बहस और चर्चा के बाद मिली सेंसर से मंजूरी
निर्माता ने आगे बताया कि उनकी फिल्म को सेंसर बोर्ड ने विस्तृत बहस और चर्चा के बाद मंजूरी दी है। जब मैं सेंसर बोर्ड से मिला, तो कई बहसें हुईं, जो मुझे बहुत महत्वपूर्ण लगीं। पैनल में 30 वर्ष की आयु के युवा सदस्य और 70-75 वर्ष की आयु के वरिष्ठ सदस्य दोनों शामिल थे। शुरू में कुछ लोगों को लगा कि फिल्म साधु-संतों की आलोचना करती है। लेकिन वे समझ गए कि यह समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि समाज के कुछ हिस्सों में मौजूद शोषणकारी प्रथाओं को दिखाती है।
ओटीटी अब सेफ खेलता है
सुदीप्तो सेन ने संवेदनशील विषयों से निपटने में ओटीटी प्लेटफॉर्म के दृष्टिकोण पर भी बात की। उन्होंने कहा कि राजनीतिक या कमर्शियल सक्सेस के दबाव के बजाय कहानी पर ध्यान देना चाहिए। मुझे लगता है कि ओटीटी अब सेफ खेल खेल रहा है। अगर कोई धार्मिक या सामाजिक मुद्दा आता है, तो वे उससे बचते हैं। चाहे वह पॉजिटिव हो या नेगेटिव। मैं बचपन से ही लोगों के दर्द के बारे में बात करता आया हूं। हमें हमेशा सच्चाई के साथ रहना चाहिए। चाहे कुछ भी हो जाए, सच्चाई की जीत होगी।