाई। और भूमिका ही नहीं निभाई, भारतीय फिल्मों और कलाकारों की अब तक उपेक्षा करते आ रहे ऑस्कर अवार्ड संचालकों को मजबूर कर दिया कि वे इस 'अवार्ड नाईट' में भारत की भागीदारी सुनिश्चित करें।
क्योंकि भारतीय सिनेमा और कलाकरों में भी वो माद्दा है कि उन्हें ऑस्कर से नवाजा जाए। बीते साल जब प्रियंका ने अमेरिकी टीवी शो में अपनी अभिनय प्रतिभा का प्रर्दशन किया तो अमेरिकियों को इसका अहसास हुआ। उन्होंने अपने पहले ही किरदार से कई अमेरिकी कलाकारों को पछाड़ते हुए प्रतिष्ठित अमेरिकी 'पिपल्स च्वाइस अवार्ड' हासिल किया।
यूं तो 87 बार आयोजित हो चुके ऑस्कर अवार्ड में अब तक भारत ने 20 दावेदारियां ठोंकी हैं। लेकिन इसमें महज पांच में ही जीत हासिल हुई। एक मौका ऐसा भी आया जब ऑस्कर ने अपनी ओर एक भारतीय सिनेमाई हस्ती को बुलाकार सम्मानित किया।
अब तक भारत को कौन-कौन से ऑस्कर अवार्ड मिल चुके हैं
अमेरिकी संस्था अमेरिकन अकादमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेस (AMPAS) की ओर से दिए जाने वाले ऑस्कर अवार्ड की शुरुआत 16 मई 1929 को हुई थी। पहला अवार्ड समारोह अमेरिकी शहर हॉलीवुड के रूजवेल्ट होटल में आयोजित किया गया था, जिसमें करीब 250 लोग मौजूद थे।
आज इस सम्मान की ख्याति इतनी बढ़ गई है कि 200 से ज्यादा देशों में इसका लाइव प्रसारण किया जाता है। तब (सन् 1929) में भारत में फिल्में बनना तो शुरू हो गई थीं, लेकिन तब भारत में एक फिल्म का बनकर तैयार हो जाना ही बड़ी बात थी। उसका ऑस्कर में भेजा जाना तो दूर की कौड़ी थी।
लेकिन जैसे ही भारत में प्रभावी सिनेमा का दौर शुरू हुआ वैसे ही फिल्म 'मदर इंडिया' (सन् 1958) ने ऑस्कर में धमक दी। महबूब खान की इस फिल्म को ऑस्कर के सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फिल्म (बेस्ट फॉरेन लेंग्वेज फिल्म) में नामांकन मिला। फिल्म पुरस्कार जीतने के काफी करीब तक पहुंची।
सन् 1961 में इस्माइल मर्चेंट की फिल्म 'द क्रिएशन ऑफ वुमन' को बेस्ट शॉर्ट सब्जेक्ट (लाइव एक्शन) की श्रेणी में नामांकन मिला। सन् 1979 में केके कपिल की 'ऐन इनकाउंटर विद फेसेस' को बेस्ट डॉक्यूमेंट्री (शॉर्ट सब्जेक्ट) श्रेणी में नामांकित किया गया। लेकिन यह फिल्म भी ऑस्कर पाने में असफल रही।
भारत को पहला ऑस्कर भानु अथैय्या ने दिलाया। उन्हें फिल्म 'गांधी' (सन् 1983) के लिए 'बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइन' श्रेणी में ऑस्कर दिया गया। इसी के साथ भानु ऐसी पहली भारतीय बनीं, जिन्होंने ऑस्कर जीता। लेकिन ऑस्कर लिए सबसे ज्यादा संघर्ष जिस फिल्म ने किया, जिसने सबसे ज्यादा दूरी तय की, जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा हुई उसका जिक्र अगली स्लाइड में है।
ऑस्कर को लेकर सबसे ज्यादा चर्चित है ये बॉलीवुड फिल्म
फिल्म गांधी ने हॉलीवुड जगत को भारतीयों की प्रतिभा का अहसास कर दिया था। फिल्म के लिए दो भारतीयों को नामांकन मिले थे। भानु इसे जीत में तब्दील कर पाए थे और रवि शंकर (बेस्ट ओरिजनल स्कोर) को संगीत के लिए नामांकित किया गया था।
इसके बाद सन् 1987 में इस्माइल मर्चेंट ने एक बार फिर ऑस्कर नामांकन में जगह बनाई। उनकी 'ए रूम विद ए व्यू' को 'बेस्ट पिक्चर' श्रेणी में नामांकन मिला। लेकिन उनकी ये कोशिश भी पिछली बार (सन् 1961, 'द क्रिएशन ऑफ वुमन' ऑस्कर के लिए नामांकित) की तरह ही असफल रही।
