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जिंदगी का हर किरदार आपको एक्टिंग करने में सहयोग देता है : सोहम शाह

Wed, 26 Dec 2018 10:21 AM IST
anand anand एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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Sohum Shah - फोटो : Tumbbad
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साल 2018 में जिन फिल्मों ने अपने कंटेंट के चलते वाह-वाही लूटी, उनमें तुम्बाड काफी खास रही है। फिल्म को ओटीटी पर रिलीज का भी काफी अच्छा रेस्पांस मिला है। फिल्म के निर्माता-अभिनेता सोहम शाह से हमने पूछे पांच सवाल।
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एक एक्टर के लिए दो चीज़ें बहुत ज़रूरी होती हैं, ऑडियंस का तारीफ करना और दूसरा जब पुरस्कार मिलता है। काफी जगह आपकी फिल्म को पुरस्कार मिले, तो आपको कैसा लगा..?

हमने तो 6-7 साल लगा दिए, मतलब लाइफ ही दे दी फिल्म को, अभी एक अवॉर्ड शो था जहां फिल्म का सात कैटेगरी में नॉमीनेशन हुआ तो कम से कम लोग नोटिस कर रहे हैं। इसे देखकर आपको हौसला आता है और लगता है कि आप सही रास्ते पर हो। मेरे पिता एक बात कहा करते थे कि मेहनत के सामने कुछ टिकता नहीं है, जब इस फिल्म को नोमिनेशन्स मिले तो मेरे मन में एक ही खयाल आया कि वह ठीक कहते थे।
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Tumbbad - फोटो : social media
बहुत कम लोग जानते हैं कि सोहम शाह राजस्थान के एक छोटे से शहर से हैं, तो क्या ऐसा किरदार करने में दिक्कत आई..??

मुझे लगता है कि हां बहुत असर पड़ता है, एक मेरे टीचर हैं एक्टिंग सिखाते हैं, वह कहते हैं कि यह एक्टर बहुत अच्छा हैं वो बहुत अच्छा, पर मुझे कहते हैं कि तुम्हारी एक खास बात है कि तुमने ज़िंदगी जी है, तो आप ऐसी जगह से आते हो कि आपने बहुत किरदार देखे होते हैं। एक एक्टर होने के लिए ऐसी चीज़े बहुत फायदा देती हैं।

हॉरर फिल्मों की बहुत लिमिटिड ऑडियंस होती है, और आज की तारीख में ऑडियंस और भी ज़्यादा लिमिटिड हो गई है, तो यह फैक्टर कहीं दिमाग में था आपके ..?

नहीं ऐसा कोई फैक्टर मेरे दिमाग में नहीं था, और मुझे आज भी नहीं लगता कि यह एक हॉरर फिल्म है, मेरे लिए तो फिल्म जब शुरु होती है, तो ऐसा लगता है कि फिल्म माइथोलोजी है, फैनटैसी होरर, ड्रामा, थ्रिलर है और ऐडवेंचर है, तो मेरा सवाल यह होता था जो भी फिल्म देख कर आता था, कि यह किस जॉनर की लगी आपको। ये ठीक है कि हमने हॉरर कह कर इसको बेचा, और मुझे नहीं लगता कि हॉरर की ऑडियंस आज की डेट में कम है, मुझे लगता है कि यह बढ़ गई है और बहुत ही फैशन में है।
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आपका मूल पेशा घर बनाना है, अब जब आप फिल्म लाइन में सफल हो गए, तो क्या हम कह सकते हैं कि कंस्ट्रक्शन लाइन ने एक अच्छे आदमी को खो दिया..?

किसी फील्ड को फर्क नहीं पड़ता कि उसने क्या खो दिया या क्या पा लिया, यह तो हर आदमी की एक जर्नी है, मैं आपको एक छोटी सी स्टोरी सुनाता हूं कि मेरे पिता जो हैं, वह तीन हज़ार रुपय महीना कमाते थे, तो 13 साल की उम्र में मैंने काम शुरु कर दिया था, साथ ही मैं पढ़ाई भी करता था, एक-एक रुपये के लिए बहुत किल्लत हुआ करती थी, क्रिकेट की बॉल के लिए वह एक रुपया भी नहीं होता था, तो वहां से एक ही सपना होता था कि पैसे पैसे पैसे, तो जब भगवान ने ठीक ठाक पैसे दे दिए, तो एक कॉंसेप्ट समझ में आया कि पैसे बस एक नंबर है कि आप गंगानगर में रहो तो यह नंबर चाहिए, जयपुर में रहो तो यह नंबर चाहिए, और मुंबई में रहो तो यह नंबर चाहिए, तो कह सकते हैं कि मेरी किस्मत अच्छी रही है। मेरे लिए एक्टिंग वो नहीं है कि बस स्टारडम। स्टारडम का मतलब होता है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग और आपका काम। मुझे नहीं पता कि किसी ने क्या खोया या क्या पाया, पर मैने बहुत कुछ पाया है।

रणवीर सिंह ने पद्मावत के बाद एक बात कही थी कि जब वह कोई हैवी कैरेक्टर करते हैं, उससे बाहर निकलने में बहुत वक्त लगता है, आपने भी एक हैवी कैरेक्टर किया है, तो क्या यह बात सही है कि वक्त लगता है बाहर निकलने में..??

मेरे लिए वो इतना नहीं हुआ क्योंकि रणवीर सिंह एक एक्टर हैं सिर्फ मेरे साथ क्या था कि मैं निर्माता भी था फिल्म का तो एक्टिंग के साथ मेरा काम खत्म नहीं हो गया था और मैं एक स्थापित निर्माता नहीं था तो मेरे लिए बड़ी मुश्किल थी फिल्म को पूरा करना, तो जब आपका दिमाग एक जगह लगा होता है, दूसरा खयाल आता नहीं है, तो उस किरदार से बाहर निकलना मुझपर बहुत भारी नहीं पड़ा।

 
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