चेतन भगत उन लेखकों में से हैं, जिनकी कई किताबों पर फिल्में बनी हैं। इनमें ‘थ्री इ़डियट्स’, ‘काई पो चे’ और ‘2 स्टेट्स’ शामिल हैं। हालांकि, चेतन भगत का कहना है कि उन्हें फिल्मों से कोई खास लगाव नहीं है। क्योंकि इसमें कोई क्रिएटिविटी नहीं है। साथ ही उन्होंने बताया कि वो क्यों फिल्मों की दुनिया में आए थे और किसलिए उन्होंने अपनी किताबों पर फिल्में बनाई थीं। साथ ही उन्होंने बॉलीवुड इंडस्ट्री को लेकर कई बड़े बयान दिए।
पिंकविला के साथ बातचीत के दौरान चेतन भगत ने अपनी किताबों पर बनी फिल्मों को लेकर बात की। साथ ही उन्होंने इस दौरान की पूरी प्रोसेस को भी बताया। चेतन ने बताया कि उन्होंने अधिक लोकप्रियता हासिल करने के लिए अपनी किताबों पर फिल्में बनाने का सोचा था। उनका कहना है कि भारतीयों को औसतन किताबों से ज्यादा फिल्में पसंद आती हैं। इसलिए मैंने सोचा कि अगर मैं फिल्में बनाना शुरू करूं, तो लोग मुझे ज्यादा पसंद करेंगे। इसी सोच के साथ मैंने बॉलीवुड में कदम रखा। फिल्में बनाने में तीन साल लगते हैं और इस दौरान ज्यादातर समय प्रोड्यूसर के साथ बैठकर चाय पीने या एक्टर्स को मनाने की कोशिश करने में ही जाता है। इसमें कोई क्रिएटिविटी नहीं होती।
मैंने अपनी जिंदगी के 10-15 साल फिल्मों में लगा दिए
लेखक ने कहा कि मुझे दुनिया और किरदार रचने का ज्यादा शौक है, इसीलिए मैंने अपनी ऊंची तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ दी। मैंने अपनी जिंदगी के 10-15 साल फिल्में बनाने में लगा दिए। मैंने छह फिल्में बनाईं। फिर मुझे एहसास हुआ कि मुझे ये नहीं चाहिए। वे बस मेरी कहानियों का अनुवाद कर रहे हैं। हां, गाने और ग्लैमर के साथ ये बहुत अच्छा है, लेकिन मुझे संतुष्टि नहीं मिल रही। कोरे कागज से जादू पैदा करना मेरे लिए ईश्वर का दिया हुआ तोहफा है। मैं सेट पर इधर-उधर भाग रहा था, किसी एक्टर के डेट्स देने का इंतजार कर रहा था। लोगों को खुश करने वाले अपने स्वभाव की वजह से मैं 15 साल से फिल्मों के पीछे भाग रहा था। ये मैं नहीं हूं, इससे मुझे संतुष्टि नहीं मिलती।
कई एक्टर्स को लेकर किया खुलासा
चेतन ने आगे कई एक्टर्स के बारे में भी खुलासा किया। उन्होंने कहा कि हाल ही में 50 साल की उम्र में उन्हें इस नए आत्मविश्वास का एहसास हुआ। लेखक ने आगे कहा कि कुछ अभिनेता और निर्देशक ऐसे हैं जिनकी फिल्में पहले चलती थीं, लेकिन अब नहीं चलतीं। वे इसे अच्छी तरह से नहीं लेते। उन्हें मानसिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं। कुछ अभिनेता ऐसे भी हैं जो रेस्टोरेंट में जाते हैं और अगर उन्हें पहचाना नहीं जाता, तो उन्हें खाने में मजा नहीं आता। वो सोचते हैं, 'कोई फोटो खींचने नहीं आया?' क्या आप सोच सकते हैं कि यह कितनी बीमार जिंदगी है?
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बॉलीवुड शोहरत का नशाघर है
शोहरत को एक नशा बताते हुए चेतन भगत ने बताया कि इसी से बचने के लिए वे दुबई चले गए। उन्होंने यह भी कहा कि अब उन्हें इसकी लत नहीं रही। मैं अब ज्यादातर दुबई में ही रहता हूं। शोहरत की क्रिएटिविटी को भी प्रभावित करती है। अगर मैं लगातार यह सोचता रहूं कि मैं मशहूर हूं, तो मैं कुछ अच्छा नहीं लिख पाऊंगा। लेकिन बॉलीवुड शोहरत का नशाघर है। मुंबई में शोहरत का नशा इतना जबरदस्त है कि उसे हवा में महसूस किया जा सकता है। मुंबई छोड़ना मुश्किल है। यह स्मोकिंग करने जैसा है।