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Film Review : सात उचक्के यानी 'गालियों की एबीसीडी'

Fri, 14 Oct 2016 05:04 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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-फिल्म: सात उचक्के
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-निर्माताः नीरज पांडे
-निर्देशकः संजीव शर्मा
-सितारेः  मनोज बाजपेयी, के.के. मेनन, विजय राज, अन्नु कपूर, अदिति शर्मा
रेटिंग **
 
कहने-कहाने में बात अक्सर बढ़-घट जाती है। सात उचक्के में पप्पी (मनोज बाजपेयी) से उसका एक दोस्त कहता है, ‘मैं कहूंगा चार, आप समझोगे आठ और बात निकलेगी दो।’ आप पुरानी दिल्ली से नहीं हैं तब भी इस संवाद के मायने समझना कठिन नहीं है। निर्देशक संजीव शर्मा की फिल्म के साथ यही हादसा होता है। चार से शुरू बात आठ का शिखर छूती हुई दो पर धड़ाम से गिरती है। गालियां इसका लेफ्ट-राइट-सेंटर हैं। अंदर गए तो तय मानिए कुछ नया सीख कर ही आएंगे। इस लिहाज से फिल्म ‘शैक्षणिक’ है।

फिल्म का बड़ा आकर्षण है इसकी स्टारकास्ट। मनोज बाजपेयी, के.के. मेनन, विजय राज, अन्नू कपूर और अनुपम खेर जैसे बेहतरीन ऐक्टर कब एक साथ पर्दे पर देखने मिलते हैं! सात उचक्के की कहानी अलग भाषाई कलेवर-तेवर के साथ शुरू होती है और नई दुनिया का अनुभव कराती है। मगर समस्या उसकी रफ्तार में आ जाती है। जितने तेज गुदगुदाते संवाद आते हैं, उतना तेज घटनाक्रम नहीं बदलता और रवानी में बहते दृश्यों में कृत्रिमता आने लगती है। यहां से झटके लगते हैं। जब तय हो जाता है कि पप्पी को अपनी प्रेमिका सोना (अदिति शर्मा) को पाने के लिए उसकी लालची मां को धन-संपदा से संतुष्ट करना पड़ेगा तो सवाल यही रह जाता है कि कैसे? पुरानी दिल्ली की हवेली पर नजर जाती है, जिसके अंदर खजाना गड़ा होने की खबर है। दिशा तय हो जाती है। डाके की योजना बनती है और एक-एक करके सात उचक्के एक जगह इकट्ठा हो जाते हैं।
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रहस्य के तड़के वाला डिफरेंट सिनेमा है सात उचक्के

फिल्म में उचक्के भले सात हों मगर यह मनोज और विजय के अलावा पुलिसवाले बने के.के. मेनन को केंद्र में रख कर बढ़ती है। इस लिहाज से सारे किरदारों में संतुलन नहीं सधता। हालांकि तीनों केंद्रीय कलाकार परिस्थतियों पर नियंत्रण बनाए रखते हैं। कहानी में नई घटनाओं का अभाव खलता है और आखिर में जो नवीनता आती है वह सारे थ्रिल की हवा निकाल देती है। अंत भला तो सब भला, आप ऐसा कह नहीं पाते।

इसके बावजूद जो दर्शक रहस्य के तड़के वाला डिफरेंट सिनेमा देखना पसंद करते हैं, उन्हें इन उचक्कों का साथ भा सकता है। मनोज-विजय चुटीली भूमिकाओं में जमे हैं। गालियों से युक्त उनकी कॉमिक टाइमिंग अच्छी है। मनोज के साथ मेनन के दृश्य भी मनोरंजक हैं। अदिति शर्मा सीनियरों से पीछे नहीं रहीं।

फिल्म में गालियों की अति किसी-किसी को अखर सकती है क्योंकि एक वक्त के बाद में वे जानबूझकर आपके दिमाग में चटकाई जा रही मालूम पड़ती हैं। कैमरे ने पुरानी दिल्ली को खूबसूरती से पकड़ा है। अलग माहौल सामने आता है। गीत-संगीत अधिक असर नहीं छोड़ पाते। निर्देशक संजीव शर्मा ने अपना काम बखूबी किया है। उनसे आगे बेहतर फिल्म की उम्मीद की जा सकती है। उन्हें बढ़िया घटनाओं से भरी कहानी तथा कसावटपूर्ण पटकथा चुनना होगी।
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