अमर उजाला संवाद उत्तर प्रदेश 2026 का मंच सज चुका है। राजधानी लखनऊ में जारी इस कार्यक्रम में अभिनेत्री श्वेता त्रिपाठी ने भी भाग लिया। मंच पर उन्होंने सिनेमा, अपनी अपकमिंग फिल्म 'मिर्जापुर' और अभिनय के शुरुआती दौर के किस्से साझा किए।
नानी के घर से जुड़ी यादे हैं
कार्यक्रम की शुरुआत में लखनऊ से जुड़ी यादें सुनाते हुए श्वेता त्रिपाठी ने कहा, 'लखनऊ मेरी नानी का घर है। यहां गर्मी की छुट्टियों से जुड़ी यादें हैं। बहुत गर्मी होती थी, उसमें भी हम खूब मस्ती करते थे। यहां का खाना तो आज भी याद है। आज हमने खस्ते और आलू खाए।'
नई सोच को अगर डिफाइन करोगे तो कितना बदलाव आया है?
नई सोच में सबसे मुश्किल चीज होती है कि हमारी जो खुद की सोच होती है, उसमें बहुत सारी चीजें होती हैं जो हमारी सोच को हमारी बनाती है। हम क्या फिल्मे देखते हैं। हम नाटक देखने जाते हैं या नहीं। आर्ट और कल्चर से एजुकेशन से जब हम खुद को जोड़ते हैं तो ये सब चीजें हमें बहुत प्रभावित करती हैं। मेरा बैकग्राउंड बहुत अकेडमिक है। मैं खुद को बहुत लकी मानती हूं कि मुझे लखनऊ का कल्चर मिला। मेरी सोच बदलती रही और यह बहुत जरूरी है। हमें अपनी सोच को पकड़कर नहीं रखना है। हमें ग्रो करना है। अनुभवों की वजह से मैं हूं। डरिए मत नई सोच से। कोई जबर्दस्ती तो नहीं कह रहा कि यही करना है आपको। एक और चीज मैं कहूंगी कि धैर्य रखिए। सुनिए और समझिए कि सामने वाला क्या कहने को कोशिश कर रहा है।
कभी अपनी सोच से समझौता करना पड़ा है?
ऐसा दो बार करना पड़ा। जब उन्होंने मेरे को कपड़ों से डेस्क्राइब किया। आप मुझे किरदार बताओ ना।
गोलू के किरदार से लाइफ कितनी बदली?
मिर्जापुर तो लव है हमारा। गोलू और मिर्जापुर अब मेरे साथ नौ साल से है। नौ साल की रिलेशनशिप बहुत सुंदर होती है। इस सफर में क्या-क्या जुड़ा? अली फजल, वो भी लखनऊ से है। मिर्जापुर की जब मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी और पहला एपिसोड पढ़ा तो बहुत मजा आया। मुझे पता था कि मुझे इसका हिस्सा होना है। गोलू के साथ-साथ मैंने भी बहुत ग्रोथ की है।
मिर्जापुर की फिल्म भी आने वाली है?
हमारी फिल्म लंबी तो होगी। आप क्या कहानी बताना चाहते हो, कितना टाइम चाहिए उसे बताने में। हम एक्टिंग तो उतनी ही करेंगे। लेकिन, सीरीज में आप डूब सकते हो। उसका मजा अलग है। ओटीटी ने राइटर, डायरेक्टर, महिला किरदार, क्रू सदस्यों को बहुत सारे मौके दिए हैं। महिलाओं को अब सिर्फ ब्रैकेट में नहीं डाला जा रहा है। किरदार में अब नए कलर और फ्लेवर हैं।
ओटीटी ने महिलाओं को अलग नजरिए से देखना शुरू कर दिया है?
बदलाव आता है तो बदलाव पूरी इंडस्ट्री में आता है। यहां हम जहां तक पहुंचे हैं, इसमें बहुत सारी औरतों का तो रोल है ही, मेल एक्टर्स का भी बहुत हाथ है। पीछे से कुछ सीखने को है अगर तो वह सीखकर आगे बढ़ना चाहिए। यह जिम्मेदारी दर्शकों की है। दर्शक जो देखेगा, वही बनेगा। मैं यहा सभी से रिक्वेस्ट करना चाहूंगी कि वैसा कंटेंट देखिए, जिसे आप देखना चाहते हैं।
ऐसा कोई किस्सा जो आपने सुना हो कि यह बदलाव इंडस्ट्री में बहुत जरूरी है?
कॉन्ट्रैक्ट! ऐसा मेरे एक दोस्त के साथ हुआ। वह कॉन्ट्रैक्ट सिर्फ पेपर तक ही रहा। लोगों को दिखाना बहुत जरूरी है। लोगों को समझाना पड़ेगा। टाइम लगेगा, लेकिन कोई दिक्कत नहीं।
पेमेंट को लेकर महिलाओं को शिकायत रहती है। क्या इंडस्ट्री में जेंडर के आधार पर भेदभाव होता है?
