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बासु चटर्जी ने निभाई असली दोस्ती, योगेश के जाने के बाद खुद भी कहा दुनिया को अलविदा

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बासु चटर्जी - फोटो : Social Media
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हिंदी सिनेमा को अमिताभ बच्चन के पहले और अमिताभ बच्चन के बाद के सिनेमा में बांटकर पढ़ने वालों के लिए हमेशा एक बुकमार्क का काम करने वाले बासु चटर्जी चले गए। पता नहीं उनके साथी योगेश ऊपर बैठे उन्हें बुला रहे थे या फिर वह सौ से पहले जानबूझकर हिट विकेट हुए, समय जैसा सबसे बड़ा कमेंटेटर ही बता सकता है। योगेश को गए हफ्ता भी नहीं बीता है और पीछे पीछे उनके दोस्त बासु दा भी चल दिए। रात में सोते हुए। सुबह आंख देर तक न खुली तो पता चला कि ये तो हमेशा के लिए सो गए।

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राजेंद्र यादव के उपन्यास सारा आकाश पर अपनी पहली फिल्म बनाने वाले बासु चटर्जी ने सिनेमा और साहित्य का एक ऐसा पुल बनाया जिस पर होकर उस दौर की तमाम हिट फिल्में गुजरी। जमाना जब सलीम जावेद के एंग्री यंग मैन पर तालियां बजा रहा था, उन्होंने चुपचाप मराठी सिनेमा का एक गुमनाम सा अभिनेता निकाला और उसे पूरे देश का चितचोर बना दिया। बासु चटर्जी ने कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण के 'कॉमन मैन को अपने सिनेमा का हीरो बनाया।

बासु चटर्जी - फोटो : Social Media
ये चितचोर बासु चटर्जी ने सुबोध घोष की एक बंगाली कहानी के भद्रलोक से चुना। राजेंद्र यादव और सुबोध घोष के बीच एक और फिल्म उन्होंने मनु भंडारी की कहानी यही सच है पर भी बनाई, रजनीगंधा। रजनीगंधा, छोटी सी बात और चितचोर इसी क्रम में बनीं इन तीनों फिल्मों के हीरो थे अमोल पालेकर। तीनों फिल्में सिल्वर जुबली। हिंदी सिनेमा के किसी अभिनेता के करियर की शुरूआत की लगातार तीन फिल्में सिल्वर जुबली होने का ये ऐसा रिकॉर्ड है, जो अब तक नहीं टूटा है।

रजनीगांधा के टाइटल गाने के अलावा इनमें एक और गाना है, कई बार यूं भी देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोड़ने लगता है। मुकेश और लता मंगेशकर ने इन गानों को कालजयी जरूर बनाया। इनके गीतकार योगेश को भी इन गीतों ने जमाने भर में रातोंरात मशहूर कर दिया लेकिन असल जीत इस गाने में हैं एक आम आदमी की। और, उस आदमी के मन की बात को जितने सरल ढंग से योगेश ने लिखा, उस सहजता के पोषक अपनी सारी फिल्मों में शुरू से रहे बासु चटर्जी।

बासु चटर्जी - फोटो : Social Media
बासु चटर्जी ने अपने उस्ताद बासु भट्टाचार्य से फिल्म तीसरी कसम की मेकिंग के दौरान यही सीखा। हमने हमराही ऋषिकेष मुखर्जी के साथ मिलकर उन्होंने सिनेमा की सादगी को सलाम किया और मसाला फिल्मों के ठीक विपरीत एक अलग पौध सिनेमा की उन्होंने लगाई। ये वही पौध है जिसकी बगिया को इन दिनों आयुष्मान खुराना रोशन कर रहे हैं।

90 साल की उम्र में दुनिया को सुबकता छोड़ गए बासु चटर्जी का सिनेमा ठहाके मारकर हंसाता नहीं है। वह गुदगुदाता है और होठों को 180 अंश की रेखा में सीधा करके चेहरे पर एक मुस्कान छोड़ जाता है। सुपरस्टार भी उस जमाने के जब आर्कलाइट्स की चकाचौंध से उबते तो उनके छाते के नीचे ठंडी हवा लेने चले आते। अमिताभ बच्चन को उन्होंने मंजिल में एक अलग अंदाज में पेश किया। यहां भी उनके दोस्त योगेश ने एक गाना लिखा, रिमझिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन।
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बासु चटर्जी - फोटो : Social Media
राजेश खन्ना ने सिनेमा समझने के लिए उनके सिनेमा का चक्रव्यूह समझा। देव आनंद ने मन पसंद में खुद को नया किया और मिथुन चक्रवर्ती जैसा डिस्को डांसर भी अपने इस गुरु का शौकीन रहा। पसंद अपनी अपनी है, लेकिन, जब भी अमिताभ बच्चन के बाद के सिनेमा का जिक्र होगा तो एक सिनेकार अपना एक अलग मिडिल क्लास झंडा लिए अलग तंबू ताने नजर आएगा। यहां एक रुका हुआ फैसला भी होगा और यहां कमला की मौत भी होगी।

बासु चटर्जी ने फिल्मों में तो बहुत हल्की फुल्की फिल्में बनाईं लेकिन इस देश ने स्त्री सशक्तीकरण पर जो कुछ पहली बार परदे पर रजनी सीरियल के तौर पर देखा वह भी बासु चटर्जी के मध्यमवर्गीय सिनेमा का विस्तार ही तो है। और, इसी विस्तार का एक अलग चरम रहा टीवी सीरियल ब्योमकेश बक्शी, जिसका पुनर्प्रसारण दूरदर्शन ने लॉकडाउन के दौरान किया।

पढ़ें: बासु चटर्जी के निधन पर पीएम मोदी ने भी जताया दुख, कहा- 'उनके काम ने लोगों के दिलों को छुआ'
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