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VFX-क्रोमा ने सिनेमा को बर्बाद किया या आबाद?

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आजकल ऐसे वीडियो खूब वायरल हो रहे हैं, जिनमें फिल्मों की शूटिंग के खुलासे होते हैं। शूटिंग के दौरान के उन वीडियो में साफ दिखता है कि फिल्म की शूटिंग एक बंद कमरे में की जा रही है, जबकि फिल्म में उसी दृश्य में खुला आसमान और युद्ध का बड़ा मैदान दिखाई दे रहा है।
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इसका हालिया उदाहरण भारत की सबसे हतप्रभ करने वाली फिल्म बाहुबली के सांड और अभिनेता राणा डग्गुबती की लड़ाई वाले दृश्य को लेकर सामने आया वीडियो है। इसमें साफ देखा जा रहा है कि शूटिंग के दौरान विशालकाय सांड कोई और नहीं बल्कि फिल्म के मुख्य हीरो प्रभाष थे।

आखिर कैसे एक मनुष्य की रूप को एक पर्दे पर एक विशालकाय सांड का रूप दे दिया गया। ऐसा क्या करते हैं, फिल्म बनाने के दौरान? इस सवाल के जवाब में आमतौर पर हमे कुछ शब्द बता दिए जाते हैं, जैसे- वीएफएक्स या क्रोमा।
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पर क्या हम जानते हैं कि वीएफएक्स या क्रोमा करते क्या हैं। कैसे एक बंद कमरे में दौड़ती साइकिल को ट्रेन की पटरी पर दौड़ती साइकिल की तरह दिखा देते हैं। कैसे फिल्म देखने के दौरान एक सांसें थमा देने वाला सीन किसी टेबल पर बैठकर तैयार कर दिया जाता है। सबसे अहम बात ये कि क्या इससे सिनेमा को फायदा हुआ है, या फिर इस तकनीकी ने सिनेमा में नकलीपन भर दिया है, जानिए आगे की स्लाइड में।


कैसे करते हैं क्रोमा, क्या होता है वीएफएक्स

आजकल जो वीडियो सामने आते हैं, ‌उनमें ज्यादातर पर हमें पीछे एक हरे रंग पर्दा दिखाई देता है। हम देखते हैं कि हीरो और कपड़ा आदि तो वैसे ही हैं, जैसे फिल्म में दिखे थे, पर पृष्ठभूमि में यहां हरे रंग के पर्दे या हरी परत दिखाई दे रही है। फिल्‍म में वहीं बड़ी भव्य इमारतें दिखाई दे रही हैं, या ट्रेन की पटरियां दिखाई दे रही हैं।

असल में किसी भी वीडियो एडिटिंग साफ्टवेयर में एक सुविधा होती है, जिसे 'क्रोमा की' कहते हैं। इसकी खूबी ये होती है कि यह किसी भी वीडियो से हरे रंग और आसमानी नीले रंग पूरी तरह हटाकर पारदर्शी कर देता है।

यानि अगर आप हरे रंग का कपड़े पहनकर कोई वीडियो शूट करा लें और बाद में चाहें कि आपके शरीर पर कोई कपड़ा न दिखे तो क्रोमा के जरिए ऐसा किया जा सकता है। लेकिन कपड़े हटने पर वह जगह पारदर्शी हो जाएगी। अगर उसी वक्त आप एक अन्य वीडियो एडिटिंग साफ्टवेयर पर ले जाएं तो दूसरे उन पारदर्शी जगहों पर दूसरे वीडियो की झलकियां दिखने लगती हैं।

इसके आसान प्रयोग को हम ऐसे समझ सकते हैं कि जब कभी न्यूज चैनल पर बाढ़ पर कोई विशेष खबर चलानी होती है, तो एक अहसास के लिए न्यूज एंकर के पीछे बाढ़ का दृश्य दिखाया करते हैं। मानों न्यूज एंकर बाढ़ के बीचो-बीच खड़े होकर समाचार पढ़ रहा हो। पर असल में वह स्टू‌डियो में एक हरे रंग के पर्दे के सामने खड़ा होता है।

ठीक इसी तरह वीएफक्स है। असल में वीएफएक्स का मतलब होता है, विजुअल इफेक्ट्स। यह वीडियो पर तमाम तरह के प्रभाव डालने की एक पूरी लैब होती है। इसे आप किसी भौतिकी या रसायन लैब की तरह समझ सकते हैं। जैसे किसी रसायन लैब में दो या दो से अधिक पदार्थों को मिलाकर हम कोई नया पदार्थ बना सकते हैं। ठीक उसी तरह वीएफएक्स लैब में हम कई तरह के वीडियो को मिलाकर एक नए तरह का वीडियो बनाते हैं। अब मसला ये है कि इसके आने के बाद सिनेमा का नुकसान हुआ है या फायदा, जानिए अगली स्लाइड में।

