माजिद मजीदी विश्व सिनेमा में अलग पहचान रखते हैं। वे हिंदी में फिल्म लेकर आए हैं, 'बियॉन्ड द क्लाउड्स'। माजिद मजीदी से उनके सिनेमा, नई फिल्म तकनीक और सिनेमा के भविष्य को लेकर अमर उजाला की विशेष बातचीत...
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आपकी फिल्मों के केंद्र में अक्सर बच्चे होते हैं। कोई खास वजह?
मैं जब बड़ा, जवान हो रहा था, तब मेरे सामने जो हालात थे, उन्होंने मुझ पर बहुत असर डाला। वो कंधे पर बोझ की तरह हैं। जब मैं बड़ा हो गया हूं, तो मुझे लगता है कि जो-जो देखा, महसूस किया था, उसे उजागर करूं। बचपन ने मेरे दिमाग में बहुत नक्श छोड़े हैं। वो मुझे पीछे देखने को मजबूर करते हैं। मुझे लगता है कि फिल्म के हीरो बड़े हों या बच्चे, उनके भीतर भावनाएं होनी चाहिए।
आज दुनिया हाईटेक है और बचपन उससे प्रभावित है। बच्चे स्मार्ट हैं और किशोरों के अपराधों का ग्राफ बढ़ रहा है। 'बियॉन्ड द क्लाउड्स' का किशोर नायक भी अपराध की दुनिया में है। क्या बचपन पहले जैसा मासूम रह गया है?
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बच्चे बड़े या जवान होते हैं, तो उनकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। वे फिर कुछ भी कर सकते हैं। लेकिन मैं एक बात कहूंगा कि ये बच्चे/किशोर भले ही आरोपी या अपराधी हो जाएं, वे अपने जुर्म में भी खोए हुए बचपन की कोई चीज तलाश रहे होते हैं। मैंने 'बियॉन्ड द क्लाउड्स' में भी यही दिखाया है।
ईरान में रहते हुए हिंदुस्तान की किस बात ने आपको प्रभावित किया। कब यहां के प्रति आकर्षित हुए?
जब मेरा परिचय सत्यजित राय की फिल्मों से हुआ। उनकी फिल्मों ने हिंदुस्तान को मेरे सामने खुली किताब की तरह रख दिया। उनकी फिल्मों ने मेरे दिमाग पर गहरा असर छोड़ा। उनकी 'पाथेर पांचाली' मैं चालीस-पचास बार देख चुका हूं और अब भी देखता हूं। इसे देखने के बाद मैं खुद से ही सवाल करता हूं कि ऐसी फिल्में कहां गई, ऐसी कहानियां कहां गई, जो भारत में हैं। ये मुझे दिखाई नहीं दे रहीं। यह मेरे लिए दर्दनाक बात है। राय साहब की फिल्में देखने के बाद मैं अक्सर भारत आता-जाता रहा। यहां के कई फिल्म महोत्सवों में शामिल रहा। तब मैंने हिंदुस्तान को देखा और मेरे अंदर हसरत जागी कि मौका मिला, तो यहां फिल्म जरूर बनाऊंगा।
भारत हो या ईरान, फिल्म बनाना महंगा माध्यम है। आपने शुरुआती बाधाओं को कैसे पार किया?
मेरे लिए भी कठिन था। मैंने जब 'चिल्ड्रन ऑफ हेवन' बनाई, तो उसे कोई वितरक खरीदने को तैयार नहीं था। मैं कई जगहों से मायूस लौटा, लेकिन इस फिल्म की सफलता ने कई दरवाजे खोल दिए।
ईरान की राजनीतिक समस्याओं से फिल्म निर्माण में क्या बाधाएं आती हैं?
ईरान हो या हिंदुस्तान, किसी भी देश की सरकार आम आदमी को पूरी आजादी नहीं देती। हर देश के नियम-कायदे हैं, आपको उनके अनुसार चलना होता है। ईरान के बारे में बाहर कुछ ज्यादा हौवा खड़ा कर दिया गया है। ईरान की सरकार फिल्मों को बढ़ावा देती है। आज ईरानी फिल्में दुनिया में घूम रही हैं। यानी वहां फिल्मों में पैसा आ रहा है। हम (ईरानी) अपनी संस्कृति को फिल्मों में पेश करते हैं और दुनिया भर में छा जाते हैं। मुझे हिंदुस्तानी सिनेमा से यही शिकायत है कि इससे जो चीजें बाहर जाती हैं, वह यहां का कल्चर नहीं, बल्कि कुछ और है। और वह है, सिर्फ मनोरंजन। यहां की असली खूबसूरती, संस्कृति और कला को हिंदुस्तानी फिल्मवाले नहीं ले जा पाते।
पश्चिम में सिनेमा को डिजिटल से फिर फोटोकेमिकल फिल्म पर ले जाने का अभियान चल रहा है। हॉलीवुड के मेकर क्रिस्टोफर नोलन ने पिछले दिनों मुंबई यात्रा में इस पर विस्तार से बातें की। इसे आप कैसे देखते हैं?
डिजिटल ने फिल्म मेकिंग में होने वाली परीक्षा को फीका कर दिया है। डिजिटल से इंसान के अंदर की कलाकारी खत्म हो रही है। अब लोग वीएफएक्स से सब कुछ दिखा रहे हैं। हमारे दौर में सूरज ढलने की एक शाम दिखाने के लिए हम इंतजार करते थे। मनचाहे इफेक्ट के लिए दो-दो, तीन-तीन दिन वह दृश्य शूट करते थे।
नई पीढ़ी डिजिटल कंटेंट और वीडियो गेम्स में ज्यादा रुचि ले रही है। पिछले दिनों अमिताभ बच्चन ने भी कहा कि फिल्म शब्द की चमक अब फीकी पड़ चुकी है। सिनेमा धीरे-धीरे मर रहा है?
जी हां, ये जो डिजिटल युग का सिनेमा है, इसकी मौत करीब है। किसी बच्चे को अगर कमरे में बंद करके उसे कृत्रिम पेड़ों, जानवरों और नदी के दृश्यों से शिक्षा देंगे, तो वह बंदिश में बड़ा होगा। आपको बच्चे को प्रकृति के बीच छोड़ना होगा, उसे परिंदों और पत्तों के बीच छोड़ना होगा। वह नदी में हाथ डूबोकर पानी को महसूस कर सके। डिजिटल इसी तरफ जा रहा है। यह आज के वक्त की मांग है कि लोगों को असली चीजें उनकी सच्चाई के साथ दिखाएं।