आपने पुलिस अधिकारी के कई किरदार निभाए हैं। क्या अब आप खुद भी गिनती भूल गए हैं?
अभी तो और करने वाला हूं। अभी से मत गिनिए। मेरे लिए हर किरदार अलग है। आप सभी पत्रकार कभी किसी पुलिस स्टेशन जाकर देखिए। वहां टहलते हुए लोगों को देखिए और दो पुलिसवालों से बात कीजिए। आपको लगेगा कि ये दोनों एक छत के नीचे काम कैसे कर रहे हैं। दोनों की ड्यूटी 24 घंटे की है। साथ काम करते हैं, लेकिन दोनों की जिंदगी और व्यक्तित्व बिल्कुल अलग हैं। 24 घंटे साथ बिताना भी आसान नहीं है। मेरे लिए हमेशा किरदार अहम रहा है। निर्देशक और लेखक के साथ भी मेरी यही सोच रहती है कि कहानी उस इंसान की होनी चाहिए, जो वर्दी पहन रहा है, न कि सिर्फ वर्दी की। मेरा फोकस हमेशा उस किरदार पर रहता है।
मनोज बाजपेयी की फिल्म गजब रात
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'शूल' से लेकर 'इंस्पेक्टर झेंडे' और अब 'गजब रात' तक, पुलिसवाले के किरदारों में आपके लिए क्या बदलता है?
'शूल' की बात अलग थी। 'इंस्पेक्टर झेंडे' का अपना अलग अंदाज है। उसमें ब्लैक ह्यूमर है। हर फिल्म की टोन, टोनैलिटी, केस और जॉनर अलग होते हैं। इसलिए उन्हें एक ही तरह से नहीं देखा जा सकता। 'गजब रात' को भी कॉप ड्रामा मत समझिए। फिल्म की शुरुआत में लगता है कि अब पुलिस की कहानी आगे बढ़ेगी। लेकिन उसके बाद किरदारों के आपसी रिश्ते, उनके बीच के टकराव और भरोसे से जुड़ी कई परतें खुलती हैं। इस आदमी की अपनी निजी जिंदगी है। उसके व्यक्तित्व के कई पहलू हैं, जो कहानी में अलग-अलग रंग जोड़ते हैं। दर्शकों के सामने एक-एक करके पत्ते खुलते हैं। नए किरदार सामने आते हैं और उनके साथ इस इंसान के रिश्ते अलग ढंग से विकसित होते हैं। मेरे हिसाब से यह दर्शकों के लिए एक दिलचस्प अनुभव होगा। इसे सिर्फ कॉप ड्रामा कहना सही नहीं होगा।
आपने अपने करियर में कई बड़े कलाकारों के साथ काम किया है। क्या कभी लगा कि शुरुआती दिनों में आपको भी किसी ऐसे सहयोग या समर्थन की जरूरत थी, जैसा आज आप अपने सह-कलाकारों को देते हैं?
मैं अपने सीनियर्स की बात करूं, तो राजनीति में मैंने नाना भाई के साथ काम किया था। शाहरुख मेरे सीनियर नहीं हैं, वह मेरे समय के हैं। अक्षय कुमार और अनिल कपूर के साथ भी मैंने काम किया है। अनिल जी के साथ 'बेवफा' में काम किया था। लेकिन मैंने बहुत ज्यादा सीनियर्स के साथ काम नहीं किया। जब आप एक ही पीढ़ी के कलाकारों के साथ काम करते हैं, तो चीजें बहुत अलग होती हैं। मैं सेट पर ऐसा माहौल रखने की कोशिश करता हूं, जहां कोई पदानुक्रम न हो। मुझे लोकतांत्रिक सेट पसंद है। कोई भी मेरे पास आ सकता है और मैं भी किसी के पास जा सकता हूं। सबके साथ बातचीत होनी चाहिए। आप साथ काम कर रहे हैं। ऐसे में विचारों का आदान-प्रदान, अनुभव साझा करना और एक-दूसरे से सीखना जरूरी है। आखिरकार, हम सब मिलकर काम कर रहे हैं।
क्या आज फिल्म बनाने का तरीका भी बदल गया है? पहले की व्यावसायिक फिल्मों और आज की कहानियों में आप कितना अंतर देखते हैं?
पहले हम एक खास तरह की फिल्में बनाते थे। व्यावसायिक फिल्मों के अपने टेम्पलेट होते थे। उसमें चार-पांच गाने होंगे, दो हीरोइनें होंगी, तीन-चार एक्शन सीक्वेंस होंगे और हीरो के व्यक्तित्व को दिखाने पर खास ध्यान दिया जाएगा। सब कुछ पहले से तय होता था। दर्शक पैसे देकर थिएटर में आएंगे, तो हम उन्हें दो बार डराएंगे, चार बार रोमांचित करेंगे, पांच बार नचाएंगे और दो बार रुलाएंगे। यह एक तरह का टेम्पलेट था। लेकिन अब सिनेमा बदल चुका है। 'गजब रात' जैसी फिल्मों में हर किरदार का अपना महत्व है। सभी को अपनी भूमिका के साथ न्याय करना पड़ता है। कोई कलाकार सिर्फ अपनी छवि को दिखाने के लिए काम नहीं कर सकता। ऐसा करेंगे, तो फिल्म नहीं चलेगी। चाहे हम ओटीटी के लिए काम करें या थिएटर के लिए, हमें एक टीम की तरह काम करना पड़ता है। कई बार इसे थिएटर वर्कशॉप की तरह करना होता है। यह बहुत मुश्किल है कि हीरो सेट पर सिर्फ अपने पांच लोगों के साथ आए और बाकी कलाकारों से उसका कोई जुड़ाव न हो। इस तरह आप ऐसी फिल्म बना ही नहीं पाएंगे।
आपकी बातों से लगता है कि अब फिल्म के सेट पर सामूहिक प्रयास पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।
बिल्कुल। जब सभी कलाकार मिलकर काम करते हैं, तभी फिल्म बेहतर बनती है। आप अपने सह-कलाकारों से अलग रहकर, सिर्फ अपनी भूमिका पर ध्यान देकर हर तरह की फिल्म नहीं कर सकते। आपको पूरी कहानी का हिस्सा बनना पड़ता है। निर्देशक, लेखक और सभी कलाकारों को एक साथ आना पड़ता है।'