‘यतो हस्त: ततो दृष्टि, यतो दृष्टि ततो मन:, यतो मन: ततो भाव:, यतो भाव: ततो रस:’ यानी जहां हाथ हैं, वहां नजर होनी चाहिए। जहां नजर है वहीं मन होना चाहिए। जहां मन होगा वहीं भाव उत्पन्न होगा। और, भाव होगा तभी रस आएगा। जीवन के किसी भी क्षेत्र में अपने कौशल को सिद्ध करने का यही मूल मंत्र भी है। नन्हीं मिथु जीवन का ये शुरुआती सबक भरतनाट्यम में सीख रही है। वहां एक बिगड़ैल बच्ची नूरी लाई जाती है। मिथु उसे भरतनाट्यम तो नहीं सिखा पाती। हां, नूरी उसे क्रिकेट खेलना जरूर सिखा देती है। नन्हीं मिथु को पड़ोस के काबिल कोच संपत पहली नजर में परख लेते हैं। वह उसे घिसना शुरू करते हैं। मिथु अपना पैर क्रीज में नहीं टिका पाती है तो जूते में कील भी ठोंक देते हैं। और, फिर घर आकर उसके सूज आए पैर में बर्फ भी बांधते हैं। गुरु पूर्णिमा के अगले ही दिन इससे बेहतर फिल्म देखने को और मिल भी कौन सी सकती है? अंतर हाथ सहार दे बाहर बाहै चोट, यही तो गुरु और शिष्य का कुम्हार और घड़े वाला रिश्ता भी है।
shabaash mithu
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
महिला क्रिकेट कप्तान की प्रेरक कहानी
फिल्म ‘शाबाश मिथु’ (शाबाश मिट्ठू या शाबाश मिठु नहीं) भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान रही मिताली राज (तेलुगू में मिथाली राज) की कहानी है। बायोपिक ये नहीं है, हां हैगियोग्राफी जरूर कह सकते हैं। लेकिन, तकनीकी चर्चा में ना भी जाएं तो फिल्म ‘शाबाश मिथु’ वर्ल्ड कप हारे हुए एक कप्तान की प्रेरक कहानी है। कहानी चूंकि अभी बीते चंद बरसों की ही है तो दर्शक इससे तुरंत जुड़ भी पाते हैं। ये फिल्म देखते हुए कई तरह के भाव शुरुआत में आते हैं। पहला तो ये कि जब पुरुष क्रिकेट टीम का पहला वर्ल्ड कप जीतने वाले कपिल देव और उनकी टीम की कहानी ‘83’ बॉक्स ऑफिस पर नहीं चल पाई तो गिनती के पांच महिला क्रिकेटरों के नाम तक न बता पाने वाले दर्शकों के बीच एक महिला क्रिकेटर की कहानी का क्या होगा? सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि एक और वर्ल्ड कप जिताने वाले भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की जीवनी के तौर पर प्रचारित हैगियोग्राफी ‘एम एस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’ भी इसे बनाने वाली कंपनी के खाता बही में कोई बहुत मुनाफे वाली फिल्म नहीं रही है।
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बस खेल बड़ा है...
जिस देश में क्रिकेट के करोड़ों दीवाने हैं, उस देश में क्रिकेट पर बनने वाली फिल्मों का बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड इतना उथला क्यों है, ये अलग शोध का विषय है लेकिन अभी मिताली राज की कहानी परदे पर उतरी है। कुछ दिन बाद अनुष्का शर्मा भी झूलन गोस्वामी की कहानी लेकर आने वाली हैं। इन कहानियों का मूल तत्व है किसी एक इंसान की ऐसी जिजीविषा जो उसे सोने नहीं देती। फिल्म ‘शाबाश मिथु’ में एक जगह मिताली कहती भी है, ‘सपने ऐसे ही होने चाहिए जो सोने ना दें।’ बात सही भी है। और, आंखों को भा जाने वाला सपना कौन, कब कहां दिखा जाए, पता नहीं होता। जैसे क्रिकेट की कोचिंग करने मिताली का भाई मिथुन जाता है और कोच को उसकी बहन मिथु का क्रिकेट पसंद आ जाता है। मिथु को उसकी पहली गुरु नूरी ने बस यही सबक सिखाया कि आउट नहीं होना है। जीवन का भी यही मूल मंत्र होना चाहिए कि जिस खेल में उतरो, बस आउट नहीं होना है। खेल के हर मैदान के सामने सारे आंसू सारे दुख छोटे हैं। बस खेल बड़ा है, तो खेलो। ये मिथु का कोच उसे सिखाता है।
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सबसे बड़ा अकेले का संघर्ष
