मकर संक्रान्ति पर परिवार संग पतंगबाजी करते प्रतीक गांधी
- फोटो : अमर उजाला
पतंगबाजी में इस त्योहार की आत्मा बसती है। आपने इससे क्या कुछ सीखा?
पतंग उड़ाना मुझे संतुलन बनाए रखने की सीख देता है। डोर बहुत जोर से पकड़ो तो टूट जाती है और पूरी तरह छोड़ दो तो पतंग दिशा खो देती है। जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है। मेहनत करनी होती है, धैर्य रखना होता है और सही समय पर खुद को छोड़ना भी आना चाहिए। हवा को समझना, हालात के हिसाब से खुद को ढालना और प्रक्रिया पर भरोसा रखना।
मकर संक्रान्ति पर परिवार संग पतंगबाजी करते प्रतीक गांधी
- फोटो : अमर उजाला
आज की डिजिटल दुनिया में युवा पीढ़ी पारंपरिक त्योहारों से कैसे जुड़ी रह सकती है?
मुझे नहीं लगता कि परंपरा और तकनीक एक दूसरे के खिलाफ हैं। जरूरी यह है कि त्योहारों को सिर्फ कैमरे में कैद न किया जाए, बल्कि उन्हें महसूस किया जाए। पतंग उड़ाना, परिवार के साथ खाना बनाना, बड़ों की बातें सुनना। जब त्योहार स्क्रीन से बाहर निकलकर अनुभव बनते हैं तो उनसे जुड़ाव अपने आप गहरा हो जाता है।
अगर जिंदगी एक पतंग हो, तो उसे थामने और उड़ाने को लेकर आप क्या सलाह देंगे?
डोर को डर से नहीं, भरोसे से पकड़िए। समझिए कब खींचना है और कब छोड़ना है। हवा पर विश्वास रखिए, लेकिन सजग भी रहिए। और सबसे जरूरी उड़ान का आनंद लीजिए, क्योंकि अगर सिर्फ गिरने के डर में रहेंगे, तो आसमान देखने की खुशी छूट जाएगी।