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'पिता की डबडबाई आंखें देख खुद से नफरत हो गई', बॉलीवुड में संघर्ष का दौर याद कर छलकीं एक्टर बृज गोपाल की आंखें

Sat, 22 Nov 2025 05:27 PM IST
ज्योति राघव एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

Brij Gopal Exclusive Interview: कई सितारे ऐसे हैं, जिन्होंने अभिनय से फिल्मों में सपोर्टिव रोल को दमदार और यादगार बना दिया। इस लिस्ट में एक्टर बृज गोपाल भी शामिल हैं। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से ताल्लुक रखने वाले बृज गोपाल का सिनेमाई सफर किसी फिल्म सरीखा है। पढ़िए...
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बृज गोपाल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इंडस्ट्री में अलग-अलग कलाकार मौजूद होते हैं, जो अपने दौर में कमाल का काम करते हैं। इन्हें शायद आप नाम से न पहचान पाएं, लेकिन इनका चेहरा देखते ही इनके किरदार सामने घूमने लगते हैं। यही असली कलाकारी है। ऐसे ही एक कलाकार हैं, बृज गोपाल। 'बेटा', 'इश्क', 'सुहाग', 'गंगाजल', 'अपहरण', 'घातक', 'चायना गेट' जैसी 300 से ज्यादा फिल्मों में इन्होंने काम किया है। 50 साल से इंडस्ट्री में हैं। हाल ही में उन्होंने अमर उजाला से बातचीत में कई दिलचस्प किस्से शेयर किए। पढ़िए प्रमुख अंश

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'आमिर को गोली मारने पर पड़ी गालियां, प्राण साब बोले- यही तुम्हारी कमाई', एक्टर बृज गोपाल ने सुनाए रोचक किस्से

'बचपन से ही सिनेमा से प्यार था'
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरगर के व्यापारी परिवार में जन्मे एक्टर बृज गोपाल कहते हैं, 'मुझे बचपन से ही घर-परिवार के अलावा अगर किसी से प्यार था तो वह सिनेमा से था। एनसीसी की परेड के लिए जाता था तो यूनिफॉर्म में होता था। एक दोस्त से पहले ही यह पक्का होता था कि परेड से तीन घंटे में आएंगे। हम मिलकर पिक्चर देखते थे। इंटरवल तक वह देखता था। इंटरवल के बाद मैं देखता था। अगली बार इंटरवल तक मैं देखता, फिर टिकट उसे दे देता और बाद की वह देखता। यही सिलसिला चलता था'।

'पिता को बताया एक्टर बनूंगा तो वो जोर से हंसे'
मेरे बड़े भाई डॉक्टर थे। बीआर इशारा जी के एडिटर कुन्नू साहब, मुजफ्फरनगर में किसी फंक्शन में गए थे। मेरे भाई भी वहां थे। उन्हें लगा कि ये इतनी दिलचस्पी लेता है फिल्मों में तो ये क्यों नहीं बन सकता। बात आई-गई हो गई। दसवीं में पिता ने पूछा क्या करना चाहते हो? मैंने कहा एक्टर बनना चाहता हूं तो वह बहुत जोर से हंसे। फिर बोले पढ़ाई पूरी कर लो, फिर जो करना है कर लेना'।

'मुंबई आया तो मेरी बदकिस्मती से बहनोई का ट्रांसफर हो गया'
शादी हो गई। बच्चा हो गया। जब ऊपरवाला आपका कोई काम करना चाहता है तो वह आपको रास्ता देता है। मेरे बड़े बहनोई 1973 में मुंबई में मड आइलैंड में पोस्टेड थे। मैं पिताजी को बोलकर बहन से मिलने आया। मेरी बदकिस्मती देखो, मेरे वहां जाने के 20-25 दिन बाद ही उनका लेह ट्रांसफर हो गया। फिर हम गेस्टहाउस में पांच लोग रहते थे। 75 रुपये किराया था। घर से खूब डांट खात था। घर जाता तो लोग कहते, 'क्यों भाई बन गए हीरो', 'क्या बे आ गया'? मैं कहता, 'अरे भाई अपने माता-पिता को मिलने आए हैं। एक दिन मैंने ऐसी बाते कहने पर एक इंसान की सड़क पर पिटाई की। पिताजी से डांट खाकर, ऐसी परिस्थितियों से गुजरकर फिल्मी सफर शुरु हुआ। बड़े भाई ने काफी मदद की'।

