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Exclusive: ‘34 एक्टर्स के लिए फिल्म लिखना आसान नहीं’, लेखक फरहाद सामजी ने सुनाए ‘वेलकम टू..’ से जुड़े किस्से

सार

Farhad Samji Exclusive Interview: लेखक और निर्देशक फरहाद सामजी ने अमर उजाला से हाल ही में एक खास बातचीत की। इस बातचीत में फिल्म ‘वेलकम टू द जंगल’ और कॉमिक फिल्मों को लेकर कई बातें साझा की हैं।
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फरहाद सामजी, लेखक और निर्देशक - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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फिल्म ‘वेलकम टू द जंगल’ में 34 एक्टर्स को स्क्रीन पर मजेदार ढंग से पेश करना एक मुश्किल काम लगता है। कैसे इस काम को लेखक-निर्देशक फरहाद सामजी ने मुमकिन किया। हाल ही में अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में फरहाद सामजी ने बताया कि दर्शकों को हंसाना सबसे मुश्किल काम है। वह इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्या करते हैं? कैसे एक्टर्स के लिए कॉमिक सीन लिखते हैं? पढ़िए, फरहाद सामजी से हुई बातचीत के चुनिंदा अंश-  

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फरहाद सामजी - फोटो : इंस्टाग्राम@farhadsamji

लोग समझते हैं कि जोक लिखना सबसे मुश्किल काम है 
कॉमेडी फिल्मों को लेकर बनी सबसे बड़ी गलतफहमी पर फरहाद सामजी कहते हैं, ‘देखो, इस फिल्म में इतने सारे लोग थे। अब लोग सोचते हैं कि कॉमेडी में सबसे मुश्किल काम मजेदार लाइन लिखना है। लेकिन सच बताऊं, वो सबसे आसान हिस्सा है। असली मेहनत उसके बाद शुरू होती है। मान लो फरीदा जलाल जी कोई पंच मार रही हैं, अब वहां खड़े सारे लोग एक जैसा रिएक्शन दे सकते हैं। लेकिन हमारी कोशिश यही थी कि सबका रिएक्शन, जवाब अलग हो। कोई भावुक दिखे, कोई तंज मारे, कोई कुछ और बोल दे। अगर सब एक जैसा बोलेंगे, तो सीन वहीं खत्म हो जाएगा।’ 

फिल्म 'वेलकम टू द जंगल' की स्टार कास्ट - फोटो : एक्स (ट्विटर)

स्टार्स के लिए लिखते वक्त किस बात का ध्यान रखते हैं 
बड़ी स्टारकास्ट के बीच लिखने की प्रक्रिया कैसी होती है? इस पर फरहाद सामजी कहते हैं, ‘हम जब लिखते हैं तो कभी यह नहीं सोचते कि फिल्म में अक्षय कुमार हैं तो उनको चार लाइन ज्यादा दे देते हैं। सुनील शेट्टी हैं तो उनके लिए कुछ अलग लिखते हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं होता है। कहानी की जो मांग होती है उसी हिसाब से स्क्रिप्ट लिखी जाती है। जब शुरू में ‘वेलकम टू द जंगल’ की स्क्रिप्ट लिखी गई थी, तब हमें यह भी नहीं पता था कि आखिर कौन से 34 एक्टर्स फिल्म में काम करने वाले हैं।’

जब सबसे मुश्किल दौर का सामना किया 
फिल्म की राइटिंग के दौरान सबसे मुश्किल दौर कब आया? इस पर फरहाद कहते हैं, ‘पहले हिस्से में एक-एक करके लोग जुड़ रहे थे। हर किसी की अपनी जगह थी, इसलिए लिखना आसान था। लेकिन दूसरे हिस्से में जब लगभग सारे लोग एक साथ आ गए, वहां मुश्किल शुरू हुई। चुनौती यह नहीं थी कि किसको कितना टाइम देना है। मुश्किल यह थी कि हर आदमी का रिएक्शन अलग कैसे आए।’ 

फरहाद सामजी - फोटो : सोशल मीडिया

नीरज वोरा की कहानी पर तुरंत हामी भर दी थी 
'वेलकम' फ्रेंचाइजी की नींव रखने वाले दिवंगत लेखक-निर्देशक नीरज वोरा का नाम आते ही फरहाद सामजी उनको याद करते हैं। वह कहते हैं, ‘देखो, नीरज सर के साथ मेरा रिश्ता बहुत पुराना है। हम लोग पहले भी साथ काम कर चुके हैं। मैंने 'बोल बच्चन' लिखी थी, उस वक्त वह उसमें अभिनेता थे और 'गोलमाल' के दौरान भी हम लोग साथ थे। उनके दिमाग में हमेशा अलग तरह की बातें चलती रहती थीं। वह बहुत अच्छे कलाकार थे वो। सच कहूं तो उनके साथ काम करते हुए बहुत कुछ सीखने को मिला।’
फरहाद आगे कहते हैं, ‘इस फिल्म से जुड़ने की सबसे बड़ी वजह भी कहीं न कहीं नीरज वोरा ही थे। यह कहानी नीरज वोरा की थी। स्क्रीनप्ले उन्होंने पहले से लिखा हुआ था। मुझे डायलॉग लिखने को मिले। सच बताऊं यह जानकर ही मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने तुरंत हामी भर दी।’ 

फरहाद सामजी - फोटो : सोशल मीडिया

कॉमेडी पर सोशल मीडिया का गहरा असर हो रहा है 
आजकल फिल्मों में कई कॉमेडी सीन देखकर अक्सर लोगों को लगता है कि ऐसा सीन तो पहले किसी मीम, सोशल मीडिया पोस्ट या व्हाट्सएप जोक में देखा है। इसी बदलते दौर में नया लिखने की चुनौती पर फरहाद कहते हैं, ‘देखिए, इंसान सुबह उठते ही जाने कितनी चीजें देख रहा है। कोई छोटी वीडियो देख ली। कहीं कोई मजेदार क्लिप देख ली। दिनभर अलग-अलग चीजें दिमाग में जाती रहती हैं। फिर जब आप कुछ नया लिखने बैठते हो, तो इरादा यही होता है कि लोगों को नया दिया जाए। लेकिन कभी-कभी बाद में खुद लगता है, यह तो कहीं देखा हुआ है। वो जान-बूझकर नहीं होता, इतनी सारी चीजें हम हर दिन देख रहे होते हैं कि बहुत कुछ दिमाग में कहीं बैठ जाता है। लिखते वक्त अनजाने में बाहर आ जाता है।’ 

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फरहाद सामजी - फोटो : सोशल मीडिया
लेखन में बदलाव को महत्व देना जरूरी है 
लेखन में बदलाव और सुझावों को लेकर फरहाद का नजरिया साफ है। वह कहते हैं, ‘कुछ लेखक बहुत जिद्दी हो जाते हैं। उनको लगता है कि मैंने इतनी मेहनत से लिखा है तो कोई इसे कैसे बदल सकता है। लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि अगर किसी सुझाव से चीज बेहतर हो रही है, तो बदलाव करने में कोई दिक्कत नहीं है। हां, अगर लगे कि उससे सीन खराब हो रहा है, तो मैं वहां अड़ जाता हूं। इतने साल में इतना भरोसा कमा लिया है कि अगर मैं बोल रहा हूं कि यह पंच नहीं चलेगा, तो लोग सुनते हैं। आखिरकार हम सब मिलकर फिल्म बना रहे होते हैं।’
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