अभिनय के अलावा गायिकी में भी थीं कमाल
दया डोंगरे के निधन से मराठी सिनेमा जगत में शोक की लहर है। 1940 में पुणे में जन्मी दया डोंगरे को कला और अभिनय प्रतिभा विरासत में मिली। उनकी मां यमुनाबाई मोदक एक प्रसिद्ध नाट्य अभिनेत्री थीं, जबकि उनकी मौसी शांताबाई मोदक एक गायिका थीं। उनके परदादा भी कीर्तनकार थे। स्कूल के दिनों से ही अभिनय में रुचि रखने वाली दया फर्ग्यूसन कॉलेज में एकांकी प्रतियोगिताओं में भाग लेती थीं। बाद में, उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) से नाटक की शिक्षा ली, जहां उन्हें गायन और अभिनय के लिए छात्रवृत्ति मिली।
नेगेटिव किरदारों के लिए जानी गईं
दया डोंगरे सिर्फ अभिनय के मामले में आगे नहीं थीं, बल्कि उनकी गायिकी भी कमाल थी। शुरुआत में वे संगीत की दुनिया में ही करियर बनाना चाहती थीं। मगर, अभिनय में भी उन्हें महारत थी और इस क्षेत्र में भी उन्होंने खुद को साबित कर दिखाया। उन्होंने कई सीरियल में काम किया। खासकर दूरदर्शन के 'गजरा' धारावाहिक से उन्हें घर-घर में पहचान मिली। उन्होंने कड़क और चालाक सास की भूमिकाएं खूब शानदार तरीके से अदा कीं। दया ने अधिकांश खलनायिका के किरदार निभाए और इस अंदाज में निभाए कि उन्हें देख दर्शक भी डर से थरथरा जाएं।
इस फिल्म से शुरू किया था करियर
दया डोंगरे की शादी शरद डोंगरे से हुई और वे भी कला प्रेमी थे। शरद डोंगरे का निधन साल 2014 में हो गया था। शरद से विवाह के बाद दया दिल्ली बस गईं। हालांकि, करियर जारी रखा। 1964 से दिल्ली दूरदर्शन के साथ काम करते हुए, उन्होंने 1972 में मुंबई दूरदर्शन के 'गजरा', 'बंदिनी' और 'आवां' जैसे कार्यक्रमों में काम किया। उन्होंने लोकप्रिय धारावाहिक 'स्वामी' में गोपिकाबाई की भूमिका निभाकर छोटे पर्दे पर सफलता हासिल की। दया ने मराठी सिनेमा में अपनी शुरुआत जब्बार पटेल द्वारा निर्देशित फिल्म 'उम्बरथा' (1982) से की थी। इसके बाद उन्होंने 'खट्याल सासु नथल सून', 'नकाब', 'लालची रुखा माटी', 'चार दिवस सासुचे' और 'कुलदीपक' जैसी फिल्मों में काम किया। दया की दो बेटियां हैं।