'विलेन बनने का फैसला'
एक फिल्म थी 'पापी'। इसमें सुनील दत्त, संजीव कुमार इसमें थे। इसमें मुझे गैंगस्टर का रोल मिला था। ओपी रल्हन साहब ने मुझसे पूछा तुम क्या बनना चाहते हो मैंने कहा विलेन। उन्होंने कहा कि हीरो क्यों नहीं? मैंने कहा कि मुझे अपनी शक्ल के बारे में कोई गलतफमी नहीं है। दूसरा मेरा मानना है कि विलेन को ज्यादा विविधता मिलती हैं, हीरो के मुकाबले। 

ड्राइवर ने कहा, 'बाऊजी की आंखें देखी हैं'?
मैं मुंबई आ रहा था। पिताजी गाड़ी में बिठाने आए थे। तब हमारे ड्राइवर ने मुझसे कहा, 'आपने बाऊजी की आंखें देखी हैं'? मेरे फादर बहुत दबंग थे। धोती-कुर्ता पहनते थे। ट्रांसपोर्ट का बिजनेस था उका। छह फीट दो इंच का कद। मैंने देखा उनकी आंखें डबडबाई हुई थीं और लाल हो गई थीं। मुझे उस दिन खुद से नफरत हो गई। मैं मुंबई जा रहा हूं, इसका उन्हें महसूस हो रहा है। मुझे उस दिन लगा कि मैं पिता जी को दुखी कर रहा हूं। ये पीछे कितने दुखी होते होंगे'।

आपका काम देखकर पिताजी कब खुश हुए?
मेरी मां मेरे छोटे-छोटे रोल देखकर भी बहुत खुश होती थीं। जब फिल्म 'बेटा' रिलीज हुई तो मां सब्जी वाले से कहती थी कि 'भैरो सिंह आया है, तू मिलने आ'। मां ने पिताजी से छिपकर दो हजार रुपये दिए थे। वह पीरियर भी निकल गया। कुछ छोटे-छोटे रोल करते हुए मैंने एमजी हशमत को बतौर असिस्टेंट जॉइन किया। उनके साथ कुछ राइटिंग करता था। फिर फिल्मों में काम मिलता रहा। एक फिल्म में मेरा सिगरेट पीने का एक सीन था। मेरी बहन ने बताया, 'पिताजी वह सीन देखकर कह रहे थे, 'एक्टर है तुम्हारा भाई बकवास। ऐसे सिगरेट पी जाती है क्या, सिगरेट हमसे सीखो कैसे पी जाती है'। यह इस बात का सबूत है कि वे खुश थे। मुझे संतोष है कि मेरे पिता मेरा कुछ काम देखकर गए हैं। वरना मैं गिल्ट में ही जीता'।
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'पिता के निधन की खबर मिली और मैं शूटिंग करता रहा'
मैं देव साहब की 'प्यार के तराना' की शूटिंग डेनमार्क में कर रहा था। एक दिन देव साहब ने बुलाया। कंधे पर हाथ रखकर बोले, 'ब्रेव बॉय। गुड एक्टर'। मुझे लगा कि कुछ रोल बताएंगे। उन्होंने बताया, 'फादर नहीं रहे तुम्हारे'। मैंने घर फोन किया तो पता चला, अंतिम संस्कार हो गया था। मैंने सोचा कि पिताजी के दर्शन तो होंगे नहीं। आर्टिस्ट बदलेगा यहां इतनी जल्दी में कैसे सब होगा यह सोचकर मैंने देव साहब से हा, 'मैं दर्शन तो कर नहीं सकता पिताजी के। आप मेरा काम खत्म कर दीजिए। उन्होंने तुरंत मेरे सीन पूरे किए। मेरे रोड पर कुछ सीन थे। मैं सड़क किनारे बैठकर रोता था। परफेक्ट तरीके से शॉट भी देता था और फिर बैठकर रोता था। मैं पिताजी की तेरहवीं पर पहुंचा। उसके एक साल बाद ठीक पिताजी की तेरहवीं के दिन माताजी चली गईं'।

आपकी इस फिटनेस का क्या राज है?
किसी भी कलाकार के लिए शरीर ही उसका मंदिर है। यह ठीक रहेगा तो हम काम कर पाएंगे। यही हमारा इंस्ट्रूमेंट है। मैं हर आदमी को सलाह देता हूं कि एक काम के लिए सेल्फिश हो जाओ। अपनी हेल्थ अच्छी रखो। आप तंदरुस्त रहेंगे तो अपने परिवार के लिए खड़े रहेंगे। मैं सुबह प्राणायम करता हूं। फल और स्प्राउट्स का नाश्ता होता है। दिन में एक रोटी खाता हूं। दाल-चावल खाता हूं। रात को डिनर नहीं करता। कुछ उबला हुआ खाना खाता हूं।

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