जितने भी मेल एक्टर्स के साथ मैंने काम किया है, वो मेरे बेहतरीन दोस्त भी हैं। आपके जेंडर के हिसाब से काम डिसाइड नहीं होना चाहिए पर यहां बिल्कुल होता है। मैं इससे इनकार नहीं कर सकती। पॉपुलैरिटी काम मिलने में बहुत बड़ा फैक्टर है। काम मिल जाता है तो पेमेंट मिलने में। लेकिन, मैं सिर्फ अपना अनुभव बताऊंगी।
श्वेता प्रोड्यूसर भी हैं आप। यह सोच कहां से आई? कंटेंट का आइडिया कहां से आया?
सोच की बात है। डर में नहीं रहना चाहिए। डर की वजह से हम अपने परों को काट देते हैं, जिनसे हम उड़ सकते हैं।
ऐसी कौन सी सोच है, जो आप अपनी टीम के साथ लागू नहीं करेंगी?
जब आप प्रोजेक्ट ऐसा चुनते हो, जिसका कोई इंटेंट होता है तो उसके साथ लोग भी वैसे ही जुड़ते हैं। मेरी पहली फिल्म नवाजुद्दीन के साथ थी। उनसे बहुत सपोर्ट मिला। एक और किस्सा है। हम कान फिल्म फेस्टिवल गए। ऋचा ने जैसा मुझे ट्रीट किया, वह शानदार था। यह सारी चीजें मैंने सीखी हैं, अपने साथ काम करने वालों से, मैं उन्हें आगे लेकर जाना चाहती हूं।
कई एक्ट्रेस अब आवाज उठाने लगी हैं कि आठ घंटे ही हमें काम को देने हैं। निर्माता के रूप में आप कैसे देखती हो?
बहुत सारी बातें पहले ही क्लियर कर लेनी चाहिए। अभी एक प्रोजेक्ट है, जहां कई शर्ते हैं। वैनिटी वैन नहीं होगी। फोन की इजाजात नहीं होगी तो पहले ही इन पर बात करो। प्रोजेक्ट पर निर्भर करता है सब। मैं महिलाओं के केस में यह कह सकती हूं कि बहुत काम करना होता है। प्रोफेशनली भी हम जो वक्त मांग रहे हैं, वह हमारी मेंटल पीस के लिए बहुत जरूरी है। बहुत फॉर ग्रांटेड ले लिया हम लोगों को। वह टाइम का जो हम मांग रहे हैं, सोच-समझकर मांग रहे हैं।
आपकी कौन सी शर्ते हैं? जो आप मानती हैं कि आप डिजर्व करती हैं।
मेरे हिसाब से काम करते रहो। आगे बढ़ते रहो। सबको लेकर आगे बढ़ते रहो।
आप थिएटर से भी जुड़ी रहीं। वो कैसे हुआ ?
मैं एक्टर बनना चाहती थी, क्योंकि मैं एक्टर्स को स्टेज पर देखती थी दिल्ली में। मैं लंदन भी गई थी अपनी दोस्त के साथ। वहां हमने परफॉर्मेंस देखीं। मेरे पापा ने भी बचपन में कहा था कि जो भी पैसा या टाइम आप खर्च कर रहे हो उसे अनुभवों पर खर्च करो, क्योंकि यह जिंदगीभर साथ रहता है। सही टाइम वो होता है, जब आप किसी चीज को लेकर फैसला ले लो। मेरे माता-पिता बहुत प्रेरित करने वाले हैं। बचपन से ही मुझे बहुत प्रेरित किया गया था, डांस के लिए और ड्रामा के लिए। उन्हें ऐसा लगा होगा कि यह मेरी पर्सनैलिटी में बहुत हेल्पफुल होगा। इसके लिए मेरे पेरेंट्स का शुक्रिया। मैं भी उन चीजों को पकड़े रखी। मैं केजी से स्टेज पर रही हूं। मैं गर्मी की छुट्टियों में भी वर्क शॉप करती थी। आप बस एक सही दिशा पकड़कर चलो तो कहीं न कहीं पहुंच ही जाओगे। ऐसा नहीं है कि मुश्किलें नहीं होंगी। मैं कई बार रोती भी हूं। टाइम लगता है। लेकिन, ये मत भूलना कि आपने जब शुरू किया तो क्यों शुरू किया? खुद पर कोई प्रेशर मत डालो। लाइफ को एंजॉय करो।
अगर कोई लड़की ऐसे फील्ड में जाए, जिसके लिए इंडिया में प्रेरित नहीं किया जाता?
ग्रोथ जरूरी है। ये भी मेरे पापा ने मुझे बोला था। ग्रो करो और सीखो। आप बस लगे रहो। दूसरे की सोच आप क्यों बदलना चाहते हो, उसकी क्लैरिटी होना बहुत जरूरी है। ईगो न हो। हम जितना जल्दी अपनी ईगो को साइड कर दें तो हमारा भला होगा।