पोन्नियिन सेल्वन रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बड़े परदे का असली तिलिस्म
फिल्म ‘पोन्नियिन सेल्वन पार्ट वन’ देखना अपने आप में किसी दिव्य अनुभव से कम नहीं है। मणिरत्नम ने सदियों पहले की नहीं बल्कि हजार साल पहले की एक कहानी को अपनी इस नई फिल्म का आधार बनाया है। कहानी ये उनके मन में तब से घुमड़ती रही है जब वह सिनेमा के आसमान के ध्रुव तारा बनने लगे थे। यहां कहानी एक पुच्छल तारे से शुरू होती है। बीमार राजा अनिष्ट की आशंका देखते हुए अपने छोटे भाई को गद्दी सौंपता है। और, छोटा भाई समय आने पर अपने बेटे को। बेटी मानती है कि उसका दूसरा भाई इस गद्दी के लिए अधिक उपयुक्त है। उधर बड़े भाई का बेटा भी है। उसे लगता है कि राज सिंहासन पर तो आनुवंशिक अधिकार उसका है। षडयंत्रों की बू आनी शुरू होती है। राजा अपने सबसे विश्वस्त को इसका पता लगाने भेजता है। कहानी एक नगर से दूसरे नगर और दूसरे नगर से दूसरे देश तक जाती है। चौसर बिछ चुकी है। गोटियां सज चुकी हैं। शह और मात का ये खेल ‘पोन्नियिन सेल्वन’ की दूसरी कड़ी में अपने परिणाम तक पहुंचेगा।
मणिरत्नम का मिडास टच
मणिरत्नम का सिनेमा एक अलग अनुभूति का सिनेमा है। इसमें कहानी के किरदार दर्शकों को अपने साथ बांधकर चलते हैं। नैसर्गिक छटाएं यहां कथन का हिस्सा बनती चलती हैं और कलाकारों के चरित्र कहानी के अलग अलग आयाम गढ़ते हैं। फिल्म ‘पोन्नियिन सेल्वन पार्ट वन’ में मणिरत्नम ने एक ऐसा साम्राज्य गढ़ा है जिसके बारे में जो कुछ है बस किताबों में है। कल्कि कृष्णमूर्ति के उपन्यास पढ़ने वालों की मानें तो इनकी लिखावट किसी पटकथा से कम नहीं है। हर विवरण है यहां। मणिरत्नम ने इसे ही परदे पर जीवंत कर दिखाने की कोशिश की है। परदे पर चोल साम्राज्य का वैभव नजर आता है। इसकी महिला चरित्रों का रूप लावण्य नजर आता है। और, ये महिला चरित्र आम फिल्मों की तरह नहीं है। यहां रिश्तों की हर गांठ पर उनका पहरा है और कहानी के हर मोड़ पर उनकी निगाहें टिकी हुई हैं।
पोन्नियिन सेल्वन रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कार्ति की कलाकारी सब पर भारी
फिल्म ‘पोन्नियिन सेल्वन पार्ट वन’ में तमिल सिनेमा के तमाम दिग्गज कलाकार हैं। लेकिन जिन विक्रम के नाम पर फिल्म की रिलीज से पहले हवा बांधी गई है, उनका किरदार फिल्म का बस आधार है। असली मस्तूल इस फिल्म में कार्ति ने गाड़ा है। उनका खिलंदड़पन दर्शकों को भाता है। उनकी मस्ती दर्शकों को कहानी का हिस्सा बनाने की पूरी कोशिश करती है। ऐश्वर्या राय बच्चन यहां राजवंशों के बीच चलने वाली राजनीति का मोहरा हैं। उनकी सुंदरता और उनकी कुटिलता दोनों आकर्षक हैं। जयम रवि का कहानी में प्रवेश देर से होता है और वह इसलिए क्योंकि फिल्म का दूसरा हिस्सा उन्हीं के किरदार की धर्मध्वजा लहराने वाला है। फिल्म के प्रोडक्शन की जानकारी रखने वाले बताते हैं कि फिल्म के दूसरे हिस्से की भी शूटिंग हो चुकी है और फिल्म का पोस्ट प्रोडक्शन पूरा करके इसे अगले साल ही रिलीज करने की तैयारी है।
पोन्नियिन सेल्वन रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
रूप, रंग, ऐश्वर्य
ऐश्वर्या राय बच्चन फिल्म ‘पोन्नियिन सेल्वन पार्ट वन’ को देखने का हिंदी दर्शकों का इकलौता आकर्षण हैं और उनके रूप रंग का आकर्षण अब भी असरदार बना हुआ है। उनके साथ तृषा भी हैं, लेकिन ऐश्वर्या जैसे चांद के आगे बाकी सब तारे ही लगते हैं। ऐश्वर्या लक्ष्मी का किरदार काफी कम देर के लिए दिखता है और कहानी में उनकी उपयोगिता को भी स्पष्ट नहीं कर पाता है। तकनीकी रूप से फिल्म की सिनेमैटोग्राफी (रवि वर्मन), कला निर्देशन (तोता तरिणी) और संगीत (ए आर रहमान) सब अव्वल दर्जे का है। ऐसी फिल्में परंपरागत रूप से लंबी अवधि की होती है, वही दिक्कत इस फिल्म की भी है। संगीत फिल्म का तमिल दर्शकों की रुचि के हिसाब से बना है और उसमें दिव्य प्रकाश दुबे ने हिंदी के शब्द फंसाने की कोशिश अच्छी की है।