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कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा? जानिए उस सिख मानवाधिकार कार्यकर्ता के बारे में जिनकी कहानी पर बनी ‘सतलुज’ फिल्म

Sun, 05 Jul 2026 04:55 PM IST
संदेश मेहरा एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

Who Was Jaswant Singh Khalra: दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’, जिसका पहले नाम पंजाब '95 था, अब आखिरकार रिलीज हो चुकी है। लगभग तीन साल तक सर्टिफिकेशन की लड़ाई के बाद यह फिल्म दर्शकों तक पहुंची है।

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जसवंत सिंह खालड़ा - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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इस फिल्म का निर्देशन हनी त्रेहान ने किया है और यह पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी से प्रेरित है।

3 साल बाद रिलीज हुई फिल्म

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रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्म पहले अटकी हुई थी क्योंकि सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने इसमें 127 कट्स की मांग की थी। हालांकि अब यह फिल्म बिना किसी कट के नए नाम के साथ रिलीज की गई है।

फिल्म में दिलजीत दोसांझ के साथ कनवलजीत सिंह, अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या ओहल्यन भी अहम भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं। जैसे ही सतलुज OTT पर रिलीज हुई है, आइए जानते हैं उस असली शख्स के बारे में, जिनकी कहानी ने इस फिल्म को जन्म दिया।

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सतलुज फिल्म रिव्यू - फोटो : X

कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा?
जसवंत सिंह खालड़ा पंजाब के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, जो उस समय चर्चा में आए जब उन्होंने कथित तौर पर अवैध हत्याओं और गुप्त अंतिम संस्कारों के मामलों को उजागर किया।

उनका जन्म 1952 में अमृतसर जिले के खालड़ा गांव में हुआ था। 1980 के दशक में वे एक बैंक कर्मचारी के रूप में काम करते थे, लेकिन बाद में उन्होंने मानवाधिकार के काम में खुद को पूरी तरह लगा दिया।

सतलुज फिल्म - फोटो : सोशल मीडिया

वो जांच जिसने उन्हें पहचान दिलाई
ऑपरेशन ब्लू स्टार, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद का समय उन्हें गहराई से प्रभावित कर गया। उस दौरान कई सिख परिवारों ने शिकायत की कि उनके अपने लोग अचानक गायब हो गए थे, जिन्हें पुलिस ने आतंकवाद के शक में उठाया था।

जब उनके आसपास ऐसे मामले बढ़ने लगे, तो जसवंत सिंह खालड़ा ने खुद जानकारी इकट्ठा करना शुरू किया। उनकी जांच उन्हें अमृतसर नगर निगम के रिकॉर्ड तक ले गई, जहां उन्हें ऐसे दस्तावेज मिले जिनमें हजारों लोगों के नाम, उम्र और पते दर्ज थे- जिन्हें कथित तौर पर मारकर बिना परिवार को बताए अंतिम संस्कार कर दिया गया था।

उनकी इस खोज ने देश-विदेश का ध्यान खींचा और उन्हें पंजाब के सबसे प्रमुख मानवाधिकार आवाजों में से एक बना दिया।

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सतलुज फिल्म - फोटो : इंस्टाग्राम-@Zee5

उनकी गुमशुदगी और लंबी कानूनी लड़ाई
1995 में जसवंत सिंह खालड़ा खुद ही अचानक गायब हो गए। बताया जाता है कि आखिरी बार उन्हें अपने घर के बाहर कार साफ करते हुए देखा गया था। अगले साल, CBI ने जांच में पाया कि उन्हें तरन तारन के एक पुलिस स्टेशन में रखा गया था। एजेंसी ने इस मामले में नौ पुलिस अधिकारियों पर अपहरण और हत्या का केस चलाने की सिफारिश की।

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यह मामला कई वर्षों तक अदालत में चलता रहा। 16 अक्टूबर 2007 को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने चार आरोपियों- पूर्व सब-इंस्पेक्टर सतनाम सिंह, सुरिंदर पाल सिंह, जसबीर सिंह और हेड कांस्टेबल प्रिथीपाल सिंह- की सजा बढ़ाकर उम्रकैद कर दी।

जसवंत सिंह खालड़ा अपने पीछे पत्नी परमजीत कौर खालड़ा और दो बच्चों- नवकिरण कौर और जनमीत सिंह- को छोड़ गए।

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