भुतही फिल्म बनाने वाले रामसे ब्रदर्स को कभी सम्मान की निगाह से नहीं देखा गया। फिल्में चलीं और उनका नाम भी यह अलग बात है लेकिन उनकी बात आने पर उन पर हमेशा कटाक्ष किए गए। कहा गया कि वह टोमेटो कैचेप मुंह पर थोपकर डराते हैं और साउथ की मुटियाती महिलाओं के अधनंगे दृश्य दिखाकर नकली उत्तेजना पैदा करने का प्रयास करते हैं।
उनकी फिल्मों को रिलीज करने के लिए न तो बड़े शहर मिले और न ही बड़े शहरों के प्राइम लोकेशन वाले सिनेमाघर। होते-होते रामसे ब्रदर्स ठंडे पड़ गए। क्योंकि तब तक लोगों के पास सिस्टमैटिक तरीके से पोर्न देखने के साधन उपलब्ध हो गए थे।
2001 में 'राज' फिल्म के जरिए एक बार फिर से मेनस्ट्रीम सिनेमा में भुतही फिल्मों की दस्तक होती है। इस बार सबकुछ सुनियोजित था। मंहगे और भव्य सेट थे। तराशी हुए बदन वाली नायिकाएं थीं। सेक्स सीन फिल्माने के लिए सी ग्रेड होटल के सस्ते कमरों के बजाय भव्य बेडरूम थे और मंहगी सजावटी सामान थी। सुंदर गाने थे और फिल्म को बेचने के लिए बढ़िया मार्केटिंग थी।
यह फिल्म हिट हुई और हमेशा की तरह बॉलीवुड हिट के इस फॉर्मूले की तरफ दौड़ पड़ा। एक के बाद एक कई भुतही, सस्पेंस और मर्डर मिस्ट्री वाली फिल्में तो भट्ट कैंप से ही आईं। उन सभी फिल्मों की खास बात यह थी कि उन्हें प्रचारित बोल्ड फिल्म कहकर किया गया। ये फिल्में बोल्ड थीं और तमाम नायिकाओं को स्थापित करने में इनका बड़ा रोल रहा। यहां यह गौर करना जरूरी है कि ये फिल्में बोल्ड जरूर थीं लेकिन भद्दी नहीं।
दर्शक इन फिल्मों में डर नहीं एक्सपोजर देखने के लिए आए थे। इस फैक्ट और मानसिकता को एकता कपूर ने पकड़ा। एकता कपूर ने क्या कूल हैं हम के दो सफल पार्ट बनाकर यह तो समझ ही लिया था कि सेक्स के नाम पर भौंडेपन की आलोचना तो होगी लेकिन इसे देखा भी खूब जाएगा। यह कुछ-कुछ वैसा ही था कि मस्तराम कि किताब के एक ही पन्ने मे प्रूफ की 50 से 70 गलतियां होती हैं लेकिन आज तक चर्चा उनकी गलतियों पर नहीं होती।
रागिनी एमएमएस इसी सोच का नमूना है। इस फिल्म से अगर अच्छी क्वालिटी की मेकिंग, मंहगे कैमरे, सनी लियोनी जैसी चर्चित स्टार और बालाजी प्रोडक्शन हटा लें तो यह फिल्म रामसे ब्रदर्स की सो कॉल्ड घटिया फिल्मों से भी घटिया है। फिल्म का एक-एक सीन सिनेमा की बेसिक जरूरतों को पूरा नहीं करता। किसी भी सीन को देखकर ऐसा नहीं लगता कि हम मेनस्ट्रीम का सिनेमा देख रहे हैं। यह मस्तराम की उसी किताब की तरह लगती है जिसके पन्नों का क्रम भी कई बार गलत होता है। यहां का पन्ना वहां लगा होता है।
फिल्म को देखकर लगता है कि एडटिंग टेबल पर आने के बाद पूरी की पूरी फिल्म ही बदल दी गई। जानबूझ कर ऐसे प्रसंग रचे गए जहां सेक्स की, स्मूच की और द्घिअर्थी बातें करने की संभावना हो। इस बीच मूल फिल्म मारी जाती रही। यदि आपने फिल्म देखी है तो गौर करेंगे कि फिल्म दर्शक को जिंदा रागिनी के दर्द, उसके अंदर समाई भुतही आत्मा और उस भूत के बदला लेने की वजह पर बात ही नहीं करना चाहती।
फिल्म में डर और कहानी उतनी ही है जितना कि हम खाने के बीच में सलाद या पापड़ चुग लेते हैं। अब चूंकि लगातार बेडरूम और किस सीन दिखा नहीं सकते थे इसलिए ये सीन रखना मजबूरी थी। अब जब यह फिल्म लगभग 24 करोड़ कमाकर हिट के रूप में शुमार की जाने लगी तब यह सवाल भी हास्यास्पद हो जाएगा कि यह फिल्म खराब बनाई गई थी।
रागिनी एमएमएस 2 इस बात पर चिंतित होने के लिए बाध्य करती है कि यह फिल्म ढेरों ऐसी फिल्मों को प्रोत्साहित करेगी जिनके पास न तो कहानी होगी और न ही कहानी कहने का तरीका। उनके पास एक सनी लियोनी होगी। और सनी लियोनी की कमी पड़ने वाली नहीं है यह तो निश्चित है। आने वाले समय में अकेले एकता कपूर ही एक नहीं कई सनी लियोनी खड़ी कर देंगी। क्योंकि सुनते हैं कि सनी लियोनी अब फिल्म साइन करने से पहले स्क्रिप्ट मांगने लगी हैं।