अलिफ लैला में दिखा था क्रोमा का कमाल

अगर आपके जहन में 1980 के दशक तक की फिल्‍मों की यादें ताजा हो, तो आपको झट से खयाल आ जाएगा कि पहले फिल्मों में युद्ध आदि के दृश्य कितने नकली जान पड़ते थे‌। इसको आसानी से समझने के लिए आप रामानंद सागर के रामायण के दृश्यों को याद कर सकते हैं। जिनमें युद्ध के दौरान दोनों सेनाएं एक नीयत दूरी पर खड़ी हो जाती थी और दोनों ओर के योद्धाओं में हवाई मार्ग से युद्ध हुआ करते थे।

इसमें दिखाते थे कि एक तीर भगवान राम ने छोड़ा और दूसरी तीर रावण ने छोड़ा, उसके बाद दोनों तीर आसमान में जाकर टकराते हैं। वही ध्वस्त हो जाते हैं। यहां तक की रावण या अन्य राक्षसों को मारने के लिए भी तीर हवा में उछाल दिए जाते थे, जो जाकर राक्षसों को लग जाती थी और उनकी मौत हो जाती।

ऐसा इसलिए होता क्योंकि तब न तो क्रोमा था कि युद्ध का भव्य मैदान दिखा दिया जाए। न तो वीएफएक्स था, जिससे दस आदमी की सेना को 100 आदमी की सेना दिखा दिया जाए। क्रोमा तकनीक भारत में आने के बाद इसका सबसे ज्यादा प्रभाव धारावाहिक 'अलिफ लैला' पर पड़ा।

अलिफ लैला में ऐसे कई दृश्य दिखे जिसमें जिनमें अचानक दीवार से जिन निकल आता था, तो कभी किसी के फूंकने पर कोई दैत्य निकल आता था। तो कभी हवन के कुंड से दानव को निकलते दिखाते थे। अब इनका प्रयोग तेजी से बढ़ा है। हॉलीवुड में तो पहले से इनका खूब प्रयोग होता रहा है। बॉलीवुड में भी उन्हीं के देखा-देखी नए-नए चलन शुरू हो रहे हैं। अगली स्लाइड में जानिए, ये तकनीक आने के बाद फिल्मकारों ने इसका कैसा इस्तेमाल किया है।
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वीएफएक्स-क्रोमा का प्रभाव, अच्छा या बुरा?

निर्देशक-कहानीकार के लिहाज से
क्रोमा और वीएफक्स के आने के बाद फिल्मकारों-पटकथा लेखकों को चौंकाने वाले दृश्य सोचने की आजादी मिल गई है। वह जो कुछ, जितना रोमांचकारी सोच सकते हैं सोचते हैं, क्रोमा और वीएफएक्स के जरिए उसे पर्दे पर उतार दिया जाता है।

अभिनेता के लिहाज से
‌कुछ समय पहले तक कठिन दृश्यों के दौरान अभिनेताओं की जान जाने तक की नौबत आ जाती थी। या ‌फिर वह सीन पूरी तरह से अपना प्रभाव खो देता था। बॉडी डबल का प्रयोग भी कठिन था। लोगों को पता चल जाता था कि किस दृश्य में नकलीपन है। लेकिन क्रोमा-वीएफएक्‍स ने उनका काम आसान कर दिया है।

दशर्कों के लिहाज से
इस तकनीक के आने से दर्शकों को रोमांचकारी सीन देखने को मिल जाते हैं। कुछ समय पहले तक कई दृश्य बेहद नकली जान पड़ते थे। लेकिन क्रोमा-वीएफएक्स के जरिए उन्हें वास्वकिता के करीब ले जाते हैं, रोमांच पैदा करता है।

निर्माता के लिहाज से
वीएफएक्स-क्रोमा का सबसे ज्यादा लाभ निर्माताओं को हुआ है। फिल्म की पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए जहां पहले करोड़ों खर्च करने पड़ते थे, वही आज कुछ तकनीकी चीजों पर कुछ लाख लगाकर वही दृश्य तैयार कर लिए जाते हैं। इससे निर्माताओं का खूब पैसा बचता है।

इन सभी फायदों के बीच एक अहम कड़ी ये है कि वीएफएक्स-क्रोमा पर फिल्मकारों की निर्भरता बढ़ती जा रही है। वह पैसे बचाने के चक्कर में उन दृश्यों को फिल्‍माने के लिए भी इस तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं, जिसे बेहद आसानी से बिना तकनीक के फिल्माया जा सकता है।

हिन्दी सिनेमा के इतिहास में वास्वतिक चीजों का अपना महत्व है। हिन्दी सिनेमा की दो ऐतिहासिक फिल्‍में शोले और लगान बिना किसी क्रोमा और वीएफएक्स के शूट की गई थीं। उन दोनों फिल्मों का जो प्रभाव है, वैसा किसी क्रोमा वीएफएक्स वाली फिल्म प्रभाव अभी तक नहीं छोड़ पाई है। अगर इस तकनीक पर निर्माता आश्रित रहे तो जल्द ही सिनेमा में काफी नकलीपन बढ़ जाएगा।
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