एक एक्टर होने के परे, उनके कई और चेहरे थे। ट्विटर पर अक्सर वो एक माँ के तौर पर नज़र आतीं जो दुलार भरी ऐसी फ़ोटो डालती जिसमें उनकी बेटियाँ साथ में हैं।
उस तस्वीर में एक प्रेमिका नज़र आती है जहाँ बोनी कपूर के साथ आइसक्रीम खाते हुए फ़ोटो डाली है और कैप्शन दिया है- लव इज़ हैविंग चॉकोबार्स टूगेदर। कभी वो अपने पिता को शिद्दत से याद करती बेटी के तौर पर नज़र आती हैं। कभी एक फ़ैशन आइकन और कभी एक पेंटर। वो पेंटिंग भी करती हैं, उनके बारे में ये बात कम ही लोगों को पता है।
जून 2013 की एक ट्विटर पोस्ट में, "श्रीदेवी ने अपनी बनाई एक पेंटिंग की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा है- ये मेरी शुरुआती पेंटिंग्स में से एक है, थॉट्स।" एक और पोस्ट में वो एक नई पेंटिंग शेयर करते हुए ट्वीट करती हैं, ये एक श्रद्धांजलि है जो मैंने जाह्नवी के लिए बनाई है- माइकल जैक्सन की।
श्रीदेवी की फ़िल्मों की ओर लौंटें तो वो उन चंद लोगों में थीं जिन्होंने बाल कलाकार के तौर पर शोहरत पाने के बाद बतौर अभिनेत्री भी ज़बरदस्त कामयाबी हासिल की। वरना ऐसी कई मिसालें हैं जहाँ बचपन में ख़ूब शोहरत कमाने के बाद कई कलाकार गुमनाम होकर रह जाते हैं।
उनके फ़िल्मी सफ़र को समझने की कोशिश में मैंने उनकी शुरुआती तमिल फ़िल्म देखी जो एक पौराणिक कथा पर आधारित थी और 4-5 साल की श्रीदेवी ने भगवान मुरुगन का रोल किया था जो अपने जादुई स्पर्श से एक बीमार बच्चे को ठीक देते हैं।
ये सीन मुझे हमेशा याद रहता है। क्या श्रीदेवी ने अपनी फ़िल्मों में यही नहीं किया- एक जादुई स्पर्श और एहसास से फ़िल्म में अपने इर्द-गिर्द सब कुछ बहुत सुंदर बना देती थीं वो- चाहे वो सदमा हो, चांदनी हो, इंग्लिश विंग्लिश हो या लम्हे। मई 1985 में फ़िल्मफ़ेयर के कवर पर श्रीदेवी की फ़ोटो छपी और उन्हें एम्प्रैस यानी महारानी कहा गया। हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में आए तब उन्हें कुछ ही साल हुए थे।
ये उनकी लोकप्रियता का ही कमाल था कि उन दिनों एक ही फ़िल्म कई भाषाओं में बनती थी जिसमें हीरो बदल जाते थे पर हीरोइन श्रीदेवी ही रहती थी। 1983 में फ़िल्म मवाली में जितेंद्र, जयाप्रदा और श्रीदेवी थे जो तेलुगू में श्रीदेवी के साथ बनी थी और तमिल में श्रीदेवी और रजनीकांत के साथ। इसी तरह सदमा भी पहले तमिल में कमल हासन के साथ बनी और हिंदी में भी श्रीदेवी को ही रखा गया वरना आमतौर पर हीरोइन बदल दी जाती थी।
ये श्रीदेवी ही थीं जो फुफकारती नागिन बन सकती थीं, सफ़ेद चांदनी में धुली एक खुद्दार लड़की और लम्हे में प्यार की परिभाषा को चुनौती देने वाली पूजा। या मिस्टर इंडिया की खोजी पत्रकार जो ज़रूरत पड़ने पर कैबरे भी कर सकती थीं, चालबाज़ में ज़बरदस्त कॉमेडी या फिर इंग्लिश-विंग्लिश की एक माँ और पत्नी जो कुछ ठिठके और हिचकते हुए कदमों से घर की दहलीज़ से निकलकर कुछ कर गुज़रने वाली गृहिणी या दिल को झकझोर देने वाली सदमा की वो लड़की...
इस साल श्रीदेवी सदमा की 35वीं सालगिराह मना रही होतीं, रजनीकांत के साथ तमिल-कन्नड़ फ़िल्म प्रिया के 40 साल, अपनी शादी की 22वीं वर्षगाँठ मना रही होतीं... और अपनी बेटी जाह्नवी की पहली फ़िल्म धड़क देखतीं। अगर श्रीदेवी ज़िंदा होती तो...