फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राज कपूर की फिल्मों में दिखती है उनके प्यार की झलक

विज्ञापन
विज्ञापन
महान शो मैन राज कपूर आज होते तो नब्बे साल के होते। कहते हैं कि उनकी जिंदगी के रंग उनकी फिल्मों पर उतरे। उनकी फिल्मों के कई दृश्य उनकी जिंदगी के हिस्से थे। समय और स्थितियों में कुछ फर्क हो सकता है, लेकिन जो अनुभव उन्होंने संजोए वह रुपहले परर्दे पर उतर कर आए। उन्हें बेहद रुमानी तबियत का माना गया।
विज्ञापन


कहते हैं कि प्रेम की अनुभूति उन्होने स्कूली जीवन से ही अनुभव होने लगी थी। नीली आंखों और सलोने से दिखने वाले राज कपूर ने अपनी फिल्मों में प्रेम की कहानी ही नहीं दिखाई, उसे गहरे अनुभव भी किया। यही वजह थी कि जब भी वे अपनी नायिकाओं के साथ फिल्मी पर्दे पर दिखे, तो उसमें फिल्मी पर्दे का रोमांस नहीं बल्कि सहज वास्तविक लगने लगे।

आग, आवारा, बरसात, श्री चार सौ बीस, संगम, जागते रहो, जिस देश में गंगा बहती है, संगम से लेकर मेरा नाम जोकर फिर बाबी और सत्यं शिवम सुंदरम तक कई चित्र रुपहले पर्दों में साकार हुए। वो बुने नहीं गए। बल्कि उनके पीछे कोई न कोई कहानी रही। फिल्म के उन दृश्यों में, उस संगीत में उन गीतों में राज कपूर ने अपना कुछ न कुछ बताया।
विज्ञापन

राज कपूर के बचपन का प्यार

पृथ्वी राज कपूर के सबसे बड़े बेटे राज कपूर ने प्यार की अनुभूति को बचपन से ही महसूस करना शुरू कर दिया था। बेशक उनके पास तब उस प्रेम के लिए संवाद न रहे हो। लेकिन उसका अहसास उनके मन में हमेशा रहा। न्यू इरा ब्याइज स्कूल की टीचर के लिए उनके मन में लगाव हुआ। कहा जाता है कि जब कपूर परिवार मुंबई से कलकत्ता जाने लगा तो राज ने पूरी जिद्द कर दी कि वह हॉस्टल में रहेंगे लेकिन कलकत्ता नहीं जाएंगे।

अपनी उस टीचर के प्रति उनके मन में लगाव था। मेरा नाम जोकर में उन्होंने बचपन के प्रेम को दिखाया। स्कूल के बच्चे के तौर पर यह भूमिका ऋषि कपूर ने निभाई। जबकि टीचर के तौर पर सिम्मी ग्रेवाल पर्दे पर दिखीं। राज कपूर कहीं न कहीं इस फिल्म के बहाने उस दृश्यों अनुभूतियों को सामने लाते रहे।

कहा जाता है कि एक बार उनके घर कुछ मेहमान आए हुए थे। उनमें एक युवती सफेद परिधानों में थी। लेकिन उनकी निगाहें बार बार उसकी तरफ ही जा रही थी। राज उससे नजरें नहीं हटा सके। कहते हैं कि जब सब मेहमान जाने लगे, तो राज एक फूल लेकर आए और उस युवती को दे दिया। कहा कुछ नहीं। युवती ने उससे फूल ले लिए। राज को सफेद परिधान अच्छे लगने लगे।

उनकों महिला की सफेद साड़ी पहने हुए देखना बहुत अच्छा लगता था। उनकी फिल्मों में कई प्रसंगों में अभिनेत्रियां सफेद वस्त्रों में दिखी। लेकिन उम्र के ठीक पड़ाव और संजीदगी के साथ उनका पहला प्यार तो एक सिख युवती ही थी। दिड्डो नाम की यह युवती बहुत सुंदर थी, और अच्छे परिवार की थी। वह उम्र में सोलह पार कर रही थी। कहते हैं कि दोनों मांटुगा से चर्चगेट बस से जाते। फिर फ्लोरा फाऊंटेन, मेट्रो सिनेमा या मालावार हिल्स की तरफ निकल जाते। आखिर दिड्डो की शादी मुंबई के किसी बड़े कांटेक्टर से कर दी गई।