लेकिन सन् 1989 में मीरा नायर की फिल्म 'सलाम बांबे' ने साबित कर दिया कि भारतीय सिनेमा किसी से कमतर नहीं है। 'मदर इंडिया' के बाद यह दूसरी भारतीय फीचर फिल्म थी, जिसे ऑस्कर के लिए 'बेस्ट फॉरेन लेंग्वेज फिल्म' श्रेणी में नामांकित किया गया। हालांकि जीत नहीं दिला पाई।
पर ऑस्कर संचालाकों को इसका आभाष हो गया कि भारत में भी असरदार सिनेमा बन रहा है। इसलिए सन् 1992 में उन्होंने खुद ही भारतीय फिल्मकार 'सत्यजीत रे' को बुलाकर मानद ऑस्कर अवार्ड (ऑनररी अवार्ड, लाइफटाइम अवार्ड के समकक्ष) दिया।
इसी बीच एक ऐसा भारतीय शख्स भारत मे काम कर रहा था। जिसने ठान लिया था कि ऑस्कर जीतना ही है। उनकी पिछली दो कोशिश असफल हुई थीं। सन् 1993-94 दोनों ही सालों में लगातार इस्माइल मर्चेंट की फिल्मों 'हॉवर्ड एंड', 'द रिमेंस ऑफ द डे' को फिर से 'बेस्ट पिक्चर' श्रेणी में नामांकन मिला।
लेकिन इस्माइल की ख्वाहिश अधूरी रह गई। उनकी चार फिल्में ऑस्कर में पहुंची। लेकिन अंतिम विजेता नहीं बन पाईं। लेकिन इसके बाद जिस भारतीय फिल्म में ऑस्कर में दावेदारी ठोंकी, कई विशेषज्ञ मानते हैं कि उसमें ऑस्कर जीतने का पूरा माद्दा था। जाने क्यों वह ज्यूरी की अंतिम मुहर उस पर नहीं लग पाई। अगली स्लाइड में जानिए, ऑस्कर में भारत की सबसे प्रबल दावेदारी के बारे में।
ऑस्कर में भारत की सबसे प्रबल दावेदारी साल 2002 में हुई, जब आशुतोष गोवारिकर की फिल्म 'लगान' को चुना गया। जानकारी के मुताबिक 'बेस्ट फॉरेन लेंग्वेज फिल्म' की श्रेणी में यह फिल्म जीतते-जीतते रह गई।
बातते हैं कि जिन दिनों ऑस्कर में लगान प्रतिद्वंदियों को चुनौती दे रही थी, हिन्दुतानियों का सिर गर्व से ऊंचा हो गया था। माना जा रहा था कि यह फिल्म इस बार भारत को पहला बड़ा ऑस्कर दिलाने में सफल हो जाएगी। फिल्म ने अंतिम पांच शीर्ष फिल्मों में जगह बना ली थी। लेकिन विजयश्री दरवाजे से लौट गई।
इसके बाद सन् 2005 में अश्विन कुमार की 'लिटिल टेरेरिस्ट' को बेस्ट शॉर्ट सब्जेक्ट (लाइव एक्शन) और सन् 2007 में दीपा मेहता की 'वाटर' को 'बेस्ट फॉरेन लेंग्वेज फिल्म' में नामांकित किया गया। लेकिन इन दोनों का भी वही हुआ जो अबतक होते आ रहा था।
लेकिन साल 2009 में कमाल हो गया। तीन भारतीयों ने ऑस्कर में भारत का पताका लहरा दिया। तीन के तीनों ने तीन अलग-अलग श्रेणियों में ऑस्कर जीत लिया। फिल्म थी, 'स्लम डॉग मिलेनियर'। इसके लिए रसूल पूकुट्टी को 'बेस्ट साउंड मिक्सिंग', एआर रहमान को 'बेस्ट ओरिजनल स्कोर' और गुलजार व एआर रहमान को संयुक्त रूप से 'बेस्ट ओरिजन सॉन्ग' की श्रेणी में ऑस्कर अवार्ड दिए गए।
यही से एआर रहमान ने दुनिया में अपनी छाप छोड़ी। साल 2011 में फिल्म '127 आवर्स' के लिए उन्हें दो श्रेणियों (बेस्ट ओरिजनल स्कोर, बेस्ट ओरिजन सॉन्ग) में नामांकन मिला। साल 2013 में बांबे जयश्री ने 'लाइफ ऑफ पाई' में शानदार गाना दिया। उन्हें 'बेस्ट ओरिजन सॉन्ग' श्रेणी में नामांकन मिला।
और फिर 2016, एक बार फिर से एक भारतीय को जीत। इस साल राहुल थक्कर को उनके 'ड्रीम वर्क एनिमेशन मीडिया रिव्यू सिस्टम' के लिए 'स्काई-टेक ऑस्कर अवार्ड' दिया गया है। इस महीने जब ऑस्कर दिए जाएंगे, तब वहां प्रियंका की असरदार मौजूदगी दुनियाभर में भारत के ऑस्कर में बढ़ती धमक का अहसास कराएगी।