इक्कीस का फाइनल ट्रेलर रिलीज
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युवा अमिताभ बच्चन की याद दिलाते हैं अगस्त्य
श्रीराम राघवन ने अगस्त्य की तुलना युवा अमिताभ बच्चन से करते हुए कहा, 'उस दिन उसके चेहरे पर हल्की दाढ़ी थी और किसी वजह से वह मुझे 60 और 70 के दशक के युवा अमिताभ बच्चन की याद दिला रहा था। वह दौर जब उनकी फिल्में लगातार नहीं चल रही थीं, लेकिन वह बार-बार लौटते रहे। वही कच्चापन, वही अनगढ़ सच्चाई। मुझे वही क्वालिटी चाहिए थी। मैं किसी ट्रेनिंग वाले कलाकार की तलाश में नहीं था। मुझे ऐसा लड़का चाहिए था, जो कहानी के साथ साथ आदमी बन सके।'
इस फिल्म में दो अलग दुनिया थीं
कास्ट को लेकर श्रीराम राघवन ने आगे कहा कि इस फिल्म में दो अलग दुनिया थीं। एक तरफ अगस्त्य और टैंक क्रू के 8 से 10 युवा कलाकार थे, सभी 25 साल से कम उम्र के, जो सिनेमा को साथ-साथ खोज रहे थे। दूसरी तरफ जयदीप अहलावत और धरमजी जैसे बेहद अनुभवी और सधे हुए कलाकार थे। इन दोनों दुनियाओं को एक साथ लाना मेरे लिए रचनात्मक रूप से बहुत संतोषजनक अनुभव था। सभी कलाकार अलग-अलग तरह के थे और यही विविधता फिल्म को और समृद्ध बनाती है। मुझे इन कलाकारों के साथ काम करके बहुत मजा आया।
अगस्त्य ने कभी शॉर्टकट नहीं ढूंढा
अगस्त्य नंदा को लेकर निर्देशक ने आगे कहा कि मेरे लिए सबसे अहम बात यह थी कि वह करने के लिए तैयार था। यह सिर्फ परफॉर्मेंस देने की बात नहीं थी। अगर उसे टैंक कमांडर बनना था, तो उसे उस किरदार को सच में समझना और जीना था। कई मौके ऐसे आए जब उसे बार-बार टैंक के अंदर जाना और बाहर निकलना पड़ा। कभी चालीस तो कभी पचास बार, सिर्फ इसलिए ताकि वह उसमें पूरी तरह सहज हो सके। यह शारीरिक रूप से बहुत मुश्किल और असहज होता है, लेकिन उसने कभी शॉर्टकट नहीं ढूंढा। फिल्म में एक सीन है, जहां वह टैंक के अंदर बंद होता है और नीचे के बेहद संकरे रास्ते से बाहर निकलता है, जैसे किसी पाइप के अंदर से गुजरना। उसने यह सब सच में किया। एक वक्त के बाद अभिनय और हकीकत के बीच की लाइन मिट जाती है। जब आप सेना की कहानी कह रहे होते हैं, तो सबसे जरूरी होता है ऑफिसर लायक क्वालिटी का विकास। यही मैंने अगस्त्य में देखा।
सेना के लोगों ने की फिल्म तारीफ
फिल्म की तैयारी पर बात करते हुए निर्देशक ने कहा कि हमने पूना हॉर्स में काफी वक्त बिताया। अरुण खेत्रपाल के भाई से विस्तार से बात की और उन लोगों से मिले, जो उन्हें निजी तौर पर जानते थे। हमारे साथ एक ब्रिगेडियर भी थे, जिन्होंने अरुण के साथ काम किया था और वह पूरी फिल्म के दौरान हमारे कंसल्टेंट रहे। क्योंकि यह एक सच्ची कहानी है, हम घटनाओं के साथ कोई छूट नहीं ले सकते थे। जब सेना के लोगों ने फिल्म देखी और कहा कि यह उन सबसे प्रामाणिक फिल्मों में से एक है जो उन्होंने देखी हैं, तो यह हमारे लिए बहुत अहम था।