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Sitara Devi: जब सितारा देवी ने किया बाल विवाह का विरोध, प्रतिभा देखकर रवींद्र नाथ टैगोर ने दिए इतने रुपये

Mon, 25 Nov 2024 07:30 AM IST
मोहम्मद फायक अंसारी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

सितारा देवी भारतीय शास्त्रीय कथक नृत्य की महान नर्तकी थीं। आइए उनकी पुण्यतिथि पर जानते हैं उनसे जुड़ीं कुछ दिलचस्प बातें...
 
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सितारा देवी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सितारा देवी भारतीय शास्त्रीय कथक नृत्य की एक महान डांसर, गायिका और अभिनेत्री थीं। उनका जन्म कोलकाता में हुआ था। उन्हें 'नृत्य सम्राज्ञी' के नाम से भी जाना जाता था। भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपने अद्भुत नृत्य प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध सितारा देवी का योगदान भारतीय शास्त्रीय नृत्य के इतिहास में अमिट है। आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर हम उनके जीवन के कुछ महत्वपूर्ण क्षणों पर प्रकाश डालने जा रहे हैं, जिसमें उनका बाल विवाह का विरोध, रवींद्रनाथ टैगोर से प्रेरणा मिलना और एक नृत्य सम्राज्ञी के रूप में उनका उत्कर्ष शामिल है।

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बाल विवाह का विरोध और शिक्षा की ओर पहला कदम

सितारा देवी का नृत्य की ओर रुझान बचपन से ही था। वह किसी भी कीमत पर अपनी कला को आगे बढ़ाना चाहती थीं। एक समय था जब उनका परिवार उनकी शादी की तैयारी कर रहा था, उस समय उनकी उम्र काफी कम थी, उन दिनों बाल विवाह आम बात थी, लेकिन सितारा देवी ने इसकाविरोध किया और पढ़ाई और नृत्य को प्राथमिकता दी। उन्होंने यह तय किया कि वह अपनी कला में महारत हासिल करेंगी और इसलिए विवाह को टाल दिया गया। इसके बाद उन्हें कामच्छगढ़ हाई स्कूल में भर्ती किया गया, जहां उन्होंने नृत्य में अपनी यात्रा की शुरुआत की।


ऐसा मिली नई दिशा

स्कूल में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुआ था, जिसमें 'सावित्री और सत्यवान' की पौराणिक कहानी पर आधारित नृत्य नाटिका प्रस्तुत की जानी थी। सितारा देवी ने अपनी नृत्य प्रतिभा से सभी को प्रभावित किया और स्कूल में अपने सह-कलाकारों को नृत्य सिखाने का कार्य भी सौंपा गया। यह अवसर उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ और उन्हें नृत्य के क्षेत्र में एक नई दिशा मिली।

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जब रवींद्रनाथ टैगोर की जमकर सराहना

जब सितारा देवी महज 11 वर्ष की थीं, तब उनका परिवार मुंबई आ गया। यहां, उन्होंने एक विशेष प्रस्तुति दी, जिसमें रवींद्रनाथ टैगोर, सरोजिनी नायडू और सर कावसजी जहांगीर जैसे प्रसिद्ध लोग शामिल थे। टैगोर ने उनके प्रदर्शन से बेहद प्रभावित होकर उन्हें 'नृत्य सम्राज्ञी' का उपनाम दिया और अपनी सराहना के तौर पर उन्हें एक शॉल और 50 रुपये का उपहार दिया। यह क्षण सितारा देवी के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जो उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा।


फिल्मों में भी किया काम

सितारा देवी की पहली प्रस्तुति मुंबई के जहांगीर हॉल में हुई थी, जो उस समय शहर का सांस्कृतिक केंद्र था। फिल्मों में उन्हें मौका देने का श्रेय फिल्म निर्माता और नृत्य निर्देशक निरंजन शर्मा को जाता है। सितारा देवी ने उषा हरण (1940), नगीना (1951), रोटी (1942), मदर इंडिया (1957) जैसी फिल्मों में नृत्य दृश्य दिए। मदर इंडिया में होली नृत्य की उनकी प्रस्तुति बेहद प्रसिद्ध हुई। इस गाने में वह लड़के के रूप में नजर आई थीं। हालांकि, उन्होंने जल्द ही फिल्मों को छोड़ दिया, क्योंकि वह महसूस करती थीं कि यह उनके शास्त्रीय नृत्य की साधना में रुकावट डाल रहा था।


विदेशों में भी खूब चला जादू

सितारा देवी के योगदान को भारतीय शास्त्रीय नृत्य में कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। उनके नृत्य को न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी सराहा गया। उन्होंने लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल (1967) और न्यूयॉर्क के कार्नेगी हॉल (1976) जैसे प्रतिष्ठित स्थानों पर प्रस्तुति दी। उन्हें 'कथक की रानी भी कहा जाता था।
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