टुनटुन का पूरा नाम उमा देवी खत्री था। टुनटुन ने अपनी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे लेकिन इसके बाद उन्होंने अपने दम पर अपना नाम और पहचान बनाई। टुनटुन की उम्र काफी कम थी, जब उनके माता-पिता की हत्या कर दी गई थी। उनका एक बड़ा भाई था लेकिन उसका भी बाद में निधन हो गया था। इसके बाद टुनटुन अपने रिश्तेदारों की जिम्मेदारी पर आ गई थीं। जो उनसे नौकरानी की तरह काम कराते थे और फिर दो वक्त की रोटी देते थे।
टुनटुन को बचपन से ही गाना गाने का बहुत शौक था। वो अक्सर रेडियो से गाने सुनकर उसका रियाज किया करती थीं। टुनटुन की बचपन से ही तमन्ना थी कि मुंबई जाकर गायकी में अपना करियर बनाएं, लेकिन उस दौर में लड़कियों का पढ़ाई करना तक मुश्किल था, तो गायिका बनना तो दूर की बात थी। लेकिन उनकी किस्मत में तो बॉलीवुड के पर्दे पर चमकना लिखा था।
एक दिन उनकी एक सहेली उनके गांव गई थी, जो मुंबई में कई फिल्मवालों को जानती थी। उसके साथ टुनटुन मुंबई चली आईं। मुंबई आकर उन्होंने संगीतकार नौशाद के दरवाजे पर दस्तक दी। नौशाद के सामने वो जिद पर अड़ गईं कि अगर उन्हें गाने का मौका नहीं मिला, तो वो उनके बंगले से समुद्र में कूद जाएंगीं। नौशाद साहब ने टुनटुन का छोटा सा ऑडिशन लिया और उनकी आवाज से प्रभावित होकर उन्हें तुरंत काम दे दिया।
'अफसाना लिख रही हूं दिल-ए-बेक़रार का' ये गाना आज भी लोगों की जुबां पर अक्सर सुनने को मिल जाता है, लेकिन बेहद कम लोग ही जानते हैं कि इस खूबसूरत गाने की पीछे आवाज गायिका उमा देवी उर्फ टुनटुन की है। टुनटुन का करियर बतौर गायिका ठीक चल रहा था, लेकिन उस दौर में कई नई गायिकाएं फिल्मी दुनिया में आने लगी थीं। टुनटुन को गाने मिलने कम हो गए, तो नौशाद साहब ने उन्हें सुझाव दिया कि तुम फिल्मों में एक्टिंग क्यों नहीं करती? टुनटुन फिल्मों में आने के लिए फौरन तैयार तो हो गईं। लेकिन इसके लिए उन्होंने एक शर्त भी रख दी थी।
टुनटुन ने कहा अगर दिलीप कुमार के साथ फिल्म होगी तभी एक्टिंग करूंगी। नौशाद उनकी बात सुनकर हंस पड़े। लेकिन 1950 में टुनटुन की ये तमन्ना पूरी हुई और फिल्म बाबुल में दिलीप कुमार के साथ काम करने का मौका मिला। फिर क्या था टुनटुन ने अपनी एक्टिंग का जलवा भी पर्दे पर बिखेरा और उन्होंने ऐसा कमाल किया कि वो भारत की पहली महिला कॉमेडियन बन गईं। उस दौर की फिल्मों में खासतौर पर उनके लिए रोल लिखे जाते थे।
उस दौर के जो भी बड़े कलाकार थे टुनटुन ने सभी के साथ काम किया और अपने पांच दशक के करियर में टुनटुन ने करीब 200 फिल्मों में काम किया। 90 का दशक आते-आते उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली। और फिर 24 नवंबर, 2003 को टुनटुन इस दुनिया को अलविदा कह गईं।