मनोरंजन की दुनिया में दिग्गज नाटककार, कवि और साहित्यकार के तौर पर पहचाने जाने वाले एच.एस वेंकेटेश मूर्ति का 81 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। लंबी बीमारी के चलते 30 मई को बंगलुरू में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इस खबर से साहित्य और मनोरंजन के क्षेत्र में शोक की लहर छा गई है।
बीमारी से थे पीड़ित
लगभग पांच दशकों से साहित्य की दुनिया में अपना जादू बरकरार रखने वाले कवि और नाटककार एच.एस. वेंकटेश मूर्ति ने शक्रवार को इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लंबे समय की बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। उनके निधन से कन्नड़ साहित्य में एक समृद्ध और प्रभावशाली अध्याय का अंत हो गया है, जो अपने पीछे कविता, नाटक, बाल लेखन, फिल्म और सांस्कृतिक चिंतन की विरासत छोड़ गए।
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कविताओं में दिखता है भावों का समागम
एच.एस वेंकटेश मूर्ति, जिन्हें लोग प्यार से एचएसवी बुलाते थे। उन्होंने अपनी साहित्यित यात्रा साल 1968 में शुरू की। उनकी कविताएं आधुनिक संवेदनाओं में सराबोर थी, फिर भी वह परंपरा की गहराई से जुड़ी रही। उनके गीतात्मक छंदों में एक संगीत प्रतीत होता था, इसी वजह से उनकी कई कविताएं भावगीत में लोकप्रिय हुईं । एचएसवी की अंतिम रचना ‘बुद्धचरण’ थी, जिसे 2020 में प्रकाशित किया गया था। यह रचना बुद्ध के जीवन और दर्शन की खोज करने वाली एक लंबी कविता थी।
जीते कई पुरस्कार
एचएसवी एक कवि के साथ-साथ एक नाटककार भी थे, जिन्हें ‘उरिया उय्याले’ , ‘अग्निवर्णा’ और ‘मंथरे’ जैसी रचनाओं के लिए जाना जाता था। यहीं नही उन्होंने कई गाने, कहानियां और नाटक लिखे। उनकी कहानी ‘चिन्नारी मुथा’ पर एक फिल्म बनाई गई जिसने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था। एचएसवी को पांच बार कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।