फिल्म ‘शाबाश मिथु’ इरादे से नेक फिल्म है। ये उन तमाम लोगों को एक सबक देती है जो जीवन में मुसीबतों से हार मान लेते हैं। मिथु बचपन से इच्छाशक्ति की मजबूत बच्ची है। वह जो ठान लेती है, करके दिखाती है। फिल्म शुरू भी भद्रलोक के किसी अद्भुत गान की तरह ही होती है। शुरू का आधा घंटा फिल्म पर इसके निर्देशक सृजित मुखर्जी की पकड़ साफ नजर आती है। दो सहेलियों के आपसी विश्वास की कहानी के तौर पर आगे बढ़ती फिल्म में पहला झटका तब आता है जब नूरी अपने पिता की जिद के आगे हार मान लेती है और शादी कर लेती है। मिथु का आगे का संघर्ष अकेले का है। और, अकेले का संघर्ष ही सबसे मजबूत संघर्ष भी जीवन में होता है। कोच एक सीमा तक साथ आ सकता है। सही रास्ता दिखा सकता है। सही तकनीक बता सकता है। लेकिन उसके आगे जो कुछ करना है वह खुद करना है और जब मिथु को अपने जीवन का पहला मैच खेलना होता है, उसी दिन उसके कोच के निधन की खबर आती है। टीम मैनेजर ये बात कप्तान को बताती है और कहती है कि खबर मैच के बाद ही मिताली को दी जाए लेकिन डाह ऐसा कि कप्तान ही नए खिलाड़ी का खेल खराब करने के चक्कर में लगा रहता है।
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फाइनल हारा, जीते दिल
अच्छा हुनरबाज होना और अच्छा इंसान होना, ये दो अलग अलग बाते हैं और इसे बहुत ही समझदारी से फिल्म ‘शाबाश मिथु’ समझाती चलती है। मिथु अच्छी खिलाड़ी भी है और अच्छी इंसान भी। वह टीम के लिए क्रिकेट बोर्ड से भी भिड़ती है। बोर्ड नहीं मानता है तो वह खेलना छोड़ देती है। और फिर उसकी कद्र उसी पुराने कप्तान को समझ आती है जो अब टीम की कोच है और जिसकी नौकरी खतरे में हैं। कहानी 2017 के महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप तक जाती है। टीम फाइनल में हार जाती है तो सब दुखी होकर लौटते हैं। लेकिन, देश लौटने पर जिस तरह से उनका स्वागत होता है और हवाई अड्डे पर जब प्रधानमंत्री का फोन मिताली राज के पास आता है तो मिताली को लगता है कि उसका संघर्ष सफल रहा। लेकिन, मिताली की जीत सिर्फ करोड़ों दिलों को अपने खेल से जीतने भर की नहीं है। उसकी जीत है वे सैकड़ों बच्चियां जो उसका ऑटोग्राफ लेने जुटती हैं और उसके जैसा खिलाड़ी बनना चाहती हैं।
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सामाजिक अंतर्कथा का ताना-बाना
फिल्म ‘शाबाश मिथु’ की अंतर्कथा में भारतीय समाज के और भी तमाम बदलते रंग दिखते हैं। ये रंग है एक चाय वाले की बेटी, एक लुहार की बेटी, एक मछुआरे की बेटी और एक चमड़ा गलाने वाली की बेटी के मेहनत के। फिल्म चूंकि मिताली राज को फोकस में रखकर बनी है तो कहानी के इन अहम किरदारों को सृजित मुखर्जी बस छूकर निकल जाते हैं। ये बात फिल्म को कमजोर करती है। फिल्म की कमजोर कड़ियों में सृजित के निर्देशन के अलावा इसकी पटकथा का सही ग्राफ में न होना भी है। क्रिकेट की हर कहानी वहीं बोरिंग होने लगती है जहां असली क्रिकेट इसमें आने लगता है। अगर आमिर खान की ‘लगान’ के संघर्ष को देखें तो मैच वहां भी खेला जाता है लेकिन उसका मानवीय संघर्ष इसे कालजयी फिल्म बनाता है। एक बेटी का भरतनाट्यम की बजाय क्रिकेट सीखने का फैसला करना और उसके माता पिता का उसमें खुलकर साथ देना इस फिल्म की अंतर्कथा का सबसे मजबूत पहलू है और इस फिल्म को देखने वाले हर माता पिता को इसे अपने साथ गांठ बांधकर रख लेना चाहिए।
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देखें कि न देखें
तकनीकी तौर पर देखा जाए तो फिल्म ‘शाबाश मिथु’ अपनी पटकथा के अलावा अपने गीत संगीत में भी कमजोर पड़ती है। प्रेरक कहानियों में संघर्ष के जैसे गीत होने चाहिए, वैसे अमित त्रिवेदी बना नहीं पाए हैं। कौसर मुनीर, स्वानंद किरकिरे और राघव एम कुमार के गीतों में भी दिल को छू लेने वाले न भाव हैं और न रस। सिनेमैटोग्राफी और संपादन भी फिल्म का चुस्त दुरुस्त है। लेकिन, फिल्म की असली मजबूती है इसके कलाकारों का अभिनय। मुकेश छाबड़ा ने फिल्म ‘83’ के बाद एक बार फिर अपनी कास्टिंग प्रतिभा का लोहा मनवाया है। महिला क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों के रूप में दिखे हर कलाकार ने पूरी मेहनत से काम किया है। नन्हीं मिथु बनीं इनायत वर्मा, नन्ही नूरी बनीं कस्तूरी जगनाम और सुकुमारी के रोल में शिल्पा मारवाह ने काबिले तारीफ काम किया है। विजय राज ऐसे किरदारों के लिए बिल्कुल फिट कलाकार हैं। और, तापसी पन्नू! उनका अभिनय एक बार फिर साबित करता है कि वह मौजूदा दौर की अभिनेत्रियों में वाकई अव्वल नंबर हैं। घर में बेटी है तो उसके साथ ये फिल्म जरूर देख लीजिए।