देश की मुस्लिम महिलाओं को न्याय और तरक्की की लड़ाई में हिंदी सिनेमा का सहारा नहीं मिला। सिनेमा के लंबे इतिहास में इन महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक दशा, देश-समाज के प्रति सोच फिल्मों में रेखांकित नहीं हुई। एक तो महिला और दूसरे अल्पसंख्यक समाज से होने के कारण वह दोहरे हाशिये पर रहीं। हाल में जरूर तेजी से करवट बदलते सिनेमा में लिपस्टिक अंडर माई बुर्का जैसी फिल्म आई, जिसने पुरातन सोच और कट्टरता के विरुद्ध मुस्लिम महिलाओं के संघर्ष को उभारा। परंतु सकारात्मक बातचीत से ज्यादा यह विवादों में रही।
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हिंदी फिल्मों में मर्दवादी सोच हावी रही है। ऐसे में मुस्लिम महिलाओं को अक्सर पर्दे में, बुर्के में, दरगाहों पर जाते, पान चबाते दिखाया गया। वह पारंपरिक मां-बहन के किरदारों में नजर आईं। देश की आजादी के शुरुआती दशकों में मुगल साम्राज्य और नवाबी संस्कृति पर बनी हुमायूं (1945), शाहजहां (1946), अनारकली (1953), मुगल-ए-आजम (1960), चौदहवीं का चांद (1961), ताजमहल (1963), जहांआरा (1964), मेरे महबूब (1963) और बहू बेगम (1967) जैसी फिल्मों में मुस्लिम महिलाओं के पारंपरिक-रूमानी अंदाज दिखे। बदलाव की आहटें इनमें धीमी थीं। 1960-70 में मुगल-नवाबी घरानों की नाचनेवालियों, तवायफों की कहानियां लोकप्रिय हुईं। इस दौरान दस्तक (1970) और महबूब की मेहंदी (1971) जैसी सुधारवादी फिल्में आईं मगर पाकीजा (1971) तथा उमराव जान (1982) क्लासिक बनीं।
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सत्तर के दशक में एंग्री यंग मैन के रूप में अमिताभ बच्चन के उदय से बॉलीवुड सिनेमा में नायिकाओं की स्थिति ही कमजोर हो गई। इस बीच 1982 में बी.आर. चोपड़ा की ‘निकाह’ और सागर सरहदी की ‘बाजार’ ने हलचल मचाई। मुस्लिम समाज की इन कहानियों के केंद्र में नायिकाएं थीं। समानांतर सिनेमा के दौर में मुस्लिम कथानकों की सलीम लंगड़े पर मत रो, नसीम, मम्मो, सरदारी बेगम, जख्म, फिजा और जुबैदा जैसी फिल्में बनीं मगर ये नक्कारखाने में तूती की आवाज जैसी थीं। हाल में मुस्लिम नायिकाओं वाली रांझणा (2013) और लिपस्टिक अंडरमाई बुर्का आईं। रांझणा की नायिका जहां (सोनम कपूर) साधारण मुस्लिम युवती की भूमिका में थी, वहीं निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव की लिपस्टिक अंडर माई बुर्का में रेहाना अदीबी (प्लाबिता बोरठाकुर) और शीरीन असलम (कोंकणा सेन शर्मा) की कहानियां आधुनिक मुस्लिम महिलाओं का संघर्ष बयान करती हैं।
ट्रिपल तलाक पर ‘निकाह’ रही थी बेहद चर्चित
हिंदी फिल्मों में तिहरे तलाक पर सबसे चर्चित फिल्म बी आर चोपड़ा ने बनाई थी, निकाह। 1982 में आई फिल्म में राज बब्बर, सलमा आगा और दीपक पाराशर थे। कहानी हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैदर (राज बब्बर) के साथ नीलोफर (सलमा आगा) के एकतरफा प्यार से शुरू होती है। नीलोफर का निकाह नवाब वसीम (दीपक पाराशर) से हो जाता है। उधर, हैदर कामयाब शायर और एक पत्रिका का संपादक बन जाता है। बिजनेस की व्यस्तताओं के बीच वसीम पत्नी को वक्त नहीं दे पाता और छोटी-छोटी बातों पर होने वाली नोंकझोंक के बीच एक दिन बड़ा झगड़ा होता है। वसीम तीन बार तलाक कह कर नीलोफर को तलाक दे देता है। बाद में उसे पछतावा होता है। उसे लगता है कि वह अब भी नीलोफर से प्यार करता है। उधर, नीलोफर की हैदर की पत्रिका में नौकरी लगती है और दोनों माता-पिता की मर्जी से निकाह कर लेते हैं। वसीम नीलोफर से माफी मांगते हुए खत लिखता है कि वह हैदर को तलाक देकर उससे निकाह कर ले। खत हैदर के हाथ लगता है तो वह सोचता है कि नीलोफर और वसीम अब भी एक-दूसरे को चाहते हैं। तब हैदर नीलोफर के सामने प्रस्ताव रखता है कि वह उसे तलाक दे सकता है ताकि वह वसीम से निकाह कर सके। नीलोफर इंकार करती है और सवाल उठाती है कि क्या वह उन दोनों की संपत्ति है, जो वह उसके साथ खेल रहे हैं? नीलोफर अंतत: हैदर के साथ रहती है।