निमरत कौर अपने पिता के साथ
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निमरत कहती हैं, 'बचपन में हमारी दिवाली हमेशा आर्मी कैंट में ही मनती थी। पापा आर्मी में थे, तो दिवाली का मतलब था कि पापा घर आएंगे। बस वही हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी होती थी। हमारे यहां कभी बहुत शोर या पटाखे वाली दिवाली नहीं मनाई जाती थी। हम फुलझड़ियां और चकरी जलाते थे। आज भी जब मैं किसी बच्चे के हाथ में फुलझड़ी देखती हूं, तो पापा की वो मुस्कान याद आ जाती है और वो छोटा सा घर, जो उस वक्त हमारे लिए पूरे ब्रह्मांड जैसा था।’
निमरत कौर अपनी मां और नानी के साथ
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घर से बड़ा कोई आश्रय नहीं
निमरत बताती हैं कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, दिवाली के मायने और गहराई से समझ आने लगे। काम की वजह से आजकल हम सब दुनिया के अलग-अलग कोनों में रहते हैं। लेकिन दिवाली का नाम आते ही दिल सिर्फ एक जगह खिंचता है और वो है - घर। मैं चाहे किसी भी शूट में फंसी रहूं, किसी न किसी तरह दिवाली की रात तक नोएडा पहुंच ही जाती हूं। वहां मां-पापा, नानी और वो जानी-पहचानी खुशबू... बस, सब कुछ पूरा हो जाता है। जिंदगी बहुत अनिश्चित है और यही त्योहार हमें याद दिलाते हैं कि असली पूंजी रिश्ते हैं, न कि कोई और चीज।'
दादी का दिया तोहफा आज तक साथ है
बातों-ही-बातों में निमरत ने एक किस्सा सुनाया जो उनके दिल के बहुत करीब है। वे बोलीं- 'कई साल पहले मेरी एक बहुत करीबी दोस्त की दादी ने मुझे एक छोटा-सा पर्स दिया था। उन्होंने वो अपने हाथों से बनाया था। उसमें चांदी के मोती जड़े हुए थे और अंदर सौ रुपए का नोट रखा था। उन्होंने कहा था कि ये मेरे लिए लक्ष्मी जी का आशीर्वाद है। जब भी उस पर्स को देखती हूं तो एहसास होता है कि बुजुर्गों के दिए तोहफे उनकी पूरी जिंदगी, प्यार और आशीर्वाद समेटे होते हैं। वो पर्स आज भी मेरे पास है। हर दिवाली मैं उसे अलमारी से निकालकर साफ करती हूं। मेरे लिए वही मेरा सबसे कीमती ताेहफा है।'
असली ‘धन’ अपनों का प्यार
दिवाली के साथ-साथ धनतेरस की बात करते हुए निमरत के चेहरे पर एक विशेष भाव झलकता है। वो कहती हैं, ‘हर धनतेरस मां मेरे लिए एक नए कपड़े खरीदती हैं। वो उनका छोटा-सा रिवाज है। मेरे लिए वही सबसे बड़ी समृद्धि है, मां का वो भाव और वो परंपरा व स्नेह।’
हमारी प्यारी परंपरा - एक Hot Chocolate Fudge और ढेर सारा प्यार'
अपने घर की परंपरा साझा करते हुए निमरत बताती हैं, ‘हर साल दिवाली की रात हम सब हॉट चॉकलेट ऑर्डर करते हैं। फिर सब कार में बैठकर नोएडा घूमते हैं। देखते हैं कि दूसरों ने अपना घर कैसे सजाया है। फिर घर लौटकर हम सब दीये जलाते हैं, पूजा करते हैं और बस यह सुकून का एहसास ही मेरी दिवाली है। दिवाली की असली रौशनी दीयों में नहीं, उन लोगों में होती है जिनके साथ आप वो दीये जलाते हैं।'
काजू कतली के बिना दिवाली अधूरी है
अंत में निमरत कहती हैं, ‘त्योहारों का सबसे प्यारा हिस्सा है घर की रसोई। मां के हाथ का राजमा-चावल या कढ़ी-चावल जब दिवाली पर बनता है, तो पूरी रसोई में एक अलग-सी गर्माहट होती है। इसके अलावा काजू कतली मेरी कमजोरी है।’