ढाई का पहाड़ा याद करने के लिए क्लास में बैठे बच्चों का स्वर गूंज उठा, लेकिन उसमें एक ऐसा बच्चा ऐसा भी था जो खामोश बैठा था। उसे खामोश देखकर मास्टर जी ने उसके पास जाकर पूछा कि तुम क्यों नहीं पहाड़ा याद कर रहे हो। इस पर बच्चे ने कहा ‘मास्टर जी मुझे पहाड़ याद नहीं होते'। तभी वहां पर बैठा दूसरा बच्चा बोल पड़ा नही मास्टर जी यह झूठ बोल रहा है। इसे गीत और भजन एक ही बार में याद हो जाते हैं।
यह बच्चा कोई और नहीं बल्कि कुंदन लाल सहगल थे। 11 अप्रैल 1904 को जम्मू के नवाशहर में रियासत के तहसीलदार अमर चंद सहगल के घर जब कुंदन का जन्म हुआ तो पिता ने यह कभी नही सोचा होगा कि उनका यह पुत्र अपने नाम को सार्थक करते हुए वाकई एक दिन ‘कुंदन’ की तरह ही चमकेगा।
भारतीय सिनेमा जगत के पहले ‘महानायक’ का दर्जा प्राप्त सहगल ने अपने दो दशक के लंबे सिने कैरियर में महज 185 गीत ही गाए। इनमें 142 फिल्मी और 43 गैर फिल्मी गीत शामिल है, लेकिन उन्हें जितनी ख्याति प्राप्त हुई उतनी हजारों गीत गाने वाले गायकों को नसीब नहीं हुई। शुरुआती दौर में बतौर अभिनेता काम करने का मौका मिला लेकिन उन्हें कामयाबी बतौर गायक के रूप में मिली।
अपने दो दशक के सिने करियर में सहगल ने 36 फिल्मों में अभिनय भी किया। हिंदी फिल्मों के अलावा उन्होंने उर्दू, बंगला, तमिल फिल्म में भी अभिनय किया। अपनी दिलकश आवाज और अभिनय से सिने प्रेमियों के दिल पर राज करने वाले के. एल सहगल 18 जनवरी 1947 को इस संसार को मात्र 43 वर्ष की उम्र में अलविदा कह गए।