'न्यूटन' लोकतंत्र में वोटिंग के महत्व को स्थापित करती है। क्या ऐसी फिल्में वाकई समाज को बदल सकती हैं?
सच्चाई तो यही है कि जब तक आप नहीं चाहेंगे, कुछ नहीं बदलेगा। सिस्टम को बदलने के लिए सिस्टम का हिस्सा बनना होगा। वोट लोकतंत्र में सबसे ताकतवर चीज है। अब भी बहुत से लोग यह नहीं समझ पाए इसलिए आज भी बड़ी संख्या में लोग वोट नहीं डालते। मुझे लगता है, 'न्यूटन' देखने वाले वोटिंग के महत्व को महसूस कर सकते हैं।
'शाहिद' और 'न्यूटन' के बाद अब 'ओमर्टा' जैसी एक और रियलिस्टिक फिल्म कर रहे हैं। यह एक व्यक्ति के आतंकी (उमर शेख) बनने की कहानी है। क्या यह उसकी जिंदगी को महिमामंडित नहीं करती?
ऐसा नहीं है बल्कि यह एक ईमानदार और कड़वी हकीकत दिखाने वाली फिल्म है। दुनिया में आज जो हो रहा है या होता आया है, हम पढ़ते और भूल जाते हैं। मगर हमने इसे सिनेमा में कैद करके बताने की कोशिश की है। 'शाहिद' एक सच्चाई थी, 'न्यूटन' एक सच्चाई है और 'ओमर्टा' भी एक हकीकत है। सिनेमा हमारे समाज का आईना है।
शाहिद आतंकी कैंपों में रह कर सामान्य दुनिया में लौटा था जबकि 'ओमर्टा' का उमर शेख उसी तरफ रहते हुए नापाक हकरतें करता है। क्यों लगा कि फिर आतंक की दुनिया से जुड़ा किरदार करें?
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। सीरिया एक सच्चाई है और हमारे यहां एक इमाम ने दंगाइयों से कहा कि आप मेरे बेटे की मौत का बदला मत लीजिए, यह भी सच्चाई है। दोनों तरह के लोग और दोनों तरह की बातें हैं।
'न्यूटन' समाज में दबा दिए गए एक वर्ग की बात करती है। 'शाहिद' भी एक आवाज बन कर उठती है। आप सिर्फ सिनेमा तक ही इनसे जुड़ते हैं या ऐसे मुद्दों/बातों से निजी स्तर पर भी प्रभावित होते हैं?
मैं 'न्यूटन' करता हूं, तो उन लोगों से कनेक्ट भी होता हूं, जिन्हें हक नहीं मिल रहा। 'शाहिद' से भी मैं कनेक्ट करता हूं। 'ओमर्टा' चुनौती थी, क्योंकि मैं गलत राह पर चल रहे उस व्यक्ति की फिलॉसफी से नहीं जुड़ा। फिर भी उसे पर्दे पर जीवंत करना है। अभिनय करते हुए मैं भीतर नफरत और गुस्सा लेकर चल रहा था, मगर जानता था कि मैं कौन हूं।