'स्कैम 1992' वेब सीरीज में प्रतीक गांधी
- फोटो : एक्स (ट्विटर)
‘स्कैम 1992’ के बाद क्या आपको लगा कि हमेशा एक जैसे रोल मिल रहे हैं?
नहीं, ऐसा कभी नहीं लगा। हर बार नया किरदार मिला है। लोग मुझे अलग-अलग किरदारों के लिए सोचते हैं। मुझे लगता है कि मैं अपने किरदारों में कुछ नया लेकर आता हूं। स्टीरियोटाइप से बचना मुश्किल है, लेकिन मैं कोशिश करता हूं, इस चीज से खुद को दूर रखूं।
फिल्म 'फुले' में प्रतीक गांधी
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आपकी कुछ फिल्मों को मिला-जुला रिस्पॉन्स मिला। क्या इससे कभी निराशा हुई?
हां, कभी-कभी दुख जरूर होता है। खासकर 'फुले' जैसी फिल्म को लेकर मेरी बहुत सारी उम्मीदें थीं। मैं चाहता था कि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और सही तरीके से सराही जाए। लेकिन अफसोस की बात यह रही कि वह उतनी बड़ी ऑडियंस तक नहीं पहुंच पाई जितनी हम उम्मीद करते थे। फिर भी, मैं जब किसी स्क्रिप्ट को पढ़ता हूं, तो सोचता हूं कि यह प्रोजेक्ट मेरे लिए सही है। फिर पूरी मेहनत से अपने किरदार को निभाता हूं। इसलिए मेरा सैटिस्फैक्शन खुद से आता है, न कि बाहरी रिस्पॉन्स से।
क्या आपको लगता है कि फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी कोई व्यवस्था होनी चाहिए जिससे अच्छी फिल्में ज्यादा लोगों तक पहुंचें?
बिलकुल। इंडस्ट्री में काफी इनोवेशन की जरूरत है। टेक्नोलॉजी तो है, बस उस ऑडियंस तक पहुंचने का रास्ता ढूंढना होगा। इंडस्ट्री धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ रही है, लेकिन और सुधार की जरूरत है।
आज के महंगे टिकटों और मल्टीप्लैक्स के बढ़ते प्रभाव पर आपकी क्या राय है?
यह एक बड़ी समस्या है। टिकट के दाम बहुत बढ़ गए हैं, मल्टीप्लैक्स ज्यादा हो रहे हैं और सिंगल स्क्रीन धीरे-धीरे खत्म हो रही है। खासकर छोटे शहरों के लोगों के लिए फिल्म देखना मुश्किल हो गया है। कई बार उन्हें 50-60 किलोमीटर दूर जाकर ही थिएटर मिल पाता है। हमने सिनेमा हॉल में ऑडियंस को अच्छा अनुभव देने की कोशिश की है, जैसे आरामदायक सीटें, लेकिन यह हर किसी के लिए जरूरी नहीं है। बहुत लोग बस सस्ती आसान जगह पर फिल्म देखना चाहते हैं। अगर हम हर सिंगल स्क्रीन तोड़कर मल्टीप्लैक्स बना देंगे, तो छोटे शहरों के लोग फिल्मों से दूर हो जाएंगे। इसलिए हमें ऐसा संतुलन बनाना होगा जिससे फिल्म ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके।
महात्मा गांधी पर बन रही सीरीज में प्रतीक गांधी निभाएंगे मुख्य भूमिका
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