पहाड़गंज की शीला टाकीज खुद में कई दिलचस्प किस्से समेटे हुए है। शीला टाकीज को 50 साल हो गए हैं और इन पचास सालों में वह कई तरह के अनुभवों से गुजरी है।
इस टाकीज में 50 साल नौकरी करने वाले विजयानंद चंदोला बता रहे हैं अपनी और शीला की कहानी जो अलग-अलग होते हुए भी एक-दूजे से गुथी हुई है।
दिल्ली की शीला टाकीज में विजयानंद चंदोला ने अपने पचास साल गुजारे। शीला टाकीज ही उनकी जिंदगी बन गयी। एक बार वह यहां आए तो फिर कहीं गए ही नहीं। पहली नौकरी शीला में ही मिली।
यही उनकी आखिरी नौकरी भी रही। शुरू में काम दरवाजे पर टिकट चेक करने का मिला। टाकीज की तरफ से एक टार्च और एक रंगीन पोशाक भी मिली।
विजयानंद इस सिनेमाहॉल से जुड़े कई किस्सों के गवाह बने। यहीं उन्होंने 'मुगल- ए- आजम' के आदमकद पोस्टर चिपकाए। यहीं रोमांटिक हीरो राजेश खन्ना की फिल्मों में लोगों का रैला देखा।
टिकट लेने के लिए लोगों की धक्का-मुक्की देखी। कई बार दर्शकों को शो से पहले अंदर घुसने से रोकने के लिए जोर-आजमाइश भी करनी पड़ती।
इंदिरा गांधी ने भी देखी फिल्म
विजयानंद बताते हैं कि हाउसफुल के शो में किसी को टिकट न मिलता तो मुझे दुख होता। हम भी आखिर क्या करते।
आखिर एक दो टिकट की व्यवस्था कर भी दें, पर पांच सात लड़कियां एक साथ टिकट मांगे तो क्या करें। लेकिन अच्छी फिल्मों में ऐसा कई बार होता।
वह शीला के अच्छे दिन थे। फिल्म देखकर निकले दर्शक चहक- चहक पर पूछते कि भई फला फिल्म कब ला रहे हो। हम भी पूरे ठसक में रहते। एकदम नहीं बताते। ठसक हो भी क्यों न। आम आदमी तो छोड़िए खास भी शीला में सिनेमा देखने आते।
खुद इंदिरा गांधी ने संजय गांधी के साथ बालकनी में बैठकर फिल्म देखी थी। वो दिन हमारे लिए खास था। हमें बताया गया था कि कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति आने वाला है।
ऊपर बालकनी पूरी खाली करा दी गई। कुछ समय बाद इंदिरा जी को सिनेमा हाल में आते देखा। बहुत तेज कदमों से आईं। और फिर सीधे उन्हें बालकनी में ले जाया गया।
सिनेमा के पुराने दिनों की बातें करते हुए विजयानंद की आंखें चमक उठती हैं। इस सवाल पर कि पचास साल एक ही जगह गुजार दिए।
कहीं और जाने का मन नहीं हुआ? वह कहने हैं कि जब मन यहीं लग गया तो फिर कहां जाते और क्यों जाते। मालिक ने भी बेटे की तरह प्यार दिया।
दर्शक हमसे पूछते कलाकारों का पता
वह बताते हैं कि शुरू में वह भी खूब सिनेमा देखते थे। टिकट काटने का काम जैसे खत्म होता वह भी हॉल के अंदर घुस जाते। लेकिन बाद में सिनेमा देखना कम हो गया। कोई खास फिल्म आती तो फिर देख लेते।
उन दिनों तो रुतबा ऐसा था कि कुछ लोग तो हमसे उनके पसंद के फिल्म सितारों से मिलाने की बात इस तरह कहते कि जैसे उन सितारों से हमारा निजी दोस्ताना हो। मूड होता तो हम भी कभी-कभार आगे बढ़कर दो चार बातें हांक देते।
विजयानंद के मन में आज भी पोस्टरों की यादें ताजा हैं। रात को मैदा-आटा की लेई तैयार होती थी। सुबह सुबह बड़े बैनरों में पोस्टर लगते।
लोग बड़ी दिलचस्पी लेकर पोस्टर देखते। तब कलाकार को देखने का और तो कोई माध्यम था नहीं इसलिए ये पोस्टर दुर्लभ जान पड़ते।
इस तरह होती शो की तैयारी
फिल्म बदलने का किस्सा भी मजेदार होता। आठ बजे के आसपास रिक्शे को तैयार करते। उसमें पोस्टर लगाते। एक लड़का माइक लेकर शहर के इलाकों में घूमता।
आज से देखिए एक फूल दो माली। चार शो, बारह, तीन, नौ और रात बारह बजे। देखना ना भूलिए। जब तक वह चक्कर लगाकर आता, इधर पहले शो की तैयारी हो जाती। यानी बारह वाला शो।
अस्सी साल के हो चुके विजयानंद कहते हैं कि शीला ने मुझे जिंदगी दी, मेरे बच्चों को भविष्य दिया। मैं अपनी खुशकिस्मती मानता हूं कि लोगों का मनोरंजन करते-करते मेरा जीवन भी कट गया। शुरुआत टिकट चेक करने से हुई और निकले हॉल के मैनेजर बनकर।
शीला के मैनजमेंट ने मुझे मेरी सेवाओं के लिए एक प्रतीक यादगार में दिया है, उसे बैठक में लगाया है। कई बार मन करता है बस यूं ही वहां तक शीला तक घूमफिर आएं पर शरीर है कि इसकी इजाजद ही नहीं देता।