राज उसे भूले नहीं। दोनों आयोजनों या दूसरे अवसरों पर दोस्त की तरह मिलते भी थे। राज कपूर की बॉबी के शुभ महूर्त पर राज के खास मेहमानों में दिड्डो भी थी।

नर्गिस और राज कपूर का प्रेम

फिल्म जगत की रुमानी जोड़ियों में राज नर्गिस की सबसे चर्चित प्रेम दास्तान है। राज नर्गिस ने आठ फिल्में की। और जब नर्गिस आर के बैनर से जुड़ी तो फिर दूसरे फिल्मकारों के लिए अपनी फिल्म के लिए उनकी डेट पाना मुश्किल हो गया। कहते हैं कि राज कपूर की जिद्द ही थी कि वह नर्गिस किसी दूसरे बैनर के लिए तैयार नहीं हो पाती थी। आरके बैनर राज नर्गिस की दास्तां का प्रतीक है।

आरके बैनर ने राज और नर्गिस की उस रुमानी तस्वीर को अपना प्रतीक बनाया जिसमें वे वायलेन के साथ है। बरसात, आवारा, श्री चार सौ बीस, चोरी-चोरी व जागते रहो, राज नर्गिस के रुमानियत की तस्वीरें ही तो हैं। राज कपूर जब नर्गिस से पहली बार मिले थे तो बेशक वह पृथ्वीराज के बेटे थे, लेकिन अपनी कला कौशल की जमापूंजी उनके पास कुछ नहीं थी।

वह सिने दुनिया को अवाक होकर देखने वालों में थे। जबकि बीस साल की नर्गिस सात-आठ फिल्मों के साथ जानी मानी कलाकार के तौर पर विख्यात थी। राज कपूर केदार शर्मा के असिंस्टेट के रूप में नई फिल्म के सिलसिले में चेट्यू मारिके गए थे जहां नर्गिस अपनी मां जद्दनबाई के साथ रहती थीं, फिल्म पर ही बात होनी थी। उस समय नर्गिस पकोड़े तल रही थीं। बाहर दरवाजे पर आहट हुई तो वह बाहर आई। जल्दबाजी में उन्हें ध्यान नहीं रहा कि बेसन लगे हाथ, सिर पर बालों में लग गए। उन्होंने पूछा कहिए। राज ने इतना तो बताया कि केदारजी के यहां से आए हैं। पर नर्गिस को देखकर वह सुधबुध खो बैठे।

उन्होने उस दिन मन में ठान ली थी कि उनकी जो नायिका होंगी वह नर्गिंस जैसी ही होंगी। कहते हैं कि जब दोनों के बीच प्रगाड़ता बनी तो नर्गिस ने आग के लिए अपनी सोने की चूड़ियां भी बेची। आगे जो हुआ वह एक इतिहास है। कई मोड़ हैं, कई कहानिया हैं। जो उस जमाने से लेकर आज तक कहे सुने जाते रहे हैं। राज और नर्गिस के बीच का बेमिसाल रिश्ता, सिने जगत में प्यार का ए‌क गीत बन गया।

इसके बाद नर्गिस केवल आर बैनर की नायिक नहीं रहीं, वह इससे आगे निकल गईं। उनकी उपस्थिति के मायने होते थे। आरके बैनर के एक-एक काम पर उनकी पूरी गंभीरता और संजीदगी के साथ नजर होती थी। नर्गिस राज कपूर के लिए कलाकार, प्रेमिका, दोस्त, सहयोगी सब कुछ थी।

यह भी कुछ संयोग था, जब राज नर्गिस से मिले, तो उनकी शादी को मुश्किल चार महीने ही हुए थे। नर्गिस के घर वालों को इस प्यार की भनक लग गई। जद्दनबाई ने भी कुछ पहरे लगाए। लेकिन आवारा के समय नर्गिस के मां का देहांत हुआ तो फिर कोई अंकुश नहीं रहा। मगर धीरे धीरे रिश्तों की डोर कमजोर पड़ने लगी। फिल्म जगत में कहा जाता है कि श्री चार सौ बीस के किरदार में नर्गिस ने अपनी भूमिका को कमजोर माना था। कुछ हल्की कहासुनी भी हुई। आखिर नर्गिस ने एक दिन आरके बैनर को अलविदा कह दिया।

उनकी सुनील दत्त से शादी हो गई। राज के साथ आरे के बैनर के पुराने तराने, पोस्टर बैनर, रह गए। राज नर्गिस की आखरी फिल्म का आखरी शाट ही प्रतीक बन गया। नर्गिस जोगन बनी थी। कहा जाता कि वह इस किरदार को बिल्कुल नहीं निभाना चाहती थीं।

राज कपूर और मीना कुमारी का साथ

राज की मोहब्बत में मीना कुमारी का नाम भी जुड़ता है। कहा तो यहां तक जाता है कि नर्गिस के साथ राज की दूरियों में एक बड़ा कारण मीना कुमारी भी रहीं। नर्गिस ने दोनों की करीबी को महसूस किया था। हालांकि राज कपूर और मीना कुमारी ने केवल दो फिल्मों में काम किया और इसलिए दोनों की नजदीकियां भी क्षणिक ही रहीं। लेकिन फिल्म दुनिया की घटनाओं पर गौर करने वाले इस राज को आहिस्ता बताते हैं कि राज कपूर और मीना कुमारी करीब आने लगे थे।

इसके बाद राज कपूर और मीना कुमारी की फिल्म शारदा आई। फिल्म को आशातीत सफलता नहीं मिली। यह भी सच है कि मीना कुमारी के साथ राज के संबंधों पर ज्यादा चर्चा इसलिए नहीं हुई कि उस दौर में भी राज नर्गिस के चर्चे ही लोगों के दिलो दिमाग पर छाए थे। शायद तभी फिल्मी पत्र-पत्रिकाओं में उनके अलगाव और दूरियों पर ज्यादा चर्चा होती रही।

जब राज कपूर को पद्मिनी का साथ भाया

राज कपूर से जब नर्गिस का साथ छुटा तो पद्मिनी, राज कपूर के लिए सहारा बनीं। पद्मिनी दक्षिण भारत की फिल्मों का एक बड़ा नाम थीं। राज कपूर जब बीमार पड़े तो त्रावणकोर की बहनों में एक पद्मिनी ने उन्हें बहुत सहारा दिया। दक्षिणी बाला को शुक्रिया कहने के लिए ही राज कपूर ने जिस देश में गंगा बहती है बनाई।

वैसे बॉलीवुड ने पद्मिनी की आहट पहले ही सुन ली थी। वह बेहतर आदाकारा और नृत्यांगना थीं। कहते हैं कि फिल्म चोरी चोरी के सेट पर भी वह आया करती थीं। लेकिन नर्गिस के साथ राज कपूर के बीच दरार आने पर पद्मिनी और राज कपूर के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं।

राज कपूर और पद्मिनी दोनों सबसे पहले मास्कों के यूथ फैस्टिबल में मिले। पद्मिनी रूस के सहयोग से बन रही एक फिल्म में काम करने के सिलसिले में वहां थी तो राज कपूर अपनी फिल्म आवारा की धुन पर रुसियों के बीच पापुलर थे। राज ने जादू बिखेरा और पद्ममिनी उनकी कायल हो गईं।

राज कपूर ने कोशिश की कि वह दक्षिण को छोड़ मुंबई की फिल्मों में आएं। आखिर वह सफल हो हुए। उसी समय दक्षिण के निर्माता डर गए कि कहीं पद्ममिनी नर्गिस की तरह केवल आर के बैनर की न होकर रह जाएं। उनका फिल्मों में काफी पैसा लगा था। जबलपुर की पहाड़ियों में रस और प्रेम के आवेग का गीत पद्मिनी पर फिल्माया गया, ओ बसंती पवन पागल। पर सबकुछ होते हुए भी पद्मिनी नर्गिस की जगह नहीं भर पाईं। आखिर एक डाक्टर से उन्होंने शादी करके घर बसा लिया। और अमेरिका चली गईं।

राज कपूर ने जब मेरा नाम जोकर बनाई तो आखिरी के दृश्यों में जीना यहां मरना यहां गीत में पद्मिनी भी थीं। पर बढ़ी उम्र वाली पद्ममिनी। वो समय बीत गया था जब उनपर अल्हड़ होकर नाचते हुए गीत फिल्माया गया था, ओ मैने प्यार किया। रंग हुआ गुलाबी शराबी।

नहीं हो पाया राज कपूर और वैजयंती माला का 'संगम'

इस बार दक्षिण की सुंदर नृत्यांगना वैजयंती माला के प्यार का खुमार राज पर छाया। वैजयंती की फिल्म मधुमति, गंगा-जमुना व पैगाम दिलीप कुमार के साथ हिट हुई। लेकिन संगम के लिए वैजयंती से राज कपूर ने बकायदा तार भेज कर पूछा कि संगम होगा कि नहीं।

वैजयंती माला मद्रास में थीं। उनका समय न मिल पाने पर राज कपूर ने आखिर एक दिन उन्हें तार किया। इसका जवाब वैजयंती माला ने दिया, संगम होगा। आखिर संगम फिल्म बनी। कहते हैं कि एक बार राज कपूर ने वैजयंती माला का हाथ देखते हुए कहा था कि कुछ रिश्ते तुम्हारे हाथ में नजर आ रहे हैं।

वैजयंती माला ने राज कपूर और उनके बीच के संबंधों पर केवल यही कहा कि उन्होंने अपनी फिल्म की राधा के लिए मुझमें राधा को देखा। इससे ज्यादा कुछ नहीं। लेकिन कहानियां इससे बाहर भी कहीं जाती है। कहते हैं कि एक दिन वैजयंती माला के प्रसंग पर ही राज कपूर और राजेंद्र कुमार में अच्छी खासी बहस भी हो गई। इस घटना को फिल्म जगत में काफी चटपटे ढंग से सुनाया जाता है। राज कपूर, राजेद्र कुमार के बातों में वैजंयती माला की प्रशंसा को बर्दाश्त नहीं कर पाए।

शराब के दौर में बहस लड़ाई तक पहुंच गई। यह भी कहा जाता है कि एक समय वैजयंती माला और कुछ दूसरे साथियों के साथ गपशप करते राज कपूर को अपनी पत्नी से फटकार भी खानी पड़ी थी। वह फिर परिवार में नया झमेला नहीं चाहती थीं। फिर वह समय भी आया कि राजकपूर के फैमली डाक्टर सी एन बाली से शादी करके बैजयंती माला ने अपना घर बसा लिया। साथ ही फिल्म जगत को भी अलविदा कह दिया।
विज्ञापन

राज कपूर और जीनत अमान का 'सत्यम शिवंम सुंदर'

जीनत अमान यह कहते हुए राज कपूर के सामने आईं थीं कि क्या आपको अपनी फिल्म के लिए ऐसी पोज चाहिए? राज को चयन करने में देर नहीं लगी। कहते हैं कि इस फिल्म को बनाने से पहले राज कपूर ने कहा था कि कोई खूबसूरत बदन की मलिका हो तो उसे हीरोइन बनाना वह जानते हैं।

जाहिर है कि जीनत अमान की सुंदरता पर शो मैन का फैसला आ चुका था। हालांकि पहले इस फिल्म के लिए हेमा मालिनी को लिए जाने की बात थी। लेकिन राज कपूर के बयान ने ही बात बिगाड़ दी। सत्यम शिवंम सुंदर फिल्म में जीनत कला और सौंदर्य के प्रतिमान पर तैयार कहानी पर भूमिका को निभाती दिखीं।

जीनत अमान की दोस्ती पर देवानंद भी अपना हक समझते थे। लेकिन इस फिल्म से पहले एक पार्टी में जब देवानंद ने जीनत अमान को राजकपूर के आगे पीछे उमड़ते देखा तो वह समझ गए कि 'हरे रामा हरे कृष्णा' का समय पूरा हो गया। नई कहानी लिखी जा रही है जिसमें उनकी कोई भूमिका नहीं है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें