फ्लैशबैक के किस्से में हम आपको मीनाकुमारी की कहानी बता रहे हैं। उनकी और अशोक कुमार की।
जिन दिनों मीनाकुमारी ने अपने शौहर कमाल अमरोही के पाली हिल स्थित आवास रेम्ब्रां से अंतिम विदा लेकर सेठ जमनालाल बजाज की ऐतिहासिक शरणस्थली जानकी कुटीर में पदार्पण किया था, उन दिनों मैं भी वहां स्थित एक दूसरी झोपड़ी में अपने मित्र शशि लखनपाल के साथ रह रहा था।
हम लोगों के झोपड़े बिलकुल आसपास थे और और कहां पर कब और कौन आ-जा रहा है, देखना आसान था। एक शाम जब मैंने पाया कि अशोक कुमार मीना की कुटिया की ओर जा रहे हैं, तो मैं भी उनके पीछे लग लिया। दादामुनि को होम्योपैथिक चिकित्सा का भी व्यापक ज्ञान था।
उन्होंने बताया भी, `मीना को मैं एक को-स्टार के रूप में नहीं बल्कि एक डॉक्टर के रूप में देखने जा रहा हूं।’ सुना है कि वह बेहद बीमार हैं और उनको नियमित दवा-दारू की सख्त जरूरत है। मीना ने बड़े फीके मुखडे़ से हम लोगों का इस्तकबाल किया था।
अंधाधुंध मदिरा सेवन करने की वजह से उनका जिगर बेकारी के आलम तक पहुंच चुका था। दादामुनि ने उनका पूरा मुआयना किया और उनके मन-मस्तिष्क में यह बात डालने की कोशिश की कि जब तक वह अपने इस ढर्रे पर लगाम नहीं लगातीं, तब तक खुदा भी उनकी कोई मदद नहीं कर सकता।
अशोक कुमार की नसीहत को दिल से लगाते हुए मीना बोलीं, `कौन कम्बख्त ठीक होने का तलबगार है, दादामुनि? मैं तो जितना जल्दी हो सके इस दुनिया को अलविदा कर देना चाहती हूं।’
मीना कुमारी के पास दूर के रिश्ते की बुवा भी बैठी हुई थी। उनके मुंह से निकला, `अल्लाह भी कैसी दर्दनाक कहानियां बनाया करता है!’ `अल्लाह को इन मामलों में न लपेटो, फूफी। अपनी कहानियां तो हम इंसान खुद लिखते हैं, सिर्फ उसका सिनेरियो अल्लाह तैयार करता है।’ बोली थीं मीना।