सुरेश त्रिवेणी
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एक समय था, जब फिल्मों के लिए सबसे बड़ी चुनौती सेंसर बोर्ड हुआ करता था। लेकिन अब खेल बदल चुका है। आज ट्रेलर रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर फिल्म का ट्रायल शुरू हो जाता है। लोग पूरी फिल्म देखे बिना राय बना लेते हैं और कई बार रिलीज से पहले ही फैसला सुना देते हैं। तुम्हारी सुलु, जलसा और अब मां बहन जैसी अलग तरह की फिल्में बनाने वाले निर्देशक सुरेश त्रिवेणी मानते हैं कि आज फिल्ममेकर्स के सामने सबसे बड़ा दबाव कैमरे के पीछे नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर बैठी उस दुनिया का है, जहां हर कोई जज बन चुका है।
'मां बहन'
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‘आजकल फिल्म पर चर्चा शुरू भी नहीं होती... लोग फैसला पहले सुना देते हैं’
सोशल मीडिया के दबाव पर फिल्ममेकर कहते हैं, ‘मेरी इस साल तीसरी रिलीज है - दलदल, सूबेदार और अब मां बहन। लगातार रिलीज के बीच अब मैं इस दबाव को समझने लगा हूं। मैंने एक चीज महसूस की है। आजकल किसी फिल्म पर चर्चा शुरू भी नहीं होती और लोग पहले ही उसके बारे में राय बना लेते हैं। बहुत जल्दी फैसला सुना दिया जाता है। लेकिन असली फैसला तब आता है, जब लोग सच में फिल्म देखना शुरू करते हैं। इसलिए अब मैंने यह सीखा है कि हर बात पर तुरंत प्रतिक्रिया देने की जरूरत नहीं है। सबकी सुनो, लेकिन आखिर में वही सुनो जो आपको सही लगे।’
सुरेश त्रिवेणी
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‘पहले लोग चिट्ठियां भेजते थे... अब तीन सेकंड में मोबाइल पर पहुंच जाती है राय’
निर्देशक का मानना है कि सोशल मीडिया ने चीजों को बदला कम है, तेज ज्यादा कर दिया है। वह कहते हैं, ‘पहले लोग अपने पसंदीदा एक्टर्स और डायरेक्टर्स को चिट्ठियां लिखा करते थे। उन तक पहुंचने में हफ्ते-महीने लगते थे। अब वही बात इंस्टाग्राम पर कुछ सेकंड में आपके पास पहुंच जाती है। एक तरह से यह अच्छी बात भी है। क्योंकि फिल्ममेकर को तुरंत जनता की नब्ज समझ में आ जाती है। अगर फिल्म सिनेमाघरों में चल रही है और कुछ बदलाव करने से फिल्म बेहतर होती है, तो उसमें कोई बुराई नहीं है। हमें इस बदलते दौर के साथ चलना सीखना होगा।’
‘ट्रोलिंग को सुनो... लेकिन उसे सिर पर मत चढ़ाओ’
सोशल मीडिया के अंधेरे पक्ष पर सुरेश साफ कहते हैं कि हर आवाज जरूरी नहीं होती। उनके मुताबिक, ‘फालतू की आलोचना होती है, ट्रोलिंग होती है… उनको सुनकर वहीं छोड़ देना चाहिए। क्योंकि आप हर किसी को खुश नहीं कर सकते। सोशल मीडिया के अपने फायदे हैं, नुकसान भी हैं। आखिर में सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि एक फिल्ममेकर किस चीज को कितना महत्व देता है। अगर मेरी फिल्म के लिए कोई क्रिएटिव और फायदेमंद फीडबैक आ रहा है, तो उसे जरूर सुनना चाहिए।’
‘मेरी फिल्मों में महिला किरदार हमेशा केंद्र में रहे हैं... और यह मेरी पसंद है’
सुरेश त्रिवेणी की फिल्मों की एक दिलचस्प बात यह रही है कि उनकी कहानियों में महिला किरदार हमेशा मजबूत दिखाई देते हैं। इसे वह संयोग नहीं, अपनी सोच मानते हैं। वह कहते हैं, ‘मेरी फिल्में महिला प्रधान हैं। मुझे इस बात पर गर्व है। मुझे बहुत अच्छा लगता है कि मुझे इस दौर के बेहतरीन कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिल रहा है।’
‘सुपरहीरो को भी साधारण दुनिया में डाल दो... वहीं से कहानी में जान आती है’
अपनी कहानी कहने के तरीके पर फिल्ममेकर कहते हैं कि उन्हें हमेशा जमीन से जुड़ी दुनिया आकर्षित करती है। वह कहते हैं, ‘हर कहानी में जब आप असली लोगों को असली परिस्थितियों में डालते हो, तो कहानी में नया पन आता है। चीजें ज्यादा सच्ची लगने लगती हैं। सुपरहीरो को भी साधारण दुनिया में डाल दो, तो वहीं से कहानी शुरू होती है। और वहीं मजा आता है।’
‘मां-बहन को दर्जा तो बहुत देते हैं... लेकिन क्या उन्हें इंसान की तरह देखते हैं?’
अपनी फिल्म मां बहन को लेकर सुरेश ने एक ऐसी बात कही, जो सीधे समाज की सोच पर सवाल उठाती है। वह कहते हैं, ‘हमारे यहां मां और बहन दोनों रिश्तों को बहुत ऊंचा दर्जा दिया जाता है। लेकिन क्या उन्हें इंसान की तरह देखने में आज भी हम बहुत पीछे हैं। ये शब्द हम रोज इस्तेमाल करते हैं। घर में अलग तरीके से… बाहर अलग तरीके से। यही बात इस कहानी में बहुत नेचुरली आई। जब मैंने पहली बार वह फोन कॉल वाला सीन लिखा था, तो मुझे लगा कि डिसफंक्शनल फैमिली का रिश्ता दो बहनों में नहीं बैठ रहा था, मां और बेटियों में भी नहीं बैठ रहा था। फिर धीरे-धीरे यह कहानी एक मां और दो बहनों के रिश्ते में बहुत ऑर्गेनिक तरीके से अपनी जगह बना गई।’
‘फिल्म अगर सिर्फ 30 सेकंड सोचने पर मजबूर कर दे... वही बहुत है’
सिनेमा को लेकर निर्देशक की सोच बिल्कुल साफ है। वह फिल्मों को भाषण का मंच नहीं मानते। वह कहते हैं, ‘अगर फिल्म आपको 30 सेकंड के लिए सोचने पर मजबूर कर दे, तो वही बहुत है। उससे ज्यादा कुछ उम्मीद नहीं करता। मुझे लगता है कि कहानियां कहनी चाहिए। यह नहीं कि कोई संदेश पहुंचाना है। सबसे पहले मनोरंजन। क्योंकि जब आप जरूरत से ज्यादा उपदेश देने लगते हैं, तो वह फिल्म नहीं, भाषण बन जाता है।’