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Exclusive: ‘ताश खेलते हुए डायलॉग बोलना आसान नहीं था’, विजय वर्मा ने बताया मुश्किल थी ‘मटका किंग’ की शूटिंग

सार

Vijay Varma Interview: अभिनेता विजय वर्मा की वेब सीरीज ‘मटका किंग’ हाल ही में रिलीज हुई है। सीरीज में वह एक ऐसे किरदार में नजर आ रहे हैं जिसने 1960 के दशक में देश का सबसे बड़ा जुए का साम्राज्य खड़ा किया था। अब अभिनेता ने इसकी शूटिंग से जुड़े किस्से साझा किए।
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विजय वर्मा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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विजय वर्म इन दिनों अपनी हालिया रिलीज वेब सीरीज ‘मटका किंग’ को लेकर चर्चाओं में हैं। अमर उजाला से हुई खास बातचीत में विजय ने इस प्रोजेक्ट को चुनने की वजह, शूटिंग के दौरान आई चुनौतियों और निर्देशक नागराज मंजुले के साथ काम करने के अनुभव पर खुलकर बात की। बातचीत के दौरान उन्होंने इस खेल की बारीकियों, उसे समझने में आई मुश्किलों और उससे जुड़ी अपनी निजी यादों का भी जिक्र किया।

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मटका किंग - फोटो : सोशल मीडिया

नागराज के साथ काम करने की इच्छा थी
‘मटका किंग’ को हां कहने की वजह पूछे जाने पर विजय ने सबसे पहले निर्देशक नागराज मंजुले का नाम लिया। उन्होंने कहा, ‘नागराज मंजुले के साथ काम करना मेरा सपना था पर जब मैंने अपने किरदार के बारे में सुना तो थोड़ा डर गया कि मैं यह कर पाऊंगा या नहीं। डर इसीलिए था क्योंकि नागराज की फिल्मों में हर बारीकी पर ध्यान दिया जाता है। नॉन एक्टर्स से भी वो बड़ी खूबसूरती से एक्टिंग करवा लेते हैं। मुझे लग रहा था कि मेरा एक्सपीरियंस या मेरा काम इनके काम के आड़े ना आ जाए।’

मटका किंग की टीम - फोटो : सोशल मीडिया

मटके का खेल समझना था मुश्किल
शूटिंग के दौरान सबसे बड़ी चुनौती क्या रही? इस पर विजय ने कहा, ‘सबसे मुश्किल था मटके का खेल समझना। बाहर से देखने पर लगता है कि ये सिर्फ ताश का खेल है लेकिन जब आप उसे किरदार के साथ जीते हैं, तब पता चलता है कि उसके भीतर कितनी बारीकियां हैं। ताश खेलते हुए डायलॉग बोलना, बातचीत करना, एक्सप्रेशन बनाए रखना और साथ ही उस दुनिया में बने रहना… ये सब एक साथ करना अपने आप में बड़ा चैलेंज था।’

विजय वर्मा - फोटो : इंस्टाग्राम-@itsvijayvarma

ट्रेन के सफर में खेलता था ताश
दिलचस्प बात यह है कि ताश से विजय का रिश्ता सिर्फ इस सीरीज तक सीमित नहीं है। उन्होंने बताया कि असल जिंदगी में भी वह ताश खेल चुके हैं। विजय बोले, ‘मैंने रियल लाइफ में भी खूब ताश खेला है। हैदराबाद से किशनगढ़ के ट्रेन सफर के दौरान एक अलग ही माहौल हुआ करता था। लोग अपने सब जरूरी सामान के साथ ताश लेकर चलते थे, ताकि सफर आराम से कट जाए। मैं भी उन्हीं में शामिल था और मुझे भी सफर के दौरान ताश खेलना पसंद था।’

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विजय वर्मा - फोटो : इंस्टाग्राम-@itsvijayvarma
चाहकर भी जल्दी सो नहीं पाता 
बातचीत के दौरान जब विजय से पूछा गया कि ऐसी कौन सी लत है, जो चाहकर भी छूट नहीं रही? तो विजय ने हंसते हुए कहा, ‘मैं बहुत कोशिश करता हूं कि वक्त पर सो जाऊं लेकिन पता नहीं क्यों ऐसा हो नहीं पाता। रात के एक-दो बज ही जाते हैं। कोशिश तो करता हूं, लेकिन रोज बुरी तरह फेल हो जाता हूं। यही मेरी एक ऐसी आदत है, जिसे चाहकर भी बदल नहीं पा रहा हूं।’

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