रक्षाबंधन की बात चली तो सैफ अली खान सीधे भोपाल के बचपन में पहुंच गए। घर में उनकी दो बहनें थीं। कजिन साथ रहते थे। उनमें तीन-चार बहनें थीं और कुछ दोस्त भी। यानी राखी का दिन सिर्फ राखी बांधने तक सीमित नहीं था। घर में खूब लोग होते थे और पूरा दिन उसी माहौल में बीतता था। अमर उजाला से खास बातचीत में सैफ ने बहनों के साथ अपने रिश्ते, बचपन की राखी और त्योहारों से जुड़ी कई दिलचस्प यादें साझा कीं।
सैफ अली खान
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भोपाल में राखी का दिन होता था लंबा
‘मेरी दो बहनें हैं, लेकिन बचपन में जब हम भोपाल में रहते थे ना, तब हमारे कजिन भी हमारे साथ रहते थे। कजिन में ही तीन-चार बहनें थीं और कुछ दोस्त भी थे। तो राखी... मतलब, काफी बड़ा सा माहौल होता था। बहुत लोग होते थे। सबको राखी बांधनी है... एक के बाद एक। फिर पूरा दिन उसी में निकल जाता था। बहुत अच्छा लगता था। तब तो ये सब बहुत सामान्य लगता था। आप सोचते भी नहीं थे कि ये बाद में याद आएगा। लेकिन अब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है... यार, वो बहुत अच्छा समय था। सब साथ रहते थे, इसलिए त्योहार भी सच में त्योहार जैसा लगता था।’
सैफ अली खान
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राखी की यादों में एक खूबसूरत दोस्त भी शामिल
बचपन की उसी भीड़ में एक लड़की की याद भी सैफ के साथ रह गई। ‘एक लड़की भी थी हमारी दोस्त... बहुत खूबसूरत लड़की थी। उसने मुझे राखी बांधी थी। तो वो भी याद है। उस वक्त तो इतना नहीं सोचते थे कि ये भी कोई खास याद बन जाएगी। बस... राखी बांधी, हो गया। लेकिन अब इतने साल बाद कोई पूछता है तो अचानक याद आता है... अच्छा हां, ये भी हुआ था। बचपन में ऐसी बहुत सारी चीजें होती हैं, जिनका उस वक्त कोई हिसाब नहीं रखते। बाद में लगता है, अरे ये तो याद रह गया। तो मेरी राखी की यादें भी ऐसी ही हैं... बहुत सारे लोग, बहनें, कजिन, दोस्त और पूरा दिन एक साथ।’
सैफ अली खान-सबा अली खान
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‘सिर्फ भाई ही बहन की रक्षा नहीं करता’
सैफ के लिए बहन की ‘रक्षा’ का मतलब सिर्फ भाई की जिम्मेदारी नहीं है। इस बारे में वे कहते है, ‘लोग कहते हैं ना कि भाई बहन की रक्षा करता है। लेकिन... ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ भाई ही बहन की रक्षा करता है। बहन भी बहुत कुछ करती है। मेरी छोटी बहन सबा मुझे काफी मार्गदर्शन देती हैं। अगर परिवार में कोई बात हो रही हो, कोई चीज हो... तो मैं उनसे बात करता हूं। वो अपनी राय देती हैं और मैं सुनता हूं। तो... वो भी एक तरह से आपकी रक्षा ही है ना।’
सैफ अली खान-सोहा-सबा
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सैफ इस रिश्ते को एक तरफा मानने के लिए तैयार नहीं हैं।
‘रिश्ता ऐसा नहीं है कि एक आदमी हमेशा दूसरे को बचाता रहे। कभी-कभी आपको भी किसी की जरूरत होती है। कोई आपको कहे कि नहीं, ये मत करो... ऐसे करो। सबा कई बार वो करती हैं। वो छोटी हैं, लेकिन कई बार... मार्गदर्शन वही करती हैं। मुझे लगता है कि भाई-बहन का रिश्ता दोनों तरफ से होता है। सिर्फ राखी बांधने और रक्षा करने की बात नहीं है। आप एक-दूसरे के लिए होते हो।’
सैफ अली खान-सोहा अली खान
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सोहा राखी को लेकर रहती हैं पूरी तरह तैयार
सबा की बात से सोहा अली खान का जिक्र निकलता है तो सैफ को उनकी एक खास आदत याद आती है। उनके मुताबिक सोहा रक्षाबंधन को काफी गंभीरता से लेती हैं। ‘सोहा हमेशा राखी को बहुत गंभीरता से लेती हैं... हमेशा। वो एक अच्छा कार्ड देती हैं, एक अच्छा गिफ्ट देती हैं। उनको लगता है कि राखी है तो कुछ अच्छा होना चाहिए। वो इन चीजों को लेकर काफी गंभीर रहती हैं। मुझे लगता है कि इस मामले में वो मुझसे ज्यादा व्यवस्थित हैं। मैं इतना... नहीं हूं।’
दरअसल, दोनों का अपना-अपना तरीका है। सबा अपनी तरह से हैं, सोहा अपनी तरह से। लेकिन सोहा राखी को लेकर हमेशा बहुत अच्छी रही हैं। कार्ड देना, कुछ अच्छा देना... वो उस चीज को महत्व देती हैं। और अच्छा लगता है। त्योहार में ऐसी छोटी-छोटी चीजें ही तो होती हैं।’
गिफ्ट की बात आई तो सैफ बोले- ‘कैश... सबको पसंद है’
बहनों के लिए सबसे यादगार गिफ्ट की बात आई तो सैफ कुछ देर सोचते हैं। कोई खास तोहफा याद नहीं आता। कुछ देर सोचने के बाद सैफ का जवाब सीधा था। ‘सबसे यादगार उपहार... पता नहीं। कोई एक चीज याद नहीं है। लेकिन अगर आप पूछ रहे हैं कि उपहार में क्या अच्छा लगता है तो... कैश। सबको पसंद है।’
बचपन में जब पैसे नहीं होते थे, तब क्या करते थे? इस पर सैफ का जवाब और मजेदार हो जाता है। ‘जब पैसे नहीं होते थे तो... कहता था, आशीर्वाद ले लो। वो तो मैं अभी भी करता हूं।’
करीना कपूर-कुणाल-सोहा-सबा-सैफ अली खान
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सैफ के लिए त्योहार का मतलब है पूरा परिवार एक साथ
राखी से बात बाकी त्योहारों तक पहुंची तो सैफ के लिए त्योहारों की सबसे खास बात परिवार का साथ होना है। ‘मैं त्योहारों का बहुत आनंद लेता हूं। त्योहार बहुत खूबसूरत समय होता है। दिवाली हो, क्रिसमस हो, राखी हो... हर त्योहार में एक मौका मिलता है कि सब साथ हों। साथ में कुछ खाना पकाते हैं, साथ में खाते हैं। अगर एक प्रार्थना भी हो जाए, एक पूजा भी हो जाए, तो वो परिवार को बहुत अच्छी तरह जोड़ती है।’
आखिर में सैफ कहते हैं, ‘ये सिर्फ पूजा नहीं है। साथ में खाना खाना, कुछ बनाना, कुछ मनाना... ये बहुत खूबसूरत चीज है। परिवार को जोड़ती है। आजकल सब अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हैं। तो त्योहार में एक मौका मिलता है कि सब एक साथ आ जाएं। एक दिन के लिए ही सही। साथ बैठो, खाना खाओ, कुछ मनाओ... अच्छा लगता है। मेरे लिए त्योहार की यही सबसे खूबसूरत बात है।’