हालांकि, देश में सिनेमाघरों के अक्टूबर के महीने से खुलने को लेकर बातचीत जारी है लेकिन इस पर भी अजमत को भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा, 'अगर सिनेमाघर खुल भी जाते हैं तो भी दर्शक फिल्म देखने नहीं आने वाले। चाहे फिल्म सलमान खान की हो या फिर आमिर खान की। ज्यादातर लोग तो ओटीटी पर ही फिल्में देखने में व्यस्त हैं। और जो निचले दर्जे के हैं, उन्हें अपनी जान की हद से ज्यादा परवाह है। इसलिए वह फिल्म देखने नहीं आएंगे। इसके लिए तो सरकार को भी दोष नहीं दिया जा सकता। बस दिक्कत इस बात की है कि सरकार ने एक सैनिटाइजेशन विभाग और बना दिया है जिसको अब हर महीने का पांच से छह हजार रुपये और देना पड़ेगा। मुझे लगता है कि हार कर हमें अपना सिनेमाघर बंद ही करना पड़ेगा।'
आगरा स्थित श्री टॉकीज के मालिक निमित अग्रवाल के भी विचार कुछ मिलते जुलते ही हैं। वह बताते हैं कि उनका टॉकीज पिछले 16 मार्च से बंद है। उन्होंने बताया, 'हमारी बंदी सबसे लंबी होने वाली है। सरकार की तरफ से न तो सिनेमाघरों को खोलने में राहत मिल पा रही है और न ही बिजली के बिल में भी कोई राहत दी जा रही है। पक्का तो कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन अक्टूबर के पहले सप्ताह से यहां आगरा में सिनेमाघरों के खुलने के आसार हैं। हमारा नुकसान तो सिनेमाघरों के खुलने के बाद भी होगा। क्योंकि फिल्म देखने के लिए लोग इतने आएंगे नहीं जितना हमारा सिनेमाघर के रखरखाव में खुद का ही खर्चा होगा।'
दिल्ली के शाहीन बाग स्थित एक सिनेमाघर का तो और भी ज्यादा बुरा हाल है। इसके एमडी गुरमीत सिंह सेबल बताते हैं कि दिसंबर से लेकर फरवरी तक तो शाहीन बाग में प्रदर्शनकारियों ने जमावड़ा लगा रखा था और फिर मार्च में कोरोना वायरस की वजह से सब कुछ बंद हो गया। तो उनका थिएटर तो कोरोना वायरस की वजह से हुए लॉकडाउन से पहले से ही प्रभावित था। अक्टूबर में भी अगर सिंगल स्क्रीन वाले सिनेमाघर खुल जाते हैं तो उनकी आमदनी इतनी नहीं होगी जितने में वह खुद का खर्चा भी उठा सकें।
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