कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा?
जसवंत सिंह खालड़ा पंजाब के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, जो उस समय चर्चा में आए जब उन्होंने कथित तौर पर अवैध हत्याओं और गुप्त अंतिम संस्कारों के मामलों को उजागर किया।
उनका जन्म 1952 में अमृतसर जिले के खालड़ा गांव में हुआ था। 1980 के दशक में वे एक बैंक कर्मचारी के रूप में काम करते थे, लेकिन बाद में उन्होंने मानवाधिकार के काम में खुद को पूरी तरह लगा दिया।
वो जांच जिसने उन्हें पहचान दिलाई
ऑपरेशन ब्लू स्टार, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद का समय उन्हें गहराई से प्रभावित कर गया। उस दौरान कई सिख परिवारों ने शिकायत की कि उनके अपने लोग अचानक गायब हो गए थे, जिन्हें पुलिस ने आतंकवाद के शक में उठाया था।
जब उनके आसपास ऐसे मामले बढ़ने लगे, तो जसवंत सिंह खालड़ा ने खुद जानकारी इकट्ठा करना शुरू किया। उनकी जांच उन्हें अमृतसर नगर निगम के रिकॉर्ड तक ले गई, जहां उन्हें ऐसे दस्तावेज मिले जिनमें हजारों लोगों के नाम, उम्र और पते दर्ज थे- जिन्हें कथित तौर पर मारकर बिना परिवार को बताए अंतिम संस्कार कर दिया गया था।
उनकी इस खोज ने देश-विदेश का ध्यान खींचा और उन्हें पंजाब के सबसे प्रमुख मानवाधिकार आवाजों में से एक बना दिया।
उनकी गुमशुदगी और लंबी कानूनी लड़ाई
1995 में जसवंत सिंह खालड़ा खुद ही अचानक गायब हो गए। बताया जाता है कि आखिरी बार उन्हें अपने घर के बाहर कार साफ करते हुए देखा गया था। अगले साल, CBI ने जांच में पाया कि उन्हें तरन तारन के एक पुलिस स्टेशन में रखा गया था। एजेंसी ने इस मामले में नौ पुलिस अधिकारियों पर अपहरण और हत्या का केस चलाने की सिफारिश की।
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यह मामला कई वर्षों तक अदालत में चलता रहा। 16 अक्टूबर 2007 को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने चार आरोपियों- पूर्व सब-इंस्पेक्टर सतनाम सिंह, सुरिंदर पाल सिंह, जसबीर सिंह और हेड कांस्टेबल प्रिथीपाल सिंह- की सजा बढ़ाकर उम्रकैद कर दी।
जसवंत सिंह खालड़ा अपने पीछे पत्नी परमजीत कौर खालड़ा और दो बच्चों- नवकिरण कौर और जनमीत सिंह- को छोड़ गए।