फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अगर उस 'आर्क रॉयल' से न जाते अब्रार तो आज हमारे बीच होते गुरुदत्त

Fri, 18 Mar 2016 06:22 PM IST
जनार्दन पांडेय, अमर उजाला, दिल्ली

सार

  • हर फोन संवाद के बाद गुरुदत्त के चेहरे की शिकन क्रोध में बदल रही थी। गीता ने बिटिया के गुरुदत्त से मिलने पर रोक लगा दी थी।
  • उस रात अब्रार आल्वी के आर्क रॉयल से जाने के बाद क्या-क्या हुआ यह बहुत ही कम लोगों को मालूम है। 
  • यह देखते ही अब्रार के मुंह से निकला, "आह! मृत्यु नहीं आत्महत्या!! इन्होंने अपने आपको मार डाला।"
विज्ञापन
गुरुदत्त (1925-1964)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

आज भी मानते हैं हिन्दी सिनेमा में गुरुदत्त जैसा रचानात्मक व्यक्ति दूसरा नहीं हुआ। विडंबना यह कि महज 39 साल की उम्र में इतने सृजनशील व्यक्ति ने खुद को मौत की नींद सुला दिया। क्या वजहें रहीं, क्यों गुरुदत्त ने आत्महत्या कर ली। उस दिन क्या हुआ था, उस रात क्या हुआ था, जिसकी अगली सुबह वो जागे नहीं?
विज्ञापन


इन सारे सवालों का जवाब देते हैं गुरुदत्त के सबसे दिलअजीज दोस्त और उनकी ज्यादातर ‌फिल्मों के लेखक अब्रार आल्वी। 'टेन ईयर्स विद गुरुदत्त' नाम की किताब में उन्होंने उस दौर की पूरी कहानी खोलकर रख दी है।

गुरुदत्त कौन थे? उनके काम करने अंदाज क्या था? उनकी कालजयी फिल्मों की पृष्ठभूमि क्या थी? पत्नी गीता दत्त से उनके रिश्ते कैसे और क्यों बिगड़े? वहीदा रहमान उनकी जिंदगी में कैसे आईं और उसका क्या असर हुआ?
विज्ञापन


इन सभी सवालों के जवाब हम किताब के माध्यम से आपके सामने बारी-बारी लाएंगे। इस श्रृंखला में आज हम उस शाम और रात की कहानी बयां करेंगे, जिसने हिन्दी सिनेमा से उसकी जान छीन ली।

उस रात के बारे में अब्रार आल्वी के अनुभवों पर आधारित किताब 'टेन ईयर्स विद गुरुदत्त' के मुताबिक, फिल्म 'बहारें फिर भी आएंगी' में नायिका के अंतिम क्षण अत्यन्त बेचैन व दर्द भरे हैं। अपनों से चोटिल, जीवन से हताश, अंततः दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो जाती है।

कहते हैं, कोई भी लेखक, अपनी लेखनी से वर्णित किसी भी दृश्य को लिखने से पहले उसे स्वयं जीने का प्रयत्न करता है पर अगर चित्रण मृत्यु का होतो फिर चुनौती गंभीर हो जाती है। आखिर, किस लेखक ने स्वंय मृत्यु पीड़ा भोगी है! पर शायद त्रासदियों से ओत-प्रोत बेचैनियां ही लेखक की आत्मा को  सींचती हैं और उसकी लेखनी में स्याही का काम करते हुए उसे लिखने को प्रोत्साहित करती है।

9 अक्तूबर 1964 की शाम, आर्क रॉयल की बैठक में कुछ ऐसी ही बेचैनी का वातावरण था। अब्रार आल्वी की लेखनी, हृदय और मस्तिष्क का त्रिकोण 'बहारें फिर भी आएंगी' की नायिका का मृत्यु चित्रण करने को जूझ रहा था।

ऑर्क रॉयल, गुरुदत्त का मुंबई में पेड्डर रोड स्थित बंगला हुआ करता था और अब्रार आल्वी उनके एक दशक पुराने सहकर्मी और अभिन्न मित्र। एक तो सीन लिखने का कठिन कार्य और ऊपर से गुरुदत्त का बेचैन मिजाज, उलझनें बढ़ती जा रही थीं।

'साढ़े पांच बजे से शराब पी रहे हैं'

गुरुदत्त (1925-1964)
उस रात के बारे में अब्रार आल्वी बताते हैं, "उन दिनों मैं लेख टंडन और गुरुदत्त, दोनों के लिए काम कर रहा था। लेख टंडन की सारी रचनाएं नेपियन्सी रोड पर स्थित उनके बंगले में हुआ करती ‌थीं। नेपियन्सी रोड और पेड्डर रोड पास ही थे। गुरुदत्त के साथ मेरे अनुबंध के अनुसार मुझे उनकी फिल्मों की रचानाएं आर्क रॉयल में ही करनी थीं। मेरी दिनचर्या कुछ ऐसी कि मैं हर शाम लेख टंडन का काम निपटा, आर्क रॉयल आ जाता था, गुरुदत्त नटराज स्टूडियोज से अपना दिन भर का कार्य समाप्त कर शाम को जब अपने घर आर्क रॉयल लौटते तो हम यत्र-तत्र सर्वत्र की बातों के साथ अपनी फिल्मों की कथाकारी में जुट जाते।"

वह आगे बताते हैं, "हमेशा की तरह उस दिन भी मैं आर्क रॉयल आया। करीब सात बज चुके थे। उस शाम का माहौल और दिनों से अलग दिख रहा था। मैंने देखा कि गुरुदत्त शराब के आलम डूबे थे। उनके चेहरे पर अवसाद और खिन्नता दोनों साफ नजर आ रही थी। शराब का सिलसिला कब से चल रहा था यह अनुमान लगाना कठिन था पर इतना अवश्य था कि उनकी उदासीनता ने वातावरण कुछ अजीब सा बना दिया था। मैंने उसके विश्वनीय सहायक रतन से पूछा कि माजरा क्या था? रतन ने बताया 'साढ़े पांच बजे से शराब पी रहे हैं' मैंने एक विनोद भरी चुटकी लेते हुए गरु दत्त से पूछा 'क्या कष्ट है मित्र'? उनके अधखिले होठों की वो आकर्षक मुस्कान इस बार तटस्‍थ रही, जो ना कुछ बता और ना ही कुछ छुपा पाई। वह मौन रहे पर हां, एक पेग शराब और उड़ेल ली।"

'आज अगर मैंने बिटिया का मुंह न देखा तो तुम मेरा पार्थ‌िव शरीर देखोगी'

गुरुदत्त (1925-1964)
जैसे-जैसे वो रात चढ़ती गई शराब और नशा गहराता गया। अब्रार बताते हैं, "मेरे और गुरुदत्त के एक पुराने मित्र श्री गोले, जो कि इनकम टैक्स ऑफिसर हुआ करते थे, वह भी आ पहुंचे। हमने कुछ देर इधर-उधर की बातें की। फिर मैं अपने 'मृत्यु चित्रण' सीन पर लौट गया। गोले, गुरुदत्त की मदिरा मंडली में शामिल हो गए और पीने पिलाने का सिलसिला चलता रहा। गोले और गरु दत्त, दोनों बीच-बीच में आर्क रॉयल से निकल कर नीचे स्थित डिस्ट्रिब्यूटरों के घर चले जाते। शायद किसी से फोन पर बातें करने। मदिरापान की निरंतरता वहां भी भंग नहीं होती, बस संगति बदल जाती। आर्क रॉयल वापस आकर शराब का सिलसिला जारी रहता।"

अब्रार कहते हैं, "उधर दूसरी ओर मेरी लेखनी 'मृत्यु चित्रण' में उलझती जा रही थी। 'मुझे देर होगी आप लोग भोजन कर लें' मैंने आग्रह किया पर गुरुदत्त ने कहा, 'सब साथ खाएंगे' वो फिर बेचैन अवस्‍था में उठकर फोन करने चले गए।"

अब्रार के अनुसार, "गुरुदत्त और उनकी पत्नी गीता दत्त के बीच पिछले कई दिनों से अनबन चल रही थी। गीता अलग रहती थीं। शायद उन दोनों के बीच फोन पर तू-तू, मैं-मैं का निरंतर सिलसिला चल रहा ‌था, ऐसा लगा रहा था कि गुरुदत्त अपना आपा खो रहे थे। हर फोन संवाद के बाद गुरुदत्त के चेहरे की शिकन क्रोध में बदल रही थी। गीता ने बिटिया के गुरुदत्त से मिलने पर रोक लगा दी थी। गुरुदत्त के सब्र का बांध अब टूट रहा था। कहते हैं क्रोध किसी भी मनुष्य के विवेक को निगलने की क्षमता रखता है। फोन पर तर्क वितर्क के सिलसिले के बीच, गुरुदत्त ने गीता को आखिरी चेतावनी दे डाली, 'आज अगर मैंने बिटिया का मुंह न देखा तो तुम मेरा पार्थ‌िव शरीर देखोगी'।"

उस रात गुरुदत्त खाने पर बैठे तो जरूर पर खाया कुछ नहीं

गुरुदत्त (1925-1964)
अब्रार आगे बताते हैं, "गीता को आखिरी चेतावनी देने के बाद वो फिर अपने आप में संकुचित हो गए और थोड़ी देर पहले राज कपूर को किए फोन के औचित्य पर अमल करने लगे। कहने लगे, 'इस नशे की हालत में मुझे उन्हें फोन नहीं करना चाहिए था। इतनी घनिष्ठता तो नहीं है मेरी उनसे कि मैं उन्हें इस अनौपचारिक तरीके से न्यौता दूं! कहीं वो गलत न समझ गए हों! गुरुदत्त ग्लानिपूर्वक बड़बड़ा रहे थे।"

वह कहते हैं, "उधर गोले संध्या पर पूर्ण विराम लगाने के लिए आतुर थे क्योंकि उन्हें घर जा कर दूसरे दिन प्रातः वापस काम पर आना था। उन्होंने दत्त के आत्मचिंतन को भंग किया और बोले 'मुझे कल काम पर आना है। अब भोजन कर लेते हैं।' पर दत्त ने शायद ठान ली थी कि वो तब तक भोजन नहीं करेंगे जब तक कि मेरा 'मृत्यु चित्रण' समाप्त न हो जाए। गोले को अकेले ही खाना पड़ा और वो अपने संध्या का उपसंहार करते हुए घर लौट गए। आधी रात हो ची थी। मैंने अपने सीन खत्म किया। रात के करीब एक बजे हम भोजन करने की तैयारी में लग गए।"

लेकिन गुरुदत्त के नशे के बारे में अब्रार का कहना है, "गुरुदत्त, मेरी तरह कितना भी नशा कर लें, नियंत्रण नहीं खोते थे। उन्होंने एक पेग और पीने की चाह रखी। परिणाम निवालों के साथ अन्याय। वह मेरे साथ खाने पर बैठे तो जरूर पर खाया कुछ नहीं। लेकिन मैं थका हारा प्राणी जो सामने था, चट कर गया।"

बहुत ही कम लोगों को मालूम है इसके बाद क्या हुआ?

गुरुदत्त (1925-1964)
खाने के वाकये के बाद के बारे में अब्रार बताते हैं, "खाने के वक्त गुरुदत्त से वार्तालाप केवल 'हां'-'ना' के इर्द-गिर्द घूमता रहा। खैर, रात एक बजे ये सिलसिला समाप्त हुआ। मेरा उनसे बात करने का हर प्रयत्न असफल रहा। उन्होंने अंततः नम्रता से कह ही डाला, 'मुझे अब सोने दो', 'पर मेरा लेखन! सीन नहीं देखेंगे आप?' अक्सर लेखन खत्म होने के बाद गुरुदत्त मुझसे उसका विवरण लेते थे पर उस दिन उन्होंने मना कर दिया। 'रतन को दे दो' कहते हुए वो अपने कक्ष में लगे गए।"

अब्रार बताते हैं, "मैंने उस दिन का अपना लेखन दत्त के कथनानुसार रतन को सौंप दिया। 'मैं आज नेपियन्सी रोड में रात बिताऊंगा लेख टंडन के घर। याद रहे, उन्हें अब और मत पीने देना' रतन से कहते हुए मैं आर्क रॉयल से विदा ले ली। गुरुदत्त के साथ बिताए हुए वो मेरे अंतिम क्षण साबित हुए।

उस रात अब्रार आल्वी के आर्क रॉयल से जाने के बाद क्या-क्या हुआ यह बहुत ही कम लोगों को मालूम है। अब्रार को दत्त के त्रासदी भरे अंतिम क्षणों की जानकरी रतन से मिली, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इसके आगे की कहानी त्रासदी भरी है।
विज्ञापन

इसके आगे की कहानी त्रासदी भरी है

गुरुदत्त (1925-1964)
अब्रार के मुताबिक, "उस रात गुरुदत्त ने 3 बजे सुबह नींद से उठते ही पूछा, 'अब्रार कहा है? 'अब्रार अपने रात का लेखन मुझे सौंप कर चले गए। बुलाऊं क्या?' रतन ने पूछा'। 'रहने दो, हां मुझे एक बोतल व्हिस्की दे दो?' 'अब व्हिस्की नहीं है' रतन ने कहा। पर वो कहां मानने वाले थे। उन्हें पता था बोलत कहां रखी हुई है। बोलत उठाई और अपना कमरा बंद कर लिया।"

फिल्मफेयर में छपी एक रिपोर्ट ने नर्गिस दत्त के हवाले से बताया कि गुरुदत्त की पत्नी गीता दत्त उस रात बहुत बेचैन हो गई थीं। वह रात 11 बजे दत्त से मिलने को आतुर हुई थीं पर उनकी मां को उनके अकेले जाने पर ऐतराज था। फिल्मफेयर की खबर के मुताबिक सुबह 8:30 बज दत्त के व्यक्तिगत डॉक्टर भी उनके घर पहुंचे पर उन्हें सोता समझ कर लौट गए।

इस दौरान गीता दत्त लगातार फोन करती रहीं। रतन उन्हें दत्त के देर रात तक जगने का हवाला देकर अधिक देर तक सोने की बातें करता  रहा। लेकिन तब तक गीता को किसी आसामन्यता का आभास हो गया था। उन्होंने 11 बजे रतन को दरवाजा तोड़ने को कहा। दरवाजा टूटने पर रतन ने पाया कि दत्त अपने बिस्तर पर सो रहे थे। गीता ने जगाने को कहा, डॉक्टर को फोन कर के वहां पहुंचने को कहा, लेकिन तब तक गुरुदत्त 'चिरनिद्रा' में सो चुके थे। डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

अब्रार बताते हैं कि घटना की जानकारी पर जब वो आर्क रॉयल पहुंचे तो उन्होंने देखा, "गुरुदत्त अपने कुर्ते पायजामे में शालीनाता से लेटे हुए थे। बिस्तर के बगल में एक छोटी सी शीशी में गुलाबी रंग का तरल पदार्थ था।"

यह देखते ही अब्रार के मुंह से निकला, "आह! मृत्यु नहीं आत्महत्या!! इन्होंने अपने आपको मार डाला।" अब्रार के मुताबिक पहले भी गुरुदत्त ने उनसे आत्महत्या की क्रियाविध पर चर्चा की थी। तब उन्होंने सोनारिल टैबलेट खाई थी। लेकिन इस बार उन्होंने कुछ और ही खाया था।

(किताब 'टेन ईयर्स विद गुरुदत्त', लेखिकाः सत्या सरन)
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें