राघव एम जैरथ और नीरज पांडे
- फोटो : सोशल मीडिया
इमरान हाशमी तस्करी के एक सीन में
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सेट पर तैयारी से आते थे इमरान
जब हमने इमरान को इस किरदार की कहानी सुनाई, तो शुरू में अंदाजा नहीं था कि वो इसे इतनी जल्दी और इतनी गहराई से समझ लेंगे। करीब पैंतालीस मिनट की बातचीत के बाद ही साफ हो गया था कि वो इस रोल को सिर्फ निभाने नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी की तरह लेने वाले हैं।
इमरान हर सीन में पूरी तैयारी के साथ आते थे। वो सिर्फ डायलॉग याद करके सेट पर नहीं आते थे, बल्कि एक कस्टम्स ऑफिसर की बॉडी लैंग्वेज, टाइमिंग, एयरपोर्ट के बीच मूवमेंट और लोगों को देखने-समझने के तरीके को गहराई से स्टडी कर चुके थे। वो लगातार पूछते रहते थे कि किसी सिचुएशन में ऑफिसर क्या सोचेगा? सामने वाले को कैसे पढ़ेगा? और खुद को कैसे कंट्रोल में रखेगा?
इमरान ने चुप रहकर किरदार को खास बनाया
मेरे लिए सबसे खास बात ये थी कि इमरान कभी भी किसी सीन को हल्के में नहीं लेते थे। हर सीन के पीछे उनका एक साफ मकसद होता था। कई बार बिना स्क्रिप्ट बदले, सिर्फ एक्सप्रेशंस और आंखों से ही उन्होंने सीन को इतना असरदार बना दिया कि मैं खुद मॉनिटर के सामने रुक गया। उनका किरदार ज्यादा शो नहीं करता। इमरान ने चुप रहकर इस किरदार को खास बनाया है।
उन्होंने इस किरदार के लिए कई छोटी-छोटी चीजें नोटिस की थीं। इन बातों पर आम आदमी ध्यान नहीं देता लेकिन एक कस्टम ऑफिसर सामने वाले के हाव-भाव से ही पूरी कहानी पढ़ लेता है। मुझे ये देखकर हैरानी होती थी कि इमरान सिर्फ रोल निभा नहीं रहे थे, बल्कि सच में उसे जी रहे थे।
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किरदारों को खुलकर जीने का मौका देता है ओटीटी
ओटीटी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां किरदारों को वक्त मिलता है। फिल्मों में समय सीमित होता है, लेकिन सीरीज में किरदारों के ग्रे एरिया को भी खुलकर दिखाया जा सकता है। इसी वजह से तस्करी में तैयारी पर खास ध्यान दिया गया और कई वर्कशॉप्स की गईं। जब तक किरदार और सिचुएशन पूरी तरह साफ नहीं हुई, तब तक कैमरा ऑन नहीं